हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ८ ] भाषाटीकासमेता । (६३) वर्षाकालका दही पित्तकारक है, वात शांत करता है और कफको कोपता है और गुल्मरोग, बवासीर, कुष्ठ, रक्तपित्तमें अच्छा नहीं है ॥ ३९ ॥ अथ शरद्ऋतुके दहीका गुण । शारदं दधि गुर्व्वम्लं रक्तपित्तविवर्द्धनम् ॥ शोफतृष्णाज्वरार्त्तानां करोति विषमज्वरम् ॥ ४० ॥ शरद्ऋतुका दही भारी है, खट्टा है, रक्तपित्तको बढ़ाता है और शोजा,तृषा, ज्वरसे पीडितोंके विषमज्वरको करता है ॥ ४० ॥ अथ हेमंतऋतुके दहीका गुण । गुरु स्निग्धं सुमधुरं कफकृद्वलवर्द्धनम् ॥ वृष्यं मेध्यं च हैमन्तं पुष्टिदं तुष्टिवृद्धिदम् ॥ ४१ ॥ हेमंतऋतुका दही भारी है, मधुर है, कफको करता है, बलको बढ़ाता है, वीर्यमें हित है, पवित्र है, पुष्टिको देता है और तुष्टिको बढ़ाता है ॥ ४१ ॥ अथ शिशिरऋतुके दहीका गुण । वृष्यं बलकरं पैत्तं श्रमस्यापहरं परम् ॥ शैशिरं सघनं चाम्लं पिच्छलं गुरु चैव च ॥ ४२ ॥ शिशिरऋतुका दही कडा है, खट्टा है, कफकारी है, भारी है, वीर्यमें हित है, बलको करता है, पित्तमें अच्छा है, श्रमको हरता है ॥ ४२ ॥ अथ वसंतऋतुके दहीका गुण । वातलं मधुरं स्निग्धं किञ्चिदम्लं कफात्मकम् ॥ बलकृद्वीर्य्यकृत्प्रोक्तं वसन्ते न प्रशस्यते ॥ ४३ ॥ वातल है, मीठा है, चिकना है, कुछ खट्टा है, कफकी प्रकृतिवाला है, बलको और वीर्यको करता है, कफकारक है, इसलिये वसंतऋतुमें दही अच्छा नहीं है ॥ ४३ ॥ अथ ग्रीष्मऋतुके दहीका गुण । लघु चाम्लं भवेद्ग्रीष्मे चात्युष्णं रक्तपित्तकृत् ॥ शोषभ्रमपिपासाकृद्दधि प्रोक्तं न ग्रैष्मिकम् ॥ ४४ ॥ ग्रीष्मऋतुका दही हलका है, खट्टा है, अतिगर्म है, रक्तपित्तको करता है और शोष, भ्रम, पिपासाको करता है इसलिये ग्रीष्ममें दधि अच्छा नहीं कहा गया ॥ ४४ ॥ अथ दहीका वर्जना । शरद्ग्रीष्मवसन्तेषु दोषकृन्न हितं भवेत् ॥ न नक्तं दधि भुञ्जीत