हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २७४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- मूत्ररोग, आनाह, मलका बंधा इन रोगोंको नाशता है और क्षीणइंद्रियवालोंको यह हरीतकी- पाक हित है और मन्दाग्निको शांत करता है और अरुचिरोगके नाशके वास्ते अग्निके समान कहा है और अगस्तिकृषिसे कहाहुआ यह हरीतकीपाक देहको सुख देनेवाला है ॥ ६६ ॥ अथ बलाक्वाथ । बलाद्वयं गोक्षुरकौ बृहत्यौ निष्क्वाथ्य दुग्धेन कणासमेतम् ॥ पानं हितं स्यान्मधुना सिताह्वयं विनाशनं कामलकं क्षयं वा॥ मेहस्य तृष्णाशयनाशकारिक्षीणोन्द्रियाणां बलमातनोति॥६७॥ खरैहंटी, गोखरू, छोटी कटेहली, बड़ी कटेहली, पीपली, इनका दुग्धमें क्वाथवना फिर शहद और मिश्री मिला पीना पथ्य है । कामला, क्षयरोग, प्रमेह, तृषा, इन रोगोंका नाश होता है और क्षीणइन्द्रियवाले पुरुषोंके बलको बढ़ानेवाला है ॥ ६७ ॥ अथ पिप्पलीवर्द्धमानम् । पिप्पलीं वर्द्धमानं वा कारयेद्दुग्धसर्पिषा॥आद्यः पञ्च पुनः सप्त पुनरेव नव क्रमात् ॥६८ ॥ एकादशत्रयोदशः पञ्चदशस्तथा सप्तदशः स्मृतः॥एकोनविंश एकविंशः पृथक्पृथग्यथाक्रमम् ॥ ॥ ६९ ॥ एवं क्रमेण वृद्धिः स्यात्कारयेच्छतमात्रया ॥ ततः क्रमेण पुनः पश्चाद्यावच्छेषं च पञ्चकम् ॥ ७० ॥ भोजयेत्षष्टि- कान्नं तु मुद्गेन सर्पिषा युतम्॥एवं बालश्च वृद्धश्च नरो नागबलो भवेत् ॥ ७१ ॥ पिप्पली वर्द्धमाना तु ज्वरे जीर्णे प्रशस्यते ॥ मन्दाग्नौ पीतमेवाथ गुदजे वा तथा पुनः ॥ ७२ ॥ इति पिप्पलीवर्द्धमानम् ॥ दुग्ध और घृतके संग पिप्पली वर्द्धमान बनाया जाता है उसको कहते हैं, क्रमसे पहले पांच फिर सात फिर नव पीपलोंको दूधमें पका घृत मिला पान करना चाहिये ॥६८॥ और पिछले दिन ग्यारह फिर १३ पीछे १५ पीछे १७ पीछे १९ पीछे २१ ऐसे बढ़ती हुई ॥ ६९ ॥ ऐसे दिन दिन प्रति दो बढ़ती हुई सौ पीपलोंतक बढ़ा लेनी चाहिये पीछे क्रमसे घटती हुई जबतक पांच शेष रहें तबतक सेवन करे ॥७०॥ इसपै सांठी चावलोंको मूंग और घृतके संग भोजन करे । बालक अथवा वृद्धजन इस प्रकार इसका पान करताहुआ हस्तीके समान पराक्रमवाला हो जाता है ॥ ७१ ॥ यह पीपली वर्द्धमान जीर्णज्वरमें श्रेष्ठ कहा है और मन्दा- ग्निमें तथा गुदाके रोगमें पीना हित है ॥ ७२ ॥