भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 145

१०० हर्षचरितम् पाण्डुरमुष्णीषमुद्वहता, वामेन स्थूलमुक्ताफलच्छुरणदन्तुरत्सरुं करकिस- लयेन कलयता कृपाणम्, इतरेणापनीततरलतां ताडनीमिव लतां शात- कौम्भीं वेत्रयष्टिमुन्मृष्टां धारयता पुरुषेणानुगम्यमानो निर्गत्यावोचत्— ‘एष खलु महाप्रतीहाराणामनन्तरश्चक्षुष्यो देवस्य पारियात्रनामा दौवा- रिकः। समनुगृह्णात्वेनमनुरूपया प्रतिपत्त्या कल्याणभिनिवेशी’ इति। दौवारिकस्तु समुपसृत्य कृतप्रणामो मधुरया गिरा सविनयमभाषत— ‘आगच्छत। प्रविशत देवदर्शनाय। कृतप्रसादो देवः’ इति। बाणस्तु ‘धन्योऽस्मि, यदेवमनुग्राह्यं मां देवो मन्यते’ इत्युक्त्वा तेनोपदिश्यमान- मार्गः प्राविशदभ्यन्तरम्। अथ वनायुजैः, आरट्टजैः, काम्बोजैः, भारद्वाजैः, सिन्धुदेशजैः, पार- प्रवाहः। वामेनेति। तदा तस्य व्यापारानुपपत्तेः। अपनीतेत्यादिनास्य नियमवि- धायित्वं पोष्यते। उन्मृष्टामुत्तंसिताम्। अनेन भास्वरतैव पोष्यते। अनन्तरः प्रधानम्। चक्षुष्यः प्रियः। आगच्छतेत्यादौ बहुत्वनिर्देशेनादर एवास्यापाद्यते। अथत्यादौ। एवंविधैस्तुरङ्गैररचितां मन्दुरां विलोकयन्दूराद्धिभक्षिष्यागारमप- श्यदिति संबन्धः। वनायुजादीनि देशविशेषेणाश्वानां नामानि। शोणैरित्यादि थी। उसके बायें हाथ में मोतियों की जड़ाऊ मूठ वाली तलवार थी और दाहिने हाथ में तरलता से रहित विद्युल्लता के समान चमकवाली सोने की वेत्रयष्टि थी। मेखलक ने कहा—'यह महाप्रतिहारों का मुखिया, महाराज का प्रिय, पारियात्र नामक दौवारिक हैं। कल्याण में अभिनिवेश रखने वाले आप इसका उचित सम्मान करें।' दौवारिक पारियात्र ने पास आकर प्रणाम किया और मधुर आवाज में विनयपूर्वक बोला—'आप आइए, और महाराज के दर्शन के लिये प्रवेश कीजिए, महाराज आप पर प्रसन्न हैं।' बाण ने कहा—'मैं धन्य हूँ, जो मुझे महाराज इस प्रकार अपने अनुग्रह के योग्य समझ रहे हैं।' यह कहकर पारियात्र के द्वारा मार्ग दिखाये जाने पर बाण ने भीतर प्रवेश किया। बाण ने भीतर प्रवेश करते ही अनेक राजवल्लभ तुरङ्गों की बनी हुई मन्दुरा (घोड़साल) देखी। वहाँ कुछ वनायुज अर्थात् वानाघाटी वजीरिस्तान में उत्पन्न घोड़े, कुछ आरट्टज अर्थात् वाहीक या पञ्जाब में उत्पन्न घोड़े, कुछ काम्बोज अर्थात् मध्य एशिया में वंक्षु नदी के पामीर प्रदेश में उत्पन्न घोड़े, कुछ भारद्वाज अर्थात् उत्तरी गढ़वाल के घोड़े, कुछ सिन्धुदेशज अर्थात् सिंधसागर या थल दोआब के उत्पन्न घोड़े, कुछ पारसीक अर्थात् सासानी ईरान के घोड़े थे। रङ्गों के हिसाब से कुछ शोण (लालकुम्मैत), कुछ श्याम (मुश्की), कुछ श्वेत (सुब्जा), कुछ पिञ्जर (समंद), कुछ हरित (नीलासुब्जा),