हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ५४ ] भाषाटीकासमेता । ( ४५९ ) अधिक हो, कफ गिरे, जलसे युक्त नासिका और मुख रहे ये खारा दूध पीनेवाले बालकके रोग हैं ॥ ७ ॥ अतो वक्ष्यामि भैषज्यं शृणु हारीत मे मतम् ॥ ८॥ हे हारीत ! अब इनकी औषधोंको कहेंगे तू सुन यह मेरा मत है ॥ ८ ॥ अथ उत्फुल्लरोगकी चिकित्सा । आध्मानात्फुल्लकुक्षिश्च श्वासदोषादिपीडितः॥ उत्फुल्लिका च विज्ञेया बालानां दुःखकारिणी ॥ ९॥ उदरे च जलौकादि- रक्तं चादौ विमोक्षयेत्॥उत्फुल्लिदोषे दातव्यं क्षीरदोषनिवार- णम् ॥ १० ॥ अग्निना प्रबलः स्वेदो दहेद्वापि शलाकया ॥ जठरे बिन्दुकाकारा जायन्ते भिषगुत्तम ॥११॥ बिल्वमूलफलं पाठा त्रिकटु बृहतीद्वयम् ॥ क्वाथश्च गुडयुक्तश्च बालानाञ्च ज्वरे हितः ॥ १२ ॥ स्त्रीणां स्यात्पानमेतेषां बालानां ज्वरनाशनम् ॥ १३ ॥ अफारासे कुखि फूली रहे, श्वासआदि दोषोंसे पीड़ित हो वह उत्फुल्लिकासंज्ञकरोग होता है बालकोंको दुःख करनेवाला है ॥९॥ कुक्षि उत्फुलित रोगमें पहले जो दोष आदिकोंसे रुधिरको निकसावे पीछे दूधके दोषको निवारण करे ॥ १० ॥ अग्निसे अति प्रबल पसीना दिलावे, शलाकासे दग्ध करे, उदरमें बिंदुवोंसरीखे आकार होजावे ऐसा दग्ध करे ॥ ११ ॥ बेलगिरीकी जड और फल, पाठा, त्रिकटु अर्थात् सूंठ, मिरच, पीपल, दोनों कटेहली, इनका क्वाथ बना गुड मिला देना बालकोंको हितदायक कहा है ॥ १२ ॥ इस क्वाथको बालककी माता स्त्रीको पिलावे तो बालकोंके ज्वरका नाश होता है ॥ १३ ॥ अथ बालरोगचिकित्साके अन्य उपाय । हितः पर्पटकक्वाथः शर्करामधुयोजितः॥बालानां ज्वरनाशाय कैरातं मधुसंयुक्तम् ॥१४॥रास्नाकर्कटकं भार्गीचूर्णं च मधुसं- युतम् ॥ लेहो वा बालकस्यापि श्वासकासनिवारणः ॥१५ ॥ पथ्यावचानागरकं घनं कर्कटमेव च ॥ चूर्णं सगुडमेवं हि बालानां कासनाशनम् ॥ १६ ॥पलाशभेदं त्रिफलात्रपुसीवरी- मागधीः॥ पिष्ट्वा तण्डुलतोयेन सिताढ्यं मूत्ररोधजित् ॥१७॥