हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६२ ) हारितसंहिता । [ प्रथमस्थाने ] बकरीका दही गर्म है, क्षयको और वातको नाशता है और बवासीर, श्वास, खांसीमें हित है, अग्निको जगाता है ॥ ३२ ॥ पाककालमें मधुर है, वीर्यमें हित है, रक्तपित्तको साफ करता है उसमें भी प्रभातका दही अच्छा है वात और पित्तको दूर करता है ॥ ३३ ॥ अथ भैंसके दहीके गुण । घनं माहिषमुद्दिष्टं मधुरं रक्तदोषकृत् ॥ कफशोफहरं स्वस्थं पित्तकृद्वातकोपनम् ॥ ३४॥ भैंसका दही गाढ़ा है, मधुर है, रक्तदोषको करता है, कफको और शोजको हरता है, स्वस्थ है, पित्तको करता है, वातको कोपता है ॥ ३४ ॥ अथ ऊँटनीके दहीके गुण । विपाके कटु सक्षारं गुरु भेद्यौष्ट्रकं दधि ॥ वातमर्शांसि कुष्ठानि क्रिमीन्हंत्युदरं परम् ॥ ३५ ॥ ऊंटनीका दही विपाकमें तीखा, खारा, भारी, मलका भेदनेवाला, वायु, अर्श, कोढ, कृमि और उदररोगोंका नाश करता है ॥ ३५ ॥ अथ स्त्रीके दहीके गुण । स्निग्धं विपाके मधुरं बल्यं संतर्पणं हितम् ॥ चक्षुष्यं ग्राहि दोषघ्नं दधि नार्या गुणोत्तमम् ॥ ३६ ॥ स्त्रियोंका दही चिकना, विपाकमें मधुर, बल देनेवाला, धातुओंको तृप्त करनेवाला, ठंडा, नेत्रोंको हितकर, ग्राही वातादिदोषोंको नाशनेवाला और बडा गुणकारी है ॥ ३६ ॥ अथ भेडके दहीके गुण । कोपनं कफवातानां दुर्नाम्नां चाविकं दधि ॥ दीपनीयं तु चक्षुष्यं पांडुकृच्चापि वातुलम् ॥३७ ॥ रूक्षमुष्णं कषायं स्यादत्यभिष्यं- दि दोषलम् ॥ रसे पाके च मधुरं कषायं कुष्ठवर्द्धनम् ॥ ३८॥ भेड़ का दही कफ और वात तथा अर्शरोगको कोपनेवाला, जठराग्निको प्रदीप्त करनेवाला, नेत्रको हितकर, पांडुरोगको उपजानेवाला, और वायु उत्पन्न करनेवाला होता है॥३७॥ रूखा, गरम, कसैला, श्लेष्माको पैदा करनेवाला, दोषोंको उपजानेवाला, रसमें और पाकमें मधुर और कसैला, कुष्ठरोगको बढ़ानेवाला होता है ॥ ३८ ॥ अथ वर्षाकालके दहीके गुण । वार्षिकं पित्तकृद्वातशमनं कफकोपनम् ॥ गुल्मार्शः कुष्ठरोगे च रक्तपित्ते न शस्यते ॥ ३९ ॥