हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
आ. न. [प्रविष्टि निरस्त] ३०७३ एवं सुलभ आरक्षित पुस्तक आयु. पु. [प्रविष्टि निरस्त]
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
आगुरू पुरोहित बोधेशराज पण्डितज्यू ३०७३ श्रीः । हारीतसंहिता । आरक्षित पुस्तकम् श्रीमदात्रेयमहर्षिहारीतमुनिसंवादरूपा । ( वैद्यकग्रन्थः ) बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनु- वादितया भाषाव्याख्यया समन्विता । उन्नाव-मण्डलान्तर्गत-टेढ़ाचिलौली-ग्रामनिवासिनायुर्वेदाचार्य- कविरत्नकालीप्रसादत्रिपाठिना संशोधिता च । खेमराज-श्रीकृष्णदास इत्यनेन मुम्बय्यां स्वकीये “श्रीवेङ्कटेश्वर” (स्टीम्) मुद्रणालये मुद्रयित्वा प्रकाशिता । शके १८४९, संवत् १९८४. अस्य ग्रन्थस्य सर्वेऽधिकाराः प्रकाशका- धीनाः सन्ति ।
यह पुस्तक खेमराज श्रीकृष्णदासने बम्बई खेतवाड़ी ७ वीं गली खम्बाटा लेन निज "श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम् प्रेसमें अपने लिये छापकर यहीं प्रकाशित की।
श्रीधन्वन्तरिस्तवः । आविर्बभूव जगतः परिपालनाय कृत्वा करे कलशमम्बुनिधेः सुधायाः । यश्चामरत्वकरणाय दिवि स्थितानां धन्वन्तरिं तमहमाद्यविदं समीडे ॥ १ ॥ ये नाम केविदिह ते प्रथयन्त्यवज्ञां विद्यानवद्यगदने विमुखाग्रगास्ते । वाचां भटाः स्वभवने विभवो भवन्तु प्राप्स्यन्ति किं सुपदर्वी तव शिष्यकाणाम् ॥ २ ॥ दृष्टेदस्ति किमपिप्रथितुं प्रभूताः सन्तीह तस्य करणे किल तेऽभिभूताः। त्वन्नाथ किन्तु रचनाचतुराढ्यचक्र- चूडामणिप्रखरकान्तिरसीति सत्यम् ॥ ३ ॥ अद्यापि यद्यपि विदो विचरन्ति वैद्याः सन्तस्त्वनन्तमहतामपि ते भवन्तः । सन्तीह किन्तु बहवः किल वैद्यकल्पा धन्वन्तरेऽवगतसत्त्वहरा हि दुःखम् ॥ ४ ॥ वाचामगोचरचरित्र न चित्रमत्र यन्नास्तिका ननु भवन्ति चिकित्सकाज्ञाः । अम्भोमलापनयनप्रभविष्णुकोऽपि पङ्कं प्रसादयति किं कतकः कदाचित् ॥ ५ ॥ अष्टाङ्गप्रङ्गरहितान्विहिताभिमाना- न्मूढान्दरिद्रहृदयांश्च दयाविहीनान् । वैद्यान्नियम्य वितरिष्यति यः सुभावं धन्वन्तरिः स भगवानवतु त्रिलोकीम् ॥ ६ ॥ कालीप्रसादकविना विहितः स्तवोऽयं धन्वन्तरेर्भगवतः करुणामयस्य । श्रेयस्तनोतु भवतां भवतां बुधानां धुन्वन्सुधामरझरीवचनस्तुतानाम् ॥ ७ ॥ कालीप्रसाद शास्त्री त्रिपाठी ।
वक्तव्य । हारीतसंहिता सुप्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसकी चर्चा या इसके प्रणेताकी चर्चा वैद्यके सैकड़ों ग्रन्थोंमें की गयी है। इस संस्करणमें अनेकों विशेष विषय बताये हैं। जिन्हें आप पढ़नेसे और गत संस्करणके देखनेसे ही समझ सकेंगे। अबकी सभी त्रुटियां यथासम्भव निकाल दी गयी हैं। इस कारण इसका संशोधन प्रयागीय मासिकपत्र "आलोक"के सम्पादक, आयुर्वेदाचार्य कविरत्न पं० कालीप्रसाद शास्त्रीजीने किया है। आशा है इससे विद्वन्मनोरञ्जन अवश्य होगा। संस्कृत और हिन्दी अल्प ही परि- वर्तनसे बड़ी उत्तम हो गयी है। गूढ़ और गम्भीर उलझनोंको सुलझानेके लिये विशद् गवेषणापूर्ण सरल संस्कृत और हिन्दीमें टिप्पणियां लगा दी गयी हैं। साथ ही मनोहर धन्वन्तरिस्तव भी प्रथम पाठार्थ लगा दिया है, जिससे ग्रन्थकी उपयोगिता और भी बढ़ गयी है। हमें आशा है कि, हमारा यह ग्रन्थ वैद्यकप्रेमियोंमें विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा। प्रकाशक- २० । ३ । १९२७ खेमराज श्रीकृष्णदास. अपनी बात । प्रिय पाठको ! आपके हाथमें यह ग्रन्थ रखते हुए मुझे हर्ष होता है। हमारा दृढ़ विश्वास है कि इस नूतन संस्करणको देखकर आप अवश्य सानन्द होंगे। यथासम्भव और यथाविवेक हमने इसके प्रत्येक भागपर दृष्टि डाली है। जो कुछ इसके उत्तम बनानेमें कर सकते थे किया। यह बात आप गतसंस्करणको देखकर समझ लेंगे। हमारा विशेष ध्यान मूलभागपर रहा है। उसीको शुद्ध और सुपाठ्य बनानेमें भरसक प्रयत्न हमने किया है। टीकामें सुबोधता और यथार्थताका ध्यान रखते हुए उचित परिवर्तन यथास्थानपर किया गया है। हिन्दी पुरानी है वह वर्तमानपद्धतिके अनुकूल कहां तक बन सकती है ? तब भी ऐसी नहीं जो सुश्राव्य और समझने योग्य न हो, वैद्यक संसारमें हारीतसंहिताकी प्रतिष्ठा कम नहीं किन्तु आर्ष और वृत्तम- ङ्गके गम्भीरगर्तमें पड़कर इसका जो भाग दुर्बोध और अदृश्य हो गया था वह पुनरुद्धृत हुआ है। हम अपने अनुभवसे कह सकते हैं कि इसका कालज्ञान, वस्तुविवेक, गुणदोषदर्शन सरल, सर्वमान्य, उपादेय और अनुभूत नुस्खांका समूह अन्यत्र दुर्लभसा है। विश्वास है कि अवशिष्ट त्रुटियोंकी ओर वैद्यकके विशिष्ट विद्वान् हमारा ध्यान दिलाएँगे, जिससे हम पुनस्त्वागत संस्करणमें उनका संशोधन कर सकेंगे। उचित ग्रन्थोंका सर्वमान्य बनाना सभीका काम होना चाहिये जिससे वे अपनी विशुद्ध प्राचीन प्रभा पुनः पा सकें। किमधिकं महत्सु । सजीवन औषधालय मु० चिलौली पो० टेढ़ा, ) निवेदक-कालीप्रसाद त्रिपाठी ( श्रीकर ) जि० उन्नाव चैत्रकृष्ण द्वितीया सं० १९८३ } सम्पादक आलोक आयुर्वेदाचार्य, कविरत्न,
हारीतसंहिताविषयानुक्रमणिका ।
विषय. | पृष्ठ. | विषय. | पृष्ठ. अथ प्रथमस्थानम् । | | लंघनकी योग्यता .... | १३ मंगलाचरण .... | १ | जठराग्निका कर्म .... | ,, आत्रेयहारीतसंवाद .... | ,, | सामनिरामव्याधिका उपक्रम .... | १४ वैद्यशास्त्रपठनविधि .... | ५ | वैद्यकी योग्यता .... | ,, चिकित्सासंग्रह .... | ७ | पुण्यार्थ उपचार करनेयोग्य मनुष्य | शल्यतंत्र .... | ८ | उपचारसे धन लेने योग्य मनुष्य .... | १५ शालाक्य .... | ,, | यश मिलने योग्य मनुष्य .... | ,, कायचिकित्सा .... | ,, | चिकित्सा करनेको अयोग्य मनुष्य .... | ,, अगदोंके नाम .... | ९ | वैद्यकर्तव्यका उपसंहार .... | १६ बालचिकित्सा .... | ,, | देशकालबलाबल .... | ,, विषतन्त्रके नाम .... | ,, | देशके भेद .... | ,, भूतविद्याका नाम .... | ,, | अनूपदेशलक्षण .... | ,, वाजीकरण .... | ,, | जाङ्गलदेशलक्षण .... | १७ रसायनतन्त्र .... | १० | साधारणदेशलक्षण .... | ,, उपाङ्गचिकित्सा .... | ,, | कालज्ञान .... | १८ वैद्यशिक्षाविधान .... | ,, | कालका स्वरूप .... | ,, उपचार करनेकी योग्यता .... | ११ | उत्पातकालका स्वरूप .... | ,, देशकाल आदिका ज्ञान .... | ,, | प्रवर्त्तककालका स्वरूप .... | ,, उपचार करनेका फल .... | ,, | संहारकालका स्वरूप .... | १९ वैद्यका वैद्यत्व .... | ,, | कालका सनातनत्व .... | ,, दो प्रकारका उपचार उपक्रम .... | ,, | कालका नाशक स्वरूप .... | ,, दो प्रकारके वैद्य .... | ,, | अन्यकालोंके स्वरूप .... | ,, व्याधिके साध्य असाध्य विचार .... | १२ | ऋतुचर्य्या .... | ,, उपचारका फल .... | ,, | अयनोंका वर्णन .... | २० दोषके शेष रहजानेसे हानि .... | ,, | दक्षिणायनका लक्षण .... | ,, अपथ्यसे हानि .... | १३ | उत्तरायणका लक्षण .... | २१ | | वर्षार्ऋतुलक्षण. .... | ,, | | शरद्ऋतुका लक्षण .... | २२
( २ ) हारीतसंहिता-
| विषय. | पृष्ठ. | विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|---|---|
| हेमन्तवर्णन .... | २४ | वायुका कोप .... .... | ३५ |
| शिशिरवर्णन .... | २५ | पित्तप्रकोपानदान.... .... | ३६ |
| वसंतऋतुका वर्णन .... | " | कफप्रकोपानदान.... .... | ३७ |
| ग्रीष्मवर्णन .... | २६ | द्वौ दोषोंके कोपकी उत्पत्ति .... | " |
| इसके वाद वयोज्ञानका कथन .... | २७ | सन्निपातकी उत्पत्ति .... | ३८ |
| मध्यमवयोर्लक्षण .... | " | रसोंके गुणदोषका वर्णन .... | " |
| प्रकृतिका ज्ञान .... | २९ | षड्रसके गुणदोषवर्णन .... | ३९ |
| वातादिप्रकृतिका ज्ञान .... | " | रसगुणोंके गुणकर.... .... | " |
| वातप्रकृतिका लक्षण .... | " | वातादिविरुद्धरस .... .... | " |
| पित्तप्रकृतिका लक्षण .... | " | दोषोंके विरोधीरसोंका वर्णन .... | " |
| कफप्रकृतिका लक्षण .... | ३० | वातादिकोंमें रसयोजना .... | ४० |
| समप्रकृतिका लक्षण .... | " | मधुररसका वर्णन .... .... | " |
| पूर्वदिशाका वायु .... | " | कडुए रसका वर्णन .... | " |
| आग्नेयदिशाका वायु .... | ३१ | चरपरे रसका वर्णन .... | " |
| दक्षिणदिशाका वायु .... | " | खट्टे रसका वर्णन.... .... | ४१ |
| नैर्ऋत्यदिशाका वायु .... | " | कसैले रसका वर्णन .... | " |
| पश्चिमदिशाका वायु .... | ३२ | खारे रसके वीर्य्यका वर्णन .... | " |
| वायव्यदिशाका वायु .... | " | पानीका वर्ण .... .... | ४२ |
| उत्तरदिशाका वायु .... | " | जलके भेद .... .... | " |
| ऐशानदिशाका वायु .... | " | गंगापानीकी परीक्षा .... | " |
| अन्य पंचविध वायुके गुण .... | " | गंगाजलके गुण .... .... | ४३ |
| वस्त्रवायुके गुण .... | " | सामुद्र पानीका लक्षण और गुण.... | " |
| वेणुवायुगुण .... | ३३ | चारप्रकारकी वृष्टि.... .... | " |
| कांस्यपात्रवायुके गुण .... | " | रात्रिको वर्षे हुए पानीके गुण-दोष वर्णन .... .... | " |
| रंभातालपत्रवायुके गुण .... | " | " | " |
| खसशिखिपूच्छव्यजनवायुके गुण.... | " | दुर्दिनमें वर्षेहुए पानीके गुण-दोषवर्णन .... .... | " |
| षड़तुओमें उत्तमदिक् वायु .... | ३४ | " | " |
| प्रतिदिन षड्ऋतु .... | " | दुर्दिनमें वर्षे हुए पानीके गुणदोष वर्णन .... .... | ४४ |
| सचिववायु .... | " | " | " |
| ऋतुभेदसेवातादिकोंका संचय, कोप, उपराम | ३५ | क्षणवृष्टिके गुण .... .... | " |
विषयानुक्रमणिका. ( ३ ) विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ. श्रावणवृष्टिके गुण ..... .... ४४ | अंशूदकके गुणदोष .... ५४ भादुवाके वृष्टिके गुण.. .... ” | आरोग्योदकके गुणदोष .... ” आश्विनवृष्टिके गुण .... ” | शीतपानीके गुण ५५ कार्तिकके वृष्टिके गुण .... ४५ | गर्म पानीके गुण .... .... ” स्वातिजलके गुण.... .... ” | पानीविषयक विधि .... ” अकालवृष्टिके लक्षण और गुण ... ” | दुग्धवर्गवर्णन .... .... ५७ अकालमें वर्षाहुई वर्षाके पानीका लक्षण ” | दूधकी उत्पत्ति .... .... ” धारसंज्ञक आदि चारप्रकारके .... ” | पृथक् २ रंगकी स्त्रियोंके दूध .... ५८ कारजलकी उत्पत्ति .... .... ४६ | पृथक् २ रंगकी गायोंका दूध .... ५९ कारजलके गुण .... .... ” | गायके दूधके गुण .... ” तुषारपानीके गुण ... .... ” | बकरीके दूधके गुण .... ” पृथ्वी ऊपरके आठ प्रकारका जल ४७ | भेडके दूधके गुण .... ” नदीके पानीका गुण .... ” | भैंसके दूधके गुण .... ६० औद्भिद पानीका गुण दोष .... ४८ | ऊंटनीके दूधके गुण .... ” झिरनाके पानीका गुण .... ” | स्त्रियोंके दूधके गुण .... ” चौंड्य संज्ञक पानीका गुण .... ” | प्रभातके दूधके गुण .... ” कूंवाके पानीका गुण दोष .... ” | दिनके दूधका गुण .... ” तलावके पानीके गुण दोष .... ” | रात्रिके दूधका गुण .... ” सारसपानीके गुण दोष .... ४९ | दूधपीनेकी विधि .... ६१ बावडीके जलके गुण .... ” | गायके दहीके गुण .... ” नदियोंकी प्रकृति .... ” | बकरीके दहीके गुण .... ” सदा बहनेवाली नदीके गुण दोष ” | भैंसके दहीके गुण .... ६२ पत्थरोंवाली नदीके गुण दोष ५० | ऊंटनीके दहीके गुण .... ” बालूरेतवाली नदीके पानीके गुण दोष ” | स्त्रीके दहीके गुण .... ” उत्तरसे बहनेवाली नदियों और पानीके | भेडके दहीके गुण .... ” गुण दोष .... ” | वर्षाकालके दहीका गुण .... ” तापी आदिनदियोंके गुण दोष ५१ | शरदऋतुके दहीका गुण .... ६३ पृथिवीके भागका पानी .... ५२ | हेमंतऋतुके दहीका गुण .... ” पापोदकका गुण दोष .... ५३ | शिशिरऋतुके दहीका गुण .... ” रोगोदकके गुणदोष .... ” | वसंतऋतुके दहीका गुण .... ”
( ४ ) ॥ हारीतसंहिता ॥ विषय. . पृष्ठ. | विषय. . पृष्ठ. ग्रीष्मऋतुके दहीका गुण .... ६३ | हाथीके मूत्रका गुण .... ७१ दहीका वर्जना .... ,, | घोड़ेके मूत्रका गुण .... ,, दहीके खानेकी विधि .... ६४ | ऊंटके मूत्रका गुण .... ,, गायके छाछका गुण .... ,, | गधाके मूत्रका गुण .... ,, भैंसके तक्रका गुण .... ,, | नरके मूत्रका गुण .... ,, बकरीके तक्रका गुण .... ,, | प्रसूता और अप्रसूताके मूत्रका गुण ७२ तक्रवर्णन.... .... ६५ | मूत्रविशेष .... ,, साधारण तक्रका गुण .... ,, | इक्षुवर्ग .... ,, बहुत पानी वालेतक्रका गुण .... ,, | स्वादुईखका गुण .... ७३ विशेष वर्णन .... ६६ | सफेद ईखका गुण .... ,, हाथसे मर्दित किये तक्रका गुण .... ,, | काली ईखके गुण .... ,, तक्रनिषेध .... ,, | यंत्रसे निकालेहुए रसका गुण .... ,, तक्रपानविधि .... ,, | दांतोंसे पीड़ितकिये रसका गुण .... ,, नौनीघृतकी विधि .... ,, | बासीरसका गुण .... ७४ फेनविधि .... .... ६७ | पक्क रसका गुण .... ,, गायके घृतका गुण .... ,, | फांणित रसका गुण .... ,, बकरीके घृतका गुण .... ६८ | गुड़ का गुण .... ,, भैंसके घृतका गुण .... ,, | गुड़ की खांडका गुण .... ,, ऊंटनीके घृतका गुण .... ,, | साधारण खांडका गुण .... ७५ भेड़के घृतका गुण .... ,, | मिश्रीके खांडका गुण .... ,, घोड़ीके घृतका गुण .... ,, | सुंदर खांडका गुण .... ,, दूधसेही निकाले घृतका गुण .... ६९ | गुड़विशेषता .... ,, पुराने घृतका गुण .... ,, | कांजिकवर्ग .... ७६ नारीके घृतका गुण .... ,, | चावलोंके पानीका गुण .... ,, घृतका विशेष वर्णन .... ,, | तुषोदकका गुण .... ,, मूत्रवर्णन.... .... ७० | जव और गेहूंकी कांजीका गुण.... ,, गोमूत्रके गुण .... ,, | तैलयुक्त कांजीका गुण .... ,, बकरीके मूत्रका गुण .... ,, | युग्मंधर कांजीका गुण .... ७७ मेंढाके मूत्रका गुण .... ,, | कांजीका परिहार .... ,, भैंसाके मूत्रका गुण .... ७१ | कांजीकी प्रशंसा .... ,,
विषयानुक्रमणिका. ( ५ ) विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ. चावलोंके मंडका गुण.. .... ७७ | सालपर्णी और टेसूके तेलका गुण.... ८३ लालचावलके मंडका गुण .... ७८ | वसावर्ग .... .... " सफेदचावलके मंडका गुण .... " | धान्यवर्ग .... .... ८४ जवोंके मंडका गुण .... " | शालिचावलका वर्णन.... .... " गेहूँके मंडका गुण .... .... " | शालियोंके गुणदोष .... .... " क्षुद्रअन्नके मंडके गुण .... .... " | क्षुद्रधान्यवर्ग .... .... ८५ कोदू अन्नके मंडका गुण .... " | श्यामाक और कोदूके गुणदोष .... ८६ क्षुद्रअन्नके कांजीका गुण .... " | विदलन्नका गुण .... .... " यूषवर्ग .... .... ७९ | जवोंका गुण .... .... " कुलथीके यूषका लक्षण गुण .... " | गेहूँका गुण .... .... " हरड़के यूषका गुण .... " | तिलोंका गुण .... .... " मूंगके यूषका गुण .... " | चनाका गुण .... .... ८७ चनाके यूषका गुण .... " | उड़दका गुण .... .... " उड़दके यूषका गुण .... .... ८० | मूंगका गुण .... .... " अन्ययूषोंके गुण .... .... " | तुवरका गुण .... .... " तेलवसावर्ग .... .... " | मोठका गुण .... .... " तिलोंके तेलका गुण .... " | कुलथीका गुण .... .... ८८ सरसोंके तेलका गुण .... .... ८१ | चौलाईका गुण .... .... " अलसीके तेलका गुण .... " | मटरका गुण .... .... " अरंडके तेलका गुण .... " | मसूरका गुण .... .... " तेलकी विशेषता .... .... ८२ | धान्यवर्गका उपसंहार .... .... " लालअरंडके तेलका गुण .... " | शाकवर्ग .... .... ८९ कुसुमके तेलका गुण .... " | जीवंती शाकके गुण.. .... " अन्यान्य तेल .... " | चौलाईके शाकके गुण .... " कुरंटाके तेलका गुण .... " | कासविंदके शाकके गुण .... " तेलकी विशेषता .... .... ८३ | जीवंती और मुकोह शाकके गुण .... " स्वच्छ तिवसाका तैल अच्छोड़का तेल .... " | बथुवा और चिल्ली शाकके गुण .... ९० नारियलका तेल महुवाके तेलका गुण .... " | केतकी और मेथी शाकके गुण .... " काकड़ी, खीरा, कोदला आदिके | सरसों और सौंफके शाकका गुण .... " तेलका गुण .... .... " | कंदेली और कुसुम्भा शाकके गुण .... "
( ६ ) हारीतसंहिता
विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ. चूकाशाकके गुण .... ९० | अम्लीका गुण .... ९७ दूसरे शाकोंके गुण .... ९१ | दाखका गुण .... ,, कफकारक और वातल शाक .... ,, | नारियलका गुण .... ,, शाकोंके विशेष गुण .... ,, | केलाके फलका गुण .... ९८ अन्य प्रकारके शाक .... ,, | कैथका गुण .... ,, कोहेलाका गुण .... ,, | खजूरिआ अथवा छुहाराका गुण .... ,, कुरङ्गेके शाकका गुण .... ९२ | सुपारीका गुण .... ,, करेलाका गुण .... ,, | नागरपानका गुण .... ,, लालतूरिके पुष्पका गुण.. .... ,, | कत्थाका गुण .... ९९ तोरि ककोड़ा करेला कडुई .... ,, | चूनेका गुण .... ,, तोरैका गुण .... ,, | कत्था कपूरसे संयुक्त नागरपानका गुण ,, परवलका गुण .... ,, | मधुवर्ग .... .... ,, बैंगनका गुण .... ,, | शहदका गुण .... ,, बड़ी कटेलीका गुण .... ९३ | शहदकी विशेषता .... १०० कन्दशाकका गुण .... ,, | मद्यवर्ग .... .... १०१ जमीकन्दका गुण .... ,, | सीधुमदिराका गुण .... ,, अम्लिक कन्दका गुण .... ,, | गौड़ी मदिराका गुण .... ,, पिण्डशाकका गुण .... ,, | मत्स्यंडी मदिराका गुण .... १०२ आलूका गुण .... ,, | माध्वीकमदिराका गुण .... ,, प्याजका गुण .... ,, | साधारणमदिराका गुण .... ,, रतालूका गुण .... ९४ | पैष्टी मदिराका गुण .... ,, हस्तिकंदका गुण .... ,, | महुआवृक्षकी मदिराका गुण .... ,, वाराहकन्दका गुण .... ,, | ताड़की मदिराका गुण .... १०३ फलवर्ग .... .... ,, | मदिराकी विशेषता .... ,, आंबके फलका गुण .... ९५ | चौपायोंका और दुपायोंका मांसवर्ग.... ,, जामन, बेर, अनार, चिरौंजीके गुण ,, | सरीसृपवर्णन .... १०४ विशेष वर्णन .... ,, | आनूपवर्णन .... ,, बिजौराका गुण .... ,, | जांगलवर्णन .... ,, नींबूका गुण .... ९६ | जलचरजीववर्णन .... १०५ नारंगीका गुण .... ९७ | ग्रामचारी पशुवर्ग .... ,,
विषयानुक्रमणिका. (७) विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ. ग्रामचारी पक्षी .... १०५ | जलचरोंका मांसवर्ग .... १११ हरिणीके मांसका गुण .... ” | आड़ीआदि पक्षियोंके मांसका कृष्णमृगके मांसका गुण .... १०६ | गुण .... ” चित्रांगके मांसका गुण .... ” | मकरमच्छके मांसका गुण .... ” छिकारके मांसका गुण .... ” | मच्छके मांसका गुण .... ११२ रक्तमृगके मांसका गुण .... ” | कछुवाके मांसका गुण .... ” गैंडा, रोज़, भैंस, ऊंट, घोड़ा इनके | खेंकड़ाके मांसका गुण .... ” मांसके गुण .... ” | मांसविशेषता .... .... ” शूकरके मांसका गुण .... १०७ | वर्जनीय मांस .... .... ” शशाके मांसका गुण .... ” | अन्नपानवर्ग .... .... ११३ शेहके मांसका गुण .... ” | मंडका गुण .... .... ” शल्यकनामवाले जीवके मांसका गुण ” | भातका गुण .... .... ११४ गोहके मांसका गुण .... ” | गुड़याणीका गुण .... .... ” मूषाके मांसका गुण .... १०८ | यवागूका लक्षण .... .... ” स्थलमें विचरनेवाले जीवोंका मांसवर्ग ” | मंडका विशेष गुण .... .... ” लावापक्षीके मांसका गुण .... ” | खीरका गुण .... .... ” तीतरके मांसका गुण .... ” | खिचड़ीका गुण .... .... ११५ नीलामोरके मांसका गुण .... १०९ | दालका गुण .... .... ” साधारणमोरके मांसका गुण .... ” | खलका गुण .... .... ” मुर्गाके मांसका गुण .... ” | अनारका पन्ना .... .... ” कपोतके मांसका गुण .... ” | पापड़का गुण .... .... ” परेवाके मांसका गुण .... ” | संडाकीका गुण .... .... ” ककेराके मांसका गुण .... ” | उड़द आदिके बड़ोंका गुण .... ११६ खातीचिड़ाके मांसका गुण .... ११० | शिखरनका गुण .... .... ” चकोर, तोता, मैना, इनके मांसका | घृतयुक्त दहीकें पतले शिखरनके गुण ” गुण .... .... .... ” | ग्रंथका लक्षण और गुण .... ” कुंजके मांसका गुण .... .... ” | मांसका गुण .... .... ” कोयलके मांसका गुण .... .... ” | मांसकी श्रेष्ठता .... .... ११७ विवृताक्षके मांसका गुण .... ” | भूँजे हुए मांसका गुण .... .... ” घरके बत्तकके मांसका गुण .... ” | अत्युष्णमंडका गुण .... .... ”
( ८ ) हारीतसंहिता विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ. मांडाका गुण. .... .... ११७ | स्वप्नाध्यायका वर्णन .... १२७ पूरी और घेवरका गुण .... ” | वर्ज्यस्वप्न .... ” गूंझामालपूवाका गुण .... ” | कालसे स्वप्न .... १२८ सोमालिकाका.गुण .... .... ११८ | स्वप्नमें शुभद्रव्य .... ” फेनीका गुण.. .... .... ” | अशुभद्रव्य .... ” भिन्नबडाका गुण .... .... ” | शुभस्वप्नोंका वर्णन.... .... ” अभिन्नबडाका गुण.... .... ” | शुभस्वप्न .... १२९ लड्डूका गुण... .... .... ” | अशुभस्वप्नोंका वर्णन .... १३० यवपोलिकाका गुण.... .... ११९ | स्वास्थ्यारिष्ट .... १३२ अन्नके गुणोंका उपसंहार .... ” | ध्रुवादिक न देखनेका अरिष्ट .... ” थकेहुए मनुष्यको भोजननिषेध .... ” | द्वितीयाचंद्रका अदर्शनका अरिष्ट .... ” भोजनके उपरांत मेहनत और सुरतका | कर्णघोष न सुननेका अरिष्ट .... १३३ निषेध .... .... ” | मुखश्वासादिका अरिष्ट .... ” थंडा और गरम भोजनका निषेध .... ” | प्रभातमें मस्तकशूलका अरिष्ट.... ” श्रमित आदिकोंके भोजनका निषेध .... ” | सूर्यबिंबादिकके दर्शनका अरिष्ट.... ” भोजनमें फलादिकोंका नियम .... १२० | इंद्रधनुष देखनेका अरिष्ट .... ” भोजनके पीछे बैठनेका नियम .... ” | विपरीत देखने सुननेका अरिष्ट .... १३४ भोजनमें पानीका नियम.... .... ” | शरीरके स्पर्शसे अरिष्टकथन .... ” भोजनके ऊपर व्यायाम .... ” | प्रतिबिम्ब न देखनेसे अरिष्ट .... ” भोजनके उपरांत नेत्रादिकोंका मार्जन .... ” | व्याध्यरिष्टका लक्षण .... १३५ अड़कारका नियम .... .... १२१ | अष्टमहाव्याधियोंका नाम .... ” व्यायामादिकोंका नियम .... ” | आठ महारोगोंके उपद्रव .... ” दिनमें शयन करनेका निषेध .... ” | ज्वररोगीके अरिष्ट.... .... ” दिनमें शयनकराने लायक मनुष्य.. ” | दारुण उपद्रवका अरिष्ट .... १३७ इति प्रथमस्थानं समाप्तम् | अतीसारका अरिष्ट.... .... ” सूजनका अरिष्ट .... .... ” द्वितीयं स्थानम् । | शूलका अरिष्ट .... .... ” अथ कर्मविपाक .... .... १२३ | पांडुरोगीका अरिष्ट.... .... १३८ पापदोषप्रतीकार .... .... १२५ | क्षयरोगका अरिष्ट .... .... ” अन्य अन्य रोगोंका कारण .... १२६ | श्वासरोगका अरिष्ट .... ”
विषयानुक्रमणिका. (९) विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ. बहुत दिनतकके रोगका अरिष्ट..... १३८ | रोहिणी नक्षत्र .... १४७ उदररोगका अरिष्ट .... १३९ | मृग नक्षत्र .... ,, गुल्मरोगका अरिष्ट .... ,, | आर्द्रा नक्षत्र .... ,, रक्तपित्तका अरिष्ट .... ,, | पुनर्वसु नक्षत्र .... १४८ बवासीररोगका अरिष्ट .... ,, | पुष्य नक्षत्र .... ,, विद्रधिरोगका अरिष्ट .... ,, | आश्लेषा नक्षत्र .... ,, भ्रमरोगका अरिष्ट .... १४० | मघा नक्षत्र .... ,, आर्तवका अरिष्ट .... ,, | पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र .... ,, कामला और पांडुरोगका अरिष्ट.... ,, | उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र.... १४९ भगंदरका अरिष्ट .... ,, | हस्त नक्षत्र .... ,, अश्मरीरोगका अरिष्ट .... ,, | चित्रा नक्षत्र .... ,, मूढ़गर्भका अरिष्ट .... १४१ | स्वाती नक्षत्र .... ,, अपस्माररोगका अरिष्ट .... ,, | विशाखा नक्षत्र .... ,, वातव्याधिका अरिष्ट .... ,, | अनुराधा नक्षत्र .... १५० प्रमेहका अरिष्ट .... ,, | ज्येष्ठा नक्षत्र .... ,, कुष्ठरोगका अरिष्ट .... ,, | मूल नक्षत्र .... ,, उन्मादरोगका अरिष्ट .... १४२ | पूर्वा नक्षत्र .... ,, पंचेन्द्रियविकारवर्णन .... ,, | उत्तराषाढा नक्षत्र .... ,, नक्षत्रज्ञानवर्णन .... १४३ | श्रवण नक्षत्र .... १५१ मृत्युयोगोंका वर्णन .... ,, | धनिष्ठा नक्षत्र .... ,, अमृतयोगकथन .... १४४ | पूर्वा भाद्रपदा .... ,, क्रययोगवर्णन .... ,, | रेवती नक्षत्र .... ,, योगविज्ञान .... १४५ | अश्विनी नक्षत्र .... १५२ विशेष वर्णन .... ,, | भरणी नक्षत्र .... ,, असाध्य नक्षत्र .... ,, | नक्षत्रारिष्टोंका उपसंहार .... ,, साध्य नक्षत्र .... ,, | अथ होमकी विधि .... ,, कष्टसाध्य नक्षत्र .... ,, | शांतिप्रकार .... १५३ नक्षत्रोंके पीडाकी मर्यादा .... १४६ | दूतकी परीक्षाका लक्षण .... १५५ नक्षत्रोंके भागानुसार रोगोंकी मर्यादा १४७ | वर्ज्यदूतके लक्षण.... .... ,, कृत्तिका नक्षत्र .... ,, | शुभदूतके लक्षण.... .... १५७
( १० ) हारीतसंहिता-
| विषय. | पृष्ठ. | विषय. | पृष्ठ.. |
|---|---|---|---|
| दूतलक्षणोंका उपसंहार .... | १९४ | लंघित करनेमें अयोग्य रोगी .... | १६५ |
| शकुनवर्णन .... .... | ,, | लंघित करनेमें योग्य रोगी .... | ,, |
| शुभशकुन .... .... | ,, | छः प्रकारके लंघन .... | १६६ |
| दुष्टशकुन .... .... | १९५ | विरतकज्वरलक्षण.... .... | ,, |
| मृगादिकोंका शकुन .... | ,, | दोषपरत्वसे लंघनकी मर्यादा.... | ,, |
| मृगोंके संख्याका शकुन .... | ,, | वयपरत्वसे दोषोंके कोपका प्रकार | ,, |
| मोरआदिकोंका शकुन .... | ,, | ज्वरवालेको क्वाथ देनेका समय.... | १६७ |
| काकशकुन... .... .... | १९६ | क्वाथका प्रकार .... .... | ,, |
| जाहशशादिकोंका शकुन .... | ,, | सातप्रकारसे क्वाथ देनेके समय .... | ,, |
| गमन समयके विविधपदार्थदर्शन शकुन | ,, | औषधादि देनेके समयकी संज्ञा | १६८ |
| शकुनाध्यायका उपसंहार .... | १९१ | क्वाथके सात प्रकार .... | ,, |
| इति द्वितीयस्थानं समाप्तम् ॥ | सात प्रकारके क्वाथोंका लक्षण.... | ,, | |
| सात प्रकारके क्वाथोंका कार्य .... | ,, | ||
| अथ तृतीयस्थानम्। | क्वाथरक्षणका उपदेश .... | ,, | |
| औषधपरिज्ञानविधान .... | १६१ | क्वाथसम्बन्धी अनिष्ट लक्षण .... | १६९ |
| ज्वरसे उत्पन्न होनेवाले रोग .... | १६२ | हीनक्वाथके लक्षण .... | ,, |
| ज्वरसे उत्पन्न होनेवाले अन्य | उत्तम क्वाथका लक्षण .... | ,, | |
| प्रकारके रोग.... .... | ,, | वातज्वरमें पाचनकी विधि .... | ,, |
| दिनमें शयन करनेसे होनेवाले रोग | ,, | पित्तज्वर और कफज्वरमें पाचनकी | |
| महाभयंकर रोग .... .... | १६३ | विधि .... .... | ,, |
| सर्वव्याधियोंका हेतु .... | ,, | पाचनका निषेध .... .... | १७० |
| वातादिदोषोंका पाचनकाल .... | ,, | ज्वरकी मर्यादा .... .... | ,, |
| पाचनादिक्रियाका समय .... | ,, | ज्वरमें पाचनादिदेनेकी मर्यादा.... | ,, |
| धातुगतदोषोंका पाचनकाल .... | १६४ | क्वाथके विपत्तिका प्रकार .... | ,, |
| अपकदोषमें औषधका निषेध .... | ,, | पथ्यकी आवश्यकता .... | ,, |
| लंघनका उपचार .... .... | ,, | ज्वरितको पथ्य भोजनका उपदेश | ,, |
| लंघनप्रकरण .... .... | ,, | मध्यलंघनितकी अन्नविधि .... | १७१ |
| शुद्धलंघनितका लक्षण .... | ,, | क्रमशांतिकी विधि.... .... | ,, |
| मध्यमलंघनितका लक्षण .... | ,, | क्वाथ पीनेकी विधि .... | ,, |
| अतिलंघनितका लक्षण .... | १६५ | ज्वरचिकित्सा .... .... | १७२ |
विषयानुक्रमणिका. (११) | विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ. | | कुवैद्यनिंदा .... .... १७२ | ज्वरकी विशेषता .... .... १७९ | | वैद्यका लक्षण .... .... ,, | वातज्वरमें पाचन .... .... ,, | | वैद्यकशास्त्रोंकी पठनकी आवश्यकता .... ,, | पित्तज्वरका पाचन .... .... १८० | | रोग नहीं जाननेसे हानि .... १७३ | कफज्वरमें पाचन .... .... ,, | | वैद्यशास्त्रज्ञातांका फल .... ,, | संनिपातज्वरमें पाचन .... .... ,, | | रोगादिक जाननेकी आवश्यकता .... ,, | ज्वरमें पथ्य .... .... ,, | | देशकालादिक जाननेकीं | वातज्वरका निदान और चिकित्सा .... ,, | | आवश्यकता .... .... ,, | वातज्वरका पाचन.... .... १८१ | | रोगहेतु वातादि दोष .... .... ,, | अन्नहीन औषधका गुण और .... ,, | | रोगपरीक्षाकें प्रकार .... १७४ | निषेधका विशेष वर्णन .... .... ,, | | साध्यासाध्यका लक्षण .... ,, | पाचन हुए औषधका लक्षण .... ,, | | साध्यादिक होनेका कारण .... ,, | उछलनेवालें औषधका लक्षण .... ,, | | उपद्रवका लक्षण .... .... ,, | पाचन होनेमें शेष रहे औषधका लक्षण ,, | | रोग निर्मूल करनेकी आज्ञा .... १७५ | भोजनके उपरांत देनेके औषधका गुण १८२ | | सूक्ष्म भी रोग शत्रुसमान है .... ,, | वातज्वरमें पंचमूलका काथ .... ,, | | रोगके फैलनेके प्रथम ही प्रती- | पित्तज्वरके निदान और चिकित्सा .... ,, | | कार करना .... .... ,, | रोध्रादि काथ .... .... १८३ | | व्याधियोंका प्रकार.... .... १७६ | शक्राहादि काथ .... .... ,, | | तीनप्रकारके व्याधियोंका प्रकार .... ,, | दुरालभादि काथ .... .... ,, | | ज्वरकी व्यापकता.... .... ,, | पित्तपापडा काथ.... .... ,, | | जातिपरत्वमें ज्वरकी असाध्यता.... ,, | शुंठीदि काथ .... .... १८४ | | ज्वरकी बलिष्ठता .... .... ,, | गुडूच्यादि काथ .... .... ,, | | मनुष्य ज्वर सह सकता है तिसका कारण १७७ | द्राक्षादि काथ .... .... ,, | | सर्वरोगमें ज्वरकी श्रेष्ठता .... ,, | दाहतृषामूर्च्छाके उपर विदार्यादिकां | | पृथक् प्राणिभेदसे ज्वरके नामान्तर .... ,, | उपचार दाहज्वरकी उपाय.... .... ,, | | ज्वरके स्वरूपका लक्षण .... १७८ | ज्वरशोषकी उपाय .... .... १८५ | | ज्वरकी उत्पत्ति .... .... ,, | कफज्वरकी निदान और चिकित्सा .... ,, | | ज्वरकी निदानसहित संप्राप्ति .... ,, | कफज्वरका पाचन पिप्पल्यादि कल्क ,, | | ज्वरके हेतु .... .... १७९ | व्याघ्रादि कल्क .... .... १८६ | | प्रकट हुए ज्वरका लक्षण .... ,, | वासादि काथ .... .... ,, |
( १२ ) हारीतसंहिता-
| विषय. | पृष्ठ. | विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|---|---|
| आमलक्यादि काथ .... | १८६ | भूनिम्बादि काथ .... | १९३ |
| पिप्पल्यादि काथ .... .... | ” | बृहद्राक्षादि काथ .... | १९४ |
| पिप्पलीका अवलेह .... | ” | लघुराक्षादि .... | ” |
| वातपित्तज्वरका निदान और चिकित्सा | ” | त्रिवृतादि मलभेदन .... | ” |
| वातपित्तज्वरका पाचन त्रिफलादिकाथ | १८७ | संनिपातस्वेदहर .... | १९५ |
| शालिपर्ण्यादि कल्क.... .... | ” | नस्यविधान .... | ” |
| किरातादि काथ .... .... | ” | प्रधमनविधि .... .... | ” |
| पंचभद्र काथ .... .... | ” | अंजनविधि .... .... | ” |
| पित्तकफज्वरका निदान और चिकित्सा | ” | निष्ठीवनविधि .... .... | १९६ |
| पित्तकफज्वरका पाचन शुंठ्यादिकाथ | १८८ | सन्निपातमें विशेषता .... | ” |
| द्राक्षादि काथ .... .... | ” | कर्णमूलका निदान और चिकित्सा | १९८ |
| गुडूच्यादि काथ .... .... | ” | कर्णशोथ ऊपर लेप.... .... | ” |
| अन्य गुडूच्यादि काथ .... | ” | दूसरा लेप .... .... | ” |
| पटोलादि काथ .... .... | १८९ | व्रणरोपण औषध .... .... | १९९ |
| अन्यपटोलादि काथ.... .... | ” | कर्णशोथवालेको पथ्य .... | ” |
| वातकफज्वरका निदान और चिकित्सा | ” | अंतर्दाहका कारण.... .... | २०० |
| आरग्वधपंचक .... .... | ” | अंतर्दाहकी चिकित्सा .... | ” |
| क्षुद्रादि पाचन .... .... | १९० | बाह्यदाहका कारण और चिकित्सा | ” |
| पर्पटादि काथ .... .... | ” | शरीर शीतल और आधा गरम होनेका | |
| दशमूल काथ .... .... | ” | कारण और चिकित्सा.... .... | ” |
| त्रिदोषजज्वरका निदान और चिकित्सा | ” | शीतल अंगमें गरम करनेकी चिकित्सा | २०१ |
| त्रिदोषजज्वरकी यशःप्रापक चिकित्सा | ” | गर्मीका उपचार .... .... | ” |
| सन्निपातज्वरका लक्षण और चिकित्सा | १९१ | शीतत्वका उपचार.... .... | २०२ |
| सन्निपातज्वरकी चिकित्सा .... | ” | ज्वरादिकोंका कारण वायु है .... | ” |
| दशांग काथ .... .... | १९२ | ज्वरमुक्तिका लक्षण.... .... | ” |
| भूनिम्बादि काथ .... .... | ” | ज्वर उतरनेका लक्षण .... | ” |
| शुंठ्यादि क्वांथ .... .... | ” | ज्वर नहीं उतरनेका और लौट | |
| मुस्तादि क्वाथ .... .... | १९३ | आनेका लक्षण.... .... | ” |
| बृहत्यादि काथ .... .... | ” | विषमज्वरका लक्षण और चिकित्सा | २०३ |
| शख्यादि पाचन .... .... | ” | एकाहिक ज्वरका लक्षण .... | ” |
विषयानुक्रमणिका. ( १३ ) विषय. पृष्ठ. विषय. पृष्ठ. तृतीयज्वरलक्षण .... .... २०३ अतीसारका लक्षण .... .... २१२ चातुर्थिकज्वरलक्षण.... .... ” ज्वरातिसार.... .... .... २१३ बेलाज्वरादिकका लक्षण .... २०४ अतीसारकी चिकित्सा .... ” भूतादिकसे उपजे रोग .... ” ज्वरातिसारके ऊपर उत्पलषट्क .... ” निदिग्धिकादि काथ.... .... ” शुं log्य्यादिकाथ.. .... .... २१४- गुडपिप्पली .... .... २०५ पाठादिकाथ .... .... ” लघुपंचमूलकाथ .... .... ” शुंठ्यादिपाचन .... .... ” जीर्णज्वरपर पटोलादि काथ .... ” वत्सकादिकाथ .... .... ” विषमज्वरका औषध.... .... ” पंचमूलीकाथ. .... .... ” चातुर्थिक ज्वरका उपाय .... ” उत्पलादिपाचन .... .... २१५. चातुर्थिकपर नस्य .... .... २०६ उशीरादिकाथ .... .... ” विषमज्वरपर लशुनकल्क .... ” जंब्वादिस्वरस .... .... ” विषमज्वरपर अष्टांगधूप .... ” काकमाचीका प्रयोग.... .... २१६ वेलाज्वरआदिकोंका उपाय .... ” जंबूट्वगादिका अवलेह .... ” ज्वरनाशक हनुमानका पूजन .... २०७ अतीसारका पूर्वरूप.... .... ” ज्वरनाशक मंत्र .... .... ” वातातिसारका लक्षण और चिकित्सा .... ” चारवर्णवाले ज्वरोंके चिह्न .... २०८ अतीसारका पाचनकल्क .... २१७ ब्राह्मण ज्वर ..... ” बालकादि कल्क ..... .... ” क्षत्रिय ज्वर ..... ” शालिपर्ण्यादि पानक .... ” वैश्य ज्वर .... .... ” तिंदुकादिरसपानक..... .... ” शूद्र ज्वर .... .... ” कुटजपुटपाक .... .... २१८ ब्राह्मणज्वरका लक्षण और शांति .... ” पित्तातिसारका लक्षण और चिकित्सा .... ” क्षत्रियज्वरका लक्षण और शांति.... २०९ शालिपर्ण्यादि पान .... .... २१९ वैश्यज्वरका लक्षण और शांति .... ” दशमूलका काथ .... .... ” शूद्रज्वरका लक्षण और शांति .... २१० धान्यपंचकादि काथ .... .... ” सर्वरोगोंपर उपचार .... ” शाल्मलीमूलकल्क .... .... ” ज्वरवालेको पथ्य आहारादि .... ” कफातिसार लक्षण .... ” ज्वरवालेको अपथ्य.... .... २११ कफातिसारकी चिकित्सा .... २२० ज्वरमुक्तोंका वर्तना.... .... ” त्र्यूषणादिक पाचन.... .... ” अतीसारचिकित्सा .... .... २१२ कालिङ्गादि कल्क .... .... ”