भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 93

॰अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । (६१) अथ दूधके पीनेकी विधि। अल्पाम्बुपानव्यायामात्कटुतिक्ताशने लघु ॥ पिण्याकाम्ला- शिनीनां तु गुर्वभिष्यन्दि शीतलम् ॥ २६ ॥ थोडा पानी पीनेवाली, फिरनेवाली, कडवा तीखा खानेवाली, गौआदिका दूध हलका होता है और खली तथा खट्टे पदार्थ खानेवाली गौआदिका दुग्ध भारी, अभिष्यंदी और शीत होता है ॥ २६ ॥ क्षीणानां दुर्बलानाञ्च तथा जीर्णज्वरार्दिते॥दीप्ताग्नीनामतन्द्राणां श्रमशोषविकारिणाम् ॥ २७ ॥ श्वासिनां विषमाग्नीनां रेतो- ऽल्पानां व्यवायिनाम्॥तथा च राजरोगाणां क्षीरपानं विधीयते ॥ २८ ॥ न शस्तं लवणैर्युक्तं क्षीरं चाम्लेन वा पुनः॥ करोति कुष्ठं त्वग्दोषं तस्मान्नैव हितं मतम् ॥ २९ ॥ क्षीण, दुर्बल, जीर्णज्वरसे पीडित, दीप्त अग्निवाला, तंद्रासे वर्जित, श्रम और शापके विकार वाले ॥ २७ ॥ श्वासवाले, विषम अग्निवाले, अल्पवीर्यवाले मैथुन करनेवाले, और राजरोगवाले इन सबोंको दूधका पान कराना चाहिये ॥ २८ ॥ नमकसे संयुक्त अथवा खट्टे पदार्थसे संयुक्त किया दूध अच्छा नहीं है यह कुष्ठको और खालमें रोगको करता है इसलिये यह हित नहीं है ॥ २९ ॥ अथ गायके दहीके गुण । अम्लं स्वादुरसं ग्राहि गुरूष्णं वातरोगजित् ॥ मेदःशुक्रबलश्ले- ष्मरक्तपित्ताग्निशोफकृत् ॥ ३० ॥ स्निग्धं विपाके मधुरं दीपनं बलवर्द्धनम् ॥ वातापहं पवित्रं च दधि गव्यं रुजापहम् ॥ ३१ ॥ गायका दही खट्टा है । स्वादु रसवाला है, कब्जको करता है, भारी है, गर्म है, वातरोगको जीतता है और मेद, बल, वीर्य, कफ, रक्त, पित्त, अग्नि शोजाको करता है ॥ ३० ॥ स्निग्ध है और विशेष करके पाककालमें मधुर है, अग्निको जगाता है, बलको बढाता है, वायुको नाशता है, पवित्र है और रोगको हरता है ॥ ३१ ॥ अथ बकरीके दहीके गुण । आजं दधि भवेच्छोष्णं क्षयवातविनाशनम् ॥ दुर्नामश्वासकासेषु हितमग्निप्रदीपनम् ॥ ३२ ॥ विपाके मधुरं वृष्यं रक्तपित्तप्रसाद- नम् ॥ शस्तं प्राभातिकं प्रोक्तं वातपित्तनिबर्हणम् ॥ ३३ ॥