हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(२७२) हारीतसंहिता। [ तृतीयस्थाने- पित्तशोणितम्॥शुक्रदोषं शिरोरोगं पीनसं चापकर्षति ॥५७॥ जीर्णज्वरञ्च मन्दाग्निं कुष्ठं दुष्टं भगन्दरम्॥मेहं कृच्छ्राश्मरीं हन्ति तथा रोचनवारणम्॥५८॥हृद्रोगशूलमानाहं नाशयत्य- विसंशयम्॥वन्ध्यानां पुत्रजननं वृद्धानामल्परेतसाम् ॥५९॥ षण्ढोऽपि जायते चैव सदा ऋतुकरः परः॥मेधा स्मृती तथा तेजो वर्द्धयत्याशु निश्चितम् ॥६०॥ सौख्यसौभाग्यदर्शी च वृद्धोऽपि तरुणायते॥क्षयरोगविनाशाय कथितं चात्रिणा महत् ॥६१॥ च्यवनप्राशनं नाम कृष्णात्रेयविभाषितम् ॥६२॥इति च्यवनप्राशननामावलेहः ॥ बेलगिरी, अरणी, सोनापाठा, खंबारी, शालवन, पिठवन, गोखरू, छोटी कटेहली, बड़ी कटेहली ॥ ४७ ॥ भांग, गंगेरन, भूमि आंवला, जयंती अर्थात् अरणीभेद, बड़ीअरणी, पोहकरमूल, दाख, हरडैं, गिलोय, मेदा, चंदन, अगर, पद्माक ॥ ४८ ॥ खरैंटी, दोभाग दालचीनी, जीवक, ऋषभक, काकोली, क्षीरकाकोली, विदारीकंद ॥ ४९ ॥ इन सबोंको वैद्यजन चार २ तोला प्रमाण लेवे और पकेहुए रसके आंवले पांचसौ लेके ॥ ५० ॥ पीछे इन सब औषधोंको एकहजार चौसठ १०६४ तोले जलमें पकावे फिर चतुर्थांश बाकी रहे तब बुद्धिमान् पुरुष उन औषधोंको निकाल आंवलोंकी गुठली निकालके उनकी कली करलेवे और पीसके पीठीसी करले ॥ ५१ ॥ फिर पूर्वोक्त क्वाथ डालके पकावे फिर कडछी चपकने लगे तब उतारे और तेलमें अथवा घृतमें तिन आंवलोंकी पीठीको सेंकले ॥ ५२ ॥ पीछे पकाये हुए तिस चूर्णमें बराबरकी खांड मिलावे और १६ सोलह तोले वंशलोचन मिलावे ॥ ५३ ॥ उत्तम वैद्य इसी कहेहुए अवलेहमें हजार पीपली, दालचीनी ८ तोले, तेजपात ८ तोले, इनका चूर्ण मिलादेवे ॥ ५४ ॥ पीछे यह लेह मनुष्योंको आदरसे चाटना चाहिये । यह मनुष्योंको रसायन कहा है ॥ ५५ ॥ और श्वास, खांसी, पांडुरोग, कामला, इन रोगोंको नाशता है और क्षीणरोगसे क्षत हुए बालक, वृद्धजन, इनके देहकी रक्षा करने- वाला है ॥ ५६ ॥ स्वरभंग, पिपासा, हृदयरोग, पित्तरक्त, शुक्रदोष, शिरोरोग, पीनस इन रो- गोंको दूर करता है ॥ ५७ ॥ जीर्णज्वर, मंदाग्नि, दुष्ट कुष्ठ, भगंदर, प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, अरुचि इन रोगोंको दूर करता है ॥ ५८ ॥ हृदयरोग, शूल, अफारा इनको नाशता है इसमें संदेह नहीं । यह चूर्ण वंध्यास्त्रियोंको पुत्रको देनेवाला और अल्पवीर्यवाले वृद्ध ॥५९॥ नपुंसक इनके वीर्यको बढ़ानेवाला है और बुद्धि, स्मृति, तेज इनको शीघ्र ही निश्चय बढ़ाता है ॥६०॥