भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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अ० ९४ ] भाषाटीकासमेता । ( ४६१ ) अथ बालकोंकी वाणीको करनेवाले औषध । त्रिकटु त्रिफला धान्या यवानी सालमूलिका॥वचा ब्राह्मी तथा भार्ङ्गी चूर्णञ्च मधुना हितम् ॥ वाक्पटुत्वञ्च बालानां नादो वीणासमस्वरः ॥ २५ ॥ सूंठ, मिरच, पीपली, धनियां, अजवायन, सालवृक्षकी जड़, वच, ब्राह्मी, भारंगी, इनका चूर्ण बना शहदके संग चाटनेसे बालककी जुवान अति चपल होती है और वीनके समान शब्दका स्वर होता है ॥ २५ ॥ अथ बालकोंके अपस्माररोगकी चिकित्सा । यस्य श्वासो विचित्तन्यं तन्द्रा चातीव वेपथुः॥शिरोर्तिः संज्वर- श्चैव सचासाध्यो भिषग्वर ॥२६॥ लालाकृतिर्विचित्तन्यं तृप्त- विश्रान्तलोचनम्॥स्तब्धाङ्गविकृतिर्यस्य चापस्मारी च उच्यते ॥ २७॥ अपस्मारे तु बालस्य शीतलानि प्रयोजयेत्॥ वचा- सैन्धवपिप्पल्यो नस्यं हि गुडनागरः ॥ २८ ॥ रसं चागस्ति- पत्रस्य मरिचैः प्रतियोजितम् ॥ एतेन प्रतिसौख्यं स्यात्तदा चान्दोलनं हितम् ॥ २९ ॥ मस्तकान्ते ललाटे च दहेल्लोहश- लाकया ॥ ३० ॥ जिसके अत्यन्त श्वास हो, चेत नहीं रहे, तंद्राहो, अत्यंत कंपनाहो, शिरमें पीडाहो, ज्वरहो हे वैद्य ! वह असाध्य रोग होता है ॥ २६ ॥ लाल आकृतिहो, चेत नहीं हो, और फटे हुए घूमते हुए नेत्रहों, अंग जकड़बंध बुरा वर्णवाला होजावे वह अपस्मार अर्थात् मृगीरोग जानना ॥ २७ ॥ अपस्मार रोगमें बालकको शीतल वस्तु देनी चाहिये और वच, सेंधानमक, पीपली, सोंठ, इनको मिला नस्य देवे ॥ २८ ॥ अथवा अगस्तिवृक्षके पत्तोंके रसमें मिरच मिला नस्य देवे, इसप्रकार करनेसे सुख होजाये तब आंदोलन अर्थात् हिलाने चलानेका कर्म करे ॥ २९ ॥ मस्तकके अंतमें शिरके ऊपरकी नसको शलाईसे दग्ध करना हित है ॥ ३० ॥ अथ बालकोंके पूतनाका दोष । शून्यागारे देवकुले श्मशाने देवमध्यगे ॥ चत्वरे सङ्गमे नद्यो- र्भयक्षुभितबालके ॥३१॥ संक्रामन्ति भिषक्श्रेष्ठबालकस्यापि पूतनाः ॥३२॥ लोहिता रेवती ध्वांक्षी कुमारी शाकुनी शिवा॥