हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें· अ० ९ ·] भाषाटीकासमेता । (२७१)
भाग ले पीसके मिलादेवे और पीछे कहीहुई प्रकरणकी सब औषधोंसे आधाभाग भंगरा और इन सबोंके समान मिश्री मिला ॥ ४१ ॥ फिर इस चूर्णको आंवलेके रसमें भावना दे पीछे तीनवार गौके दूधमें भावना दे फिर इस सबचूर्णके समान खांड मिला फिर घृतमें भावनादे ॥ ४२ ॥ २ तोला प्रमाण उस चूर्णको शहदके संग खावे और यह चूर्ण जरजावे तब भोजन करे और चर्चरा तथा खट्टा भोजन नहीं करे और दूध, घृत, सफेद खांड, जव, गेहूं, शालिसंज्ञकचावल इनका भोजन करे ॥ ४३ ॥ मनुष्यके जठराग्निपाकको जानके विधिके जाननेवाले वैद्योंको क्षयरोगकी शांतिके वास्ते देना कहा है और मार्गमें क्षीणहुआ, हाराहुआ, बहुतकालसे संतापवाला इनोंसे पीड़ित हुए पुरुषोंको और शिरकी पीड़ामें ॥ ४४ ॥ और पित्तसे आतुर, रुधिरक्षयवाले, श्रम, मार्ग इनसे पीड़ित, कामलारोगवाले, श्वासरोगवाले, मधुमेहवाले, क्षीणइंद्रियवाले इन पुरुषोंको यह चूर्ण श्रेष्ठ कहा है ॥ ४५ ॥ और जिस स्त्रीके गर्भ ठहररहाहो उसको यह बलादिचूर्ण श्रेष्ठ कहा है ॥ ४६ ॥ अथ च्यवनप्राशननामक अवलेह । बिल्वाग्निमन्थस्योनाकाः काश्मरी पाटली तथा ॥ शालिपर्णी पृश्निपर्णी श्वदंष्ट्रा बृहतीद्वयम् ॥४७॥ शृङ्गी शीता चामलकी जयन्ती पुष्कराह्वयम्॥द्राक्षाभयामृता मेदा चन्दनागुरुपद्म- कम् ॥ ४८ ॥ बलाह्वयास्तु कर्णे द्वे जीवकर्षभकावुभौ ॥ काकोली क्षीरकाकोली विदार्याः कन्दमांसकम् ॥ ४९ ॥ सर्वेषां पलिका मात्रा योजयेद्भिषजां वरः॥धात्रीफलं पञ्चशतं सुपक्वरससंयुक्तम् ॥ ५० ॥ जलद्रोणे विपक्तव्यं चतुर्भागे च शोषितम् ॥ तथा निर्वाप्य मतिमान्कलकानि समुद्धरेत् ॥५१॥ तत्क्वाथं कलकयेत्तावद्यावद्दर्वीप्रलेपकः ॥ पुनस्तैलेन वाज्येन पक्त्वा चामलकीफलान् ॥५२॥पाचितांश्चूर्णितान्सर्वान्समश- र्करया युतान्॥चतुष्पलातुगाक्षीरैर्योजयेद्भिषजांवरः॥ ५३ ॥ पिप्पलीनां सहस्रैकं त्वगेलापत्रकं तथा॥एषां द्विपलिकां मात्रां विदध्यात्तत्रसत्तमः॥५४॥सव प्राक्वथिते लेहे योजयेच्च विचू- र्णितम्॥आदरेण समं लिह्यान्नराणां च रसायनम् ॥ ५५ ॥ श्वासकासक्षयपाण्डुकामलानां विशोषणम् ॥ क्षीणक्षतानां बालानां वृद्धानां देहलक्षणम् ॥५६॥ स्वरसङ्गपिपासानां हृद्रोगे