भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 548 में से

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अ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( २७३ ) इसके खानेसे वृद्धपुरुष भी सुख सौभाग्यको देखता है और जवानकी तरह आचरण करता है। यह महान् चूर्ण क्षयरोगोंके विनाशके वास्ते कृष्णात्रेयजी महाराजने कहा है॥६१॥१ यह कृष्णात्रेयमुनिने च्यवनप्राशनामक अवलेह कहा है ॥ ६२ ॥ अथ अगस्तिहरीतकीपाक । भार्ङ्गीपुष्करमूलचित्रककणामूलं गजाद्वा शटी शङ्खाह्वादशमूल- चित्रकबलायासात्मगुप्तास्तथा॥ एतेषां द्विपलांशकी वरभिषक्१ प्रोक्ता च पञ्चाढके पथ्यानां शतकं विपाच्य बहुधा मन्दाग्निना संततम् ॥६३॥ निर्बाप्यं पुनरेव पूतसरसं चोद्धृत्य पथ्याशतं संशुष्यामतिशीतले सुभवनक्वाथः प्रशस्तः पुनः॥दत्त्वा जीर्ण- गुडस्य चैकतुलया कुडवञ्च क्षौद्रं घृतं स्नेहस्यार्द्धमथाक्षकेण मगधा योज्यं शतं पञ्चकम् ॥६४॥ चूर्णं तत्र निधापयेत्पुनरपि संघट्टयेदुच्चकं पथ्ये द्वे मधुना सहातिहितकृत्सर्व्वामयच्छेदन्ः ॥ पाण्डुंकासहलीमकंपुदरुजो हृद्रोगहिक्काभ्रमान् हन्यात्पीनसमे- हपित्तमसृजं कुष्ठं ग्रहण्यामयम् ॥६५॥ पुष्पं चैव तनोति शोफ- मरुचिंगुल्मात्तिराजक्षयमेहानाहविबंधरोगशमनं क्षीणेन्द्रियाणां हितम् ॥ मन्दाग्नेः प्रशमं करोति वडवातुल्योऽरुचिंबन्धकं नाशं वा विदधाति देहसुखदागस्तिप्रणीताभया ॥६६ ॥ भारंगी, पोहकरमूल, चीता, पीपलामूल, गजपीपली, कचूर, शंखपुष्पी, दशमूल, चीता, खरैहंटी, जवासा, कौंच इनको आठ आठ तोला प्रमाण लेवे और सौ १०० हरडें लेवे पीछे इनको १२८० तोले जलमें मंद २ अग्निसे अच्छे प्रकारसे पकावे ॥ ६३ ॥ फिर पकजावे तब पूर्णरसवाली पहले कही हुई सौ १०० हरडोंको निकाललेवें और शीतलहुए क्वाथसे उनहरडोंको निकाल फिर ४०० चारसौ तोले पुराणा गुड, १६ तोले शहद और १६ तोले अथवा ८ तोले घृत मिलावे और चतुरवैद्यको पांचसौ ५०० पीपली मिलानी चाहिये ॥ ६४ ॥ इन सब औषधोंके चूर्णको एकजगह कूटके मिलादेवे फिर शहदके संग दोहरडे खानेसे संबरोगोंका नाश होता है। पांडुरोग, खांसी, हलीमक, गुदाका रोग, हृदयरोग, हिचकी, भ्रम इन रोगोंका नाश होता है और पीनस, प्रमेह, रक्तपित्त, कुष्ठ, संग्रहणी इन रोगों को नाशता है ॥ ६५ ॥ स्त्रीके पुष्पको बढ़ाता है, शोजा, अरुचि, गुल्म, राजयक्ष्मा, १ वरश्चासौ भिषक् तत् सम्बुद्धौ । १८

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