हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 144, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ स मुहूर्तादिव प्रांशुना, कर्णिकारगौरेण, वीध्रकञ्चुकच्छन्नवपुषा, समुन्मिषन्माणिक्यपदकबन्धबन्धुरवस्तबन्धकृशावलग्नेन, हिमशैलशि- लाविशालवक्षसा, हरवृषककुद्कूटविकटांसतटेन, उरसः चपलहृषीकह- रिणकुलमंयमनपाशमिव हारं बिभ्रता, 'कथयतं यदि सोमवंशसंभवः सूर्यवंशसंभवो वा भूपतिरभूदेवंविधः' इति प्रष्टुमानीयताभ्यां सोमसूर्याभ्या- मिव श्रवणगताभ्यां मणिकुण्डलाभ्यां समुद्भासमानेन, वहद्वदनलावण्य- विसरवेणिकाक्षिप्यमाणैरधिकारगौरवाह्नीयमानमार्गेणेव दिनकृतः किरणैः प्रसादलब्धया विकचपुण्डरीकमुण्डमालयेव दीर्घया दृष्ट्या दूरादेवानन्द- यता, नैष्ठुर्याधिष्ठानेऽपि प्रतिष्ठितेन पदे पदे प्रश्रयमिवावनम्रेण, मौलिना
अथेत्यादौ । ईदृशपुरुषेणानुगम्यमानो निर्गत्यावोचदिति संबन्धः । अन्तराले स्वस्वन्तरादिवर्णनाभावाद्येत्यादिना समनन्तरमेव निर्गमनेन पुनरादर एव प्रती- यते । अत आह—मुहूर्तादिवेति । पुरुषानुगतत्वेन चादर एव पोष्यते । वीध्रं निर्म- लम् । बन्धुरं शोभनम् । वस्तं सुवर्णपट्टिकाकटिसूत्रम् । तस्य बन्धेन निवेशनेन कृशमवलग्नं मध्यं यस्य तेन । हिमशैले । हिमग्रहणं राज्ञो धवलत्वात् । हरग्रहणं जराशौक्ल्यप्रतिपादनाय पूर्ववत् । हृषीकाणीन्द्रियाणि । आनीताभ्यामिति । आनयने तस्य प्रविष्णुता ध्वन्यते । यश्च स्रष्टुमानीयते स स्वश्रणं गच्छति । वेणिका
कुछ ही क्षण में मेखलक बाहर आया । उसके पीछे-पीछे एक दूसरा भी पुरुष था । वह लम्बा और कर्णिकार की भाँति पीतवर्ण का था । वह निर्मल कंचुक पहने हुए था । उसकी पतली कमर में सोने के सूत्रों की बनी हुई पेटी कसी थी । उस पेटी में माणिक्य का बना हुआ राजचिह्न पदक लगा हुआ था । उसकी छाती बर्फ की चट्टान के समान चौड़ी थी । शिव के वाहन वृषभ की पीठ के टाट के समान उसके दोनों कन्धे थे । वह अपने चंचल इन्द्रिय-हरिणों को बाँध रखने के लिये पाश के समान अपने वक्ष पर हार धारण किए हुए था । चन्द्र और सूर्य के समान मणिकुण्डल उसके कानों में शोभित हो रहे थे, मानों वे (चन्द्र और सूर्य) उन कानों से पूछ रहे थे कि 'यदि चन्द्रवंश में या सूर्यवंश में कोई हर्ष जैसा सम्राट उत्पन्न हुआ हो तो उसे बताओ ।' वह दूर ही से अपनी बड़ी बड़ी आँखों द्वारा आनन्दित कर रहा था, उसकी आँखें खिले हुए पुण्डरीक की मानों मुंडमाला थी, जिसे सूर्य की किरणों ने प्रसन्न होकर मानों अर्पित किया था, क्योंकि उसके मुख की लावण्यप्रभा के प्रवाह से वे किरणें बिलकुल तिरस्कृत हो रही थीं, फिर भी सूर्य के अधिकार-गौरव को देखकर उसने उनके लिए मार्ग दे दिया था । अत्यन्त निष्ठुर पद पर प्रतिष्ठित होने पर भी वह स्वभाव से नम्र था । उसके झुके हुए मस्तक पर सफेद पगड़ी