हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
अथ स मुहूर्तादिव प्रांशुना, कर्णिकारगौरेण, वीध्रकञ्चुकच्छन्नवपुषा, समुन्मिषन्माणिक्यपदकबन्धबन्धुरवस्तबन्धकृशावलग्नेन, हिमशैलशि- लाविशालवक्षसा, हरवृषककुद्कूटविकटांसतटेन, उरसः चपलहृषीकह- रिणकुलमंयमनपाशमिव हारं बिभ्रता, 'कथयतं यदि सोमवंशसंभवः सूर्यवंशसंभवो वा भूपतिरभूदेवंविधः' इति प्रष्टुमानीयताभ्यां सोमसूर्याभ्या- मिव श्रवणगताभ्यां मणिकुण्डलाभ्यां समुद्भासमानेन, वहद्वदनलावण्य- विसरवेणिकाक्षिप्यमाणैरधिकारगौरवाह्नीयमानमार्गेणेव दिनकृतः किरणैः प्रसादलब्धया विकचपुण्डरीकमुण्डमालयेव दीर्घया दृष्ट्या दूरादेवानन्द- यता, नैष्ठुर्याधिष्ठानेऽपि प्रतिष्ठितेन पदे पदे प्रश्रयमिवावनम्रेण, मौलिना
अथेत्यादौ । ईदृशपुरुषेणानुगम्यमानो निर्गत्यावोचदिति संबन्धः । अन्तराले स्वस्वन्तरादिवर्णनाभावाद्येत्यादिना समनन्तरमेव निर्गमनेन पुनरादर एव प्रती- यते । अत आह—मुहूर्तादिवेति । पुरुषानुगतत्वेन चादर एव पोष्यते । वीध्रं निर्म- लम् । बन्धुरं शोभनम् । वस्तं सुवर्णपट्टिकाकटिसूत्रम् । तस्य बन्धेन निवेशनेन कृशमवलग्नं मध्यं यस्य तेन । हिमशैले । हिमग्रहणं राज्ञो धवलत्वात् । हरग्रहणं जराशौक्ल्यप्रतिपादनाय पूर्ववत् । हृषीकाणीन्द्रियाणि । आनीताभ्यामिति । आनयने तस्य प्रविष्णुता ध्वन्यते । यश्च स्रष्टुमानीयते स स्वश्रणं गच्छति । वेणिका
कुछ ही क्षण में मेखलक बाहर आया । उसके पीछे-पीछे एक दूसरा भी पुरुष था । वह लम्बा और कर्णिकार की भाँति पीतवर्ण का था । वह निर्मल कंचुक पहने हुए था । उसकी पतली कमर में सोने के सूत्रों की बनी हुई पेटी कसी थी । उस पेटी में माणिक्य का बना हुआ राजचिह्न पदक लगा हुआ था । उसकी छाती बर्फ की चट्टान के समान चौड़ी थी । शिव के वाहन वृषभ की पीठ के टाट के समान उसके दोनों कन्धे थे । वह अपने चंचल इन्द्रिय-हरिणों को बाँध रखने के लिये पाश के समान अपने वक्ष पर हार धारण किए हुए था । चन्द्र और सूर्य के समान मणिकुण्डल उसके कानों में शोभित हो रहे थे, मानों वे (चन्द्र और सूर्य) उन कानों से पूछ रहे थे कि 'यदि चन्द्रवंश में या सूर्यवंश में कोई हर्ष जैसा सम्राट उत्पन्न हुआ हो तो उसे बताओ ।' वह दूर ही से अपनी बड़ी बड़ी आँखों द्वारा आनन्दित कर रहा था, उसकी आँखें खिले हुए पुण्डरीक की मानों मुंडमाला थी, जिसे सूर्य की किरणों ने प्रसन्न होकर मानों अर्पित किया था, क्योंकि उसके मुख की लावण्यप्रभा के प्रवाह से वे किरणें बिलकुल तिरस्कृत हो रही थीं, फिर भी सूर्य के अधिकार-गौरव को देखकर उसने उनके लिए मार्ग दे दिया था । अत्यन्त निष्ठुर पद पर प्रतिष्ठित होने पर भी वह स्वभाव से नम्र था । उसके झुके हुए मस्तक पर सफेद पगड़ी
१०० हर्षचरितम् पाण्डुरमुष्णीषमुद्वहता, वामेन स्थूलमुक्ताफलच्छुरणदन्तुरत्सरुं करकिस- लयेन कलयता कृपाणम्, इतरेणापनीततरलतां ताडनीमिव लतां शात- कौम्भीं वेत्रयष्टिमुन्मृष्टां धारयता पुरुषेणानुगम्यमानो निर्गत्यावोचत्— ‘एष खलु महाप्रतीहाराणामनन्तरश्चक्षुष्यो देवस्य पारियात्रनामा दौवा- रिकः। समनुगृह्णात्वेनमनुरूपया प्रतिपत्त्या कल्याणभिनिवेशी’ इति। दौवारिकस्तु समुपसृत्य कृतप्रणामो मधुरया गिरा सविनयमभाषत— ‘आगच्छत। प्रविशत देवदर्शनाय। कृतप्रसादो देवः’ इति। बाणस्तु ‘धन्योऽस्मि, यदेवमनुग्राह्यं मां देवो मन्यते’ इत्युक्त्वा तेनोपदिश्यमान- मार्गः प्राविशदभ्यन्तरम्। अथ वनायुजैः, आरट्टजैः, काम्बोजैः, भारद्वाजैः, सिन्धुदेशजैः, पार- प्रवाहः। वामेनेति। तदा तस्य व्यापारानुपपत्तेः। अपनीतेत्यादिनास्य नियमवि- धायित्वं पोष्यते। उन्मृष्टामुत्तंसिताम्। अनेन भास्वरतैव पोष्यते। अनन्तरः प्रधानम्। चक्षुष्यः प्रियः। आगच्छतेत्यादौ बहुत्वनिर्देशेनादर एवास्यापाद्यते। अथत्यादौ। एवंविधैस्तुरङ्गैररचितां मन्दुरां विलोकयन्दूराद्धिभक्षिष्यागारमप- श्यदिति संबन्धः। वनायुजादीनि देशविशेषेणाश्वानां नामानि। शोणैरित्यादि थी। उसके बायें हाथ में मोतियों की जड़ाऊ मूठ वाली तलवार थी और दाहिने हाथ में तरलता से रहित विद्युल्लता के समान चमकवाली सोने की वेत्रयष्टि थी। मेखलक ने कहा—'यह महाप्रतिहारों का मुखिया, महाराज का प्रिय, पारियात्र नामक दौवारिक हैं। कल्याण में अभिनिवेश रखने वाले आप इसका उचित सम्मान करें।' दौवारिक पारियात्र ने पास आकर प्रणाम किया और मधुर आवाज में विनयपूर्वक बोला—'आप आइए, और महाराज के दर्शन के लिये प्रवेश कीजिए, महाराज आप पर प्रसन्न हैं।' बाण ने कहा—'मैं धन्य हूँ, जो मुझे महाराज इस प्रकार अपने अनुग्रह के योग्य समझ रहे हैं।' यह कहकर पारियात्र के द्वारा मार्ग दिखाये जाने पर बाण ने भीतर प्रवेश किया। बाण ने भीतर प्रवेश करते ही अनेक राजवल्लभ तुरङ्गों की बनी हुई मन्दुरा (घोड़साल) देखी। वहाँ कुछ वनायुज अर्थात् वानाघाटी वजीरिस्तान में उत्पन्न घोड़े, कुछ आरट्टज अर्थात् वाहीक या पञ्जाब में उत्पन्न घोड़े, कुछ काम्बोज अर्थात् मध्य एशिया में वंक्षु नदी के पामीर प्रदेश में उत्पन्न घोड़े, कुछ भारद्वाज अर्थात् उत्तरी गढ़वाल के घोड़े, कुछ सिन्धुदेशज अर्थात् सिंधसागर या थल दोआब के उत्पन्न घोड़े, कुछ पारसीक अर्थात् सासानी ईरान के घोड़े थे। रङ्गों के हिसाब से कुछ शोण (लालकुम्मैत), कुछ श्याम (मुश्की), कुछ श्वेत (सुब्जा), कुछ पिञ्जर (समंद), कुछ हरित (नीलासुब्जा),
द्वितीय उच्छ्वासः १०१ सीकैश्च, शोणैश्च, श्यामैश्च, श्वेतैश्च, पिङ्गरैश्च, हरिद्भिश्च, तित्तिरिकल्माषैश्च, पञ्चभद्रैश्च, मल्लिकाक्षैश्च, कृत्तिकापिञ्जरैश्च, आयतनिर्मासमुखैः, अनुत्क- टकर्णकोशैः, सुवृत्तश्लक्ष्णसुघटितघण्टिकाबन्धैः, यूपानुपूर्वीवक्रायतोदग्र- ग्रीवैः, उपचयश्वसत्स्कन्धसंधिभिः, निर्भुग्नोरःस्थलैः, अस्थूलप्रगुणप्रसृ- वर्णविशेषवर्णनम् । 'शोणः पद्मार्जुनः स्मृतः' । पिञ्जरैरीषत्कपिलैः । हरिच्छुकनिभो वर्णः । तित्तिरिः पक्षिविशेषस्तद्वच्चित्रैः । 'सिताक्ष यस्य वाजिनः शफाः समस्तकं मुखम् । स पञ्चभद्रनामको नृपस्य राज्यसौख्यदः' । शुक्लपर्यन्ते असिततारके नयने येषां ते मल्लिकाक्षाः । उक्तं च—'पृथुस्निग्धा समा चैव मल्लिकाकुसुमप्रभा । राजी यस्य तु पर्यन्ते परिक्षेप्ये तु लोचने ॥ सह यो मल्लिकाक्षस्तु दृष्टिपर्यन्ततारकः ॥' इति । तारकाः कदम्बककल्पनेकबिन्दुकल्माषितत्वचः कृत्तिकापिञ्जरा यतः । आयतेत्यादि । तदुक्तम्—'मुखं तन्वायतनातं चतुरस्रं समाहितम् । ऋजु चैवोप- पदिष्टं च परिपूर्णं च शस्यते ॥' इति । कृष्णेनाप्युक्तम्—'उज्जा अतुंगअत्यं णिम्मं संवाहिरण अच्छअणं' इति । अनुत्कटो ह्रस्वः । कोशो मध्यम् । शिरसो ग्रीवायाश्च यन्मध्यं स घण्टिकाबन्धः । यो निगाल इत्युच्यते तस्य सुवृत्तादि शस्यते । यदाह- 'ग्रीवाशिरोऽन्तरस्थितो दीर्घवृत्तः समाहितः । नोद्धतो नार्थितो नातिदुर्नाहोऽति- विधानतः ॥ सुदिग्धोऽनुपदिग्धश्च निगालो गदितः शुभः ॥' इति । यूपो यज्ञचिह्नं तस्येवानुपूर्वी यस्याः । तथा वक्रा आयता उदग्रा उद्धुरा ग्रीवा येषाम् । तदुक्तम्— 'ग्रीवा मूलम्बिनी वृत्ता दीर्घा च सुसमाहिता । गले बद्धा विदोर्वृत्ता तथा शिरसि चोद्यता ॥ निगाले स्याच्च निर्मांसा वृद्धौ साकुञ्चिता भृशम् । श्लिष्टमांसाग्रबद्धा च तुरगस्य प्रशस्यते ॥' इति । उपच्येत्यादि । तदुक्तम्—'स्कन्धः सुपरिपूर्णः स्याद्व्यक्त- मांसः पृथुत्रिकः । बहुमांसाङ्गसंश्लिष्टः स्थिरमांसश्च पूरितः ॥' इति । निर्भुग्नं स्थूल- त्वाद्बहिर्निःसृतम् । उक्तं च—'स्थूलास्थि महदच्छिद्रं पृथुलं यच्च निर्वलि । उर ईदृक्प्रशंसन्ति स्थूलक्रोडं महत्तरम् ॥' इति । निर्भुग्नमुरपन्नद्रोणिकमिति केचित् । कुछ तित्तिरकल्माष (तीतरपंखी) घोड़े थे । शुभ लक्षणों वाले घोड़े थे जैसे पञ्चभद्र (अर्थात् पञ्चकल्याण हृदय, पृष्ठ, मुख और दोनों पाश्र्वों में पुष्पित या भौंरी वाला), मल्लिकाक्ष (शुक्ल अपांग-वाला) और कृत्तिकापंजर (तारों जैसी सफेद चित्तियों वाला, चितकबरा) । उनका मुँह लम्बा और पतला था, कान छोटे छोटे थे, घंटी (सिर और गर्दन की जोड़) गोल, चिकनी और सुडौल थी, गर्दन ऊपर उठी हुई और यूप की तरह लम्बी और टेढ़ी थी, कन्धे की जोड़ मांस से फूली हुई थी, छाती निकली हुई थी, टांगें पतली और सीधी थीं, खुर लोहे की भाँति कड़े थे, वेग में टूटने के भय से मानों नाड़ियों
१०२ हर्षचरितम् तैर्लोहपीठकठिनखुरमण्डलैः, अतिजवतृटनभयादनिर्मितान्त्राणीवोदराणि वृत्तानि धारयद्भिः, उच्चद्रोणीविभज्यमानपृथुजघनैः, जगतीदोलायमान- बालपल्लवैः, कथमप्युभयतो निखातदृढभूरिपाशसंयमननियन्त्रितैः, आय- तैरपि पश्चात्पाशबन्धपरवशप्रसारितैकाङ्घ्रिभिरायततरैरिवोपलक्ष्यमाणैः, बहुगुणसूत्रग्रथितश्रीबागण्डकैः, आमीलितलोचनैः, दुर्वारसश्याम लफेन- लवशबलान्दंशनगृहीतमुक्तान्फरफरितत्वचः कण्डूजुषः प्रदेशान्प्रचाल- यद्भिः, सालसवलितवालधिभिः, एकशफविश्रान्तिश्रमस्रस्तशिथिलितज- घनार्धैः, निद्रया प्रध्यायद्भिblack/श्न, स्खलितहुंकारमन्दमन्दशब्दायमानैश्च, ताडितखुरधरणीरणितमुखरशिखरखुरलिखितदमातलैर्घासमभिलषद्भिblack/श्च, प्रकीर्यमाणयवसमासरसमत्सरसमुद्भूतक्षोभैश्च, प्रकुपितचण्डचडालहु- ङ्कारकातरतरलतारकैश्च, कुङ्कुमप्रमृष्टिपिञ्जराङ्गतया सततसन्निहितनीरा- अस्थूलप्रगुणप्रस्थितैर्निमांसऋजुजङ्घैः । उक्तं च—'जङ्गे वृत्ते दीर्गे निर्मांसे पूजिते निगूढसिरे' इति । मण्डलशब्देन वृत्तत्वमुच्यते । तदुक्तम्—'सुरास्तुरङ्गे वृत्ताश्च ह्रस्वाश्च सुदृढा घनाः' इति । तथा शिलातलगिभैः खुरैरिति । उदराणीति । तदुक्तम्- 'उदरं वृत्तमगुरु मृगस्योपचितं तथा । अच्छिद्रह्रस्ववृत्ताल्पसमकुक्षि च पूजितम् ॥' इति । द्रोणी शोभाविशेषः । यदाह—'पृष्ठोरु कटिपार्श्वस्थमांसोत्कर्षणनिर्मिता । द्रोणिकेति प्रशंसन्ति शोभा वाजिनि पश्चमी ॥' इति । बाला एव पल्लवाः । उभयत इति । अत्युद्दामवेगवत्त्वादुभयत्र पाशबन्धः । गण्डको भूषणभेदः । फरफरिताः पुनः पुनरीषत्कम्पिताः । वालधिः पुच्छः । शफः समुद्रयुक्तः पादः । खुरधरणी खुराद्यःकाष्ठपट्टाच्छादिता भूः । चण्डालोऽश्वपालः । प्रमृष्टिः प्रमार्जनम् । विता- से रहित और गोल उदर भाग था, पुट्ठे चौड़े और मांसल होने से उठे हुए थे, पूँछ के बाल जमीन तक लटक रहे थे। किसी किसी प्रकार अगाड़ी और पिछाड़ी दो रस्सियों से कसकर उन्हें नियन्त्रण में रखा गया था। वे लम्बे थे, फिर भी पिछाड़ी बाँधने से उनका एक पैर बिलकुल फैल गया था, इससे और भी उनकी लम्बाई बढ़ गई थी। उनके गले का गण्डक नामक अलंकार तिगुने चौगुने सूत में गुथा हुआ था। वे कुछ कुछ झपकी ले रहे थे। खुजान मिटाने के लिये अपने शरीर में दाँतों से रह-रहकर कोड़ते रहते और त्वचा को फरफराते रहते थे। उन स्थानों पर मुँह की दूब के रस की गाज लग-लग जाती थी। कभी कभी पूँछ टेढ़ी करते थे। एक ही पैर की टेक लेकर विश्राम करने से वे थक जाते और उनकी जाँघ टटाने लगती। नींद में कुछ सोच रहे थे। हूँककर धीरे धीरे हिनहिनाने लगते थे। घास की इच्छा से खुर पटककर धरती को
द्वितीय उच्छ्वासः १०३ जनानलरद्यमाणैरिवोपरिविततवितानैः, पुरः पूजिताभिमतदेवतैः, भूपाल- वल्लभैस्तुरङ्गैरारचितां मन्दुरां विलोकयन् , कुतूहलाक्षिप्तहृदयः किंचिदन्त- रमतिक्रान्तो हस्तवामेनात्युन्नतया निरवकाशमिवाकाशं कुर्वाणम् , महता कदलीवनेन परिवृतपर्यन्तं सर्वतो मधुकरमयीभिर्मदस्स्रुतिभिर्नदीभिरिवाप- तन्तीभिरापूर्यमाणम् , आशामुखविसर्पिणा बकुलवनानामिव विकसतामा- मोदेन लिम्पन्तं घ्राणेन्द्रियं दूरादव्यक्तमभिधिष्ण्यागारमपश्यत् । अपृच्छच्च- 'अत्र देवः किं करोति ?' इति । असावकथयत्—'एष खलु देवस्यौप- वाह्यो बाह्यं हृदयं जात्यन्तरित आत्मा बहिश्चराः प्राणा विक्रमक्रीडा- सुहृद्दर्पशात इति यथार्थनामा वारणपतिः । तस्यावस्थानमण्डपोऽयं नकं रक्तकम् । देवतात्र गोविन्दः । आरचितां भूषिताम् । हस्तवामशब्दो भाष्य- कृता वामहस्तमार्ग इत्यर्थे धृतः । बकुलेत्यादिना प्राशस्त्यमेव पोषयति । तदुक्तम्- 'मालतीमुक्तपुंनागबकुलोपमसौरभम् । दानं पिष्टाम्बुसदृशं मुञ्चञ्छु ते तं तु शीतलम् ॥' इति । श्लैष्मिका दानलक्षणम् । एवं च धर्मलक्षणे तु प्रकोपसमयेऽपि तथाविधम- दवर्णनया श्लेषप्रकृतिकत्वं प्रकाशयति—'श्लेषप्रकृतिकं श्लेष्ठं भद्रजातिं तथैव च' इति च शास्त्रकृता दर्शितम् । धिष्ण्यं मण्डपम् । औपवाह्यः क्रीडा हस्ती । यस्मात्केचन संनाह्याः केचिद्भद्रजातीया उभयस्वभावा भवन्ति करिणः । अस्य च यद्यपि विक्रम- क्रीडासुहृदित्यनेन दर्पशात इति यथार्थनामा वारणपतिरित्यनेन च सांनाह्यत्व- मेवोक्तम् , तथाप्यौपवाह्य इति कथनेऽर्थद्वयेऽपि योग्यत्वाद्वद्रजातीयत्वं चास्य खरोंच रहे थे । सामने घास के पड़ते ही चंचल होकर फटकने लगते थे । सईसों की डपटान सुन कर मारे डर के उनको पुतलियाँ दीन भाव से फिरने लगती थीं। उनके अङ्ग मानों केसर से मले गए थे । उनके समीप सदा नीराजन अग्नि जलती थी । उनके ऊपर चँदोवे तने हुये थे । उनके सामने अभीष्ट देवता पूजे गये थे । मन्दुरा को देखकर बाण का हृदय कुतूहल से भर गया और कुछ आगे बढ़कर बायीं ओर अव्यक्त रूप में दूर ही से हाथीसाल को देखा, जो आकाश में बहुत ऊँचा उठा हुआ था । केलों के वन से वह चारों ओर घिरा हुआ था । सब ओर से नदियों की भाँति बहती हुई मद की धारायें थीं जिन पर भौंरे लुझ रहे थे । उसकी गन्ध दिशाओं में इस प्रकार फैल रही थी मानों मौलसिरी के फूलने की गन्ध नाक में भर रही हो । बाण ने मेखलक से पूछा—'यहाँ महाराज क्या करते हैं ?' उसने कहा—'यह महाराज का क्रीड़ाहस्ती दर्पशात है, जिसे वे युद्ध में साथ ले जाते हैं । यह हाथी नहीं बल्कि महाराज का बाहरी हृदय है, दूसरे स्वरूप में आत्मा है, बहिश्चर प्राण है।' बाण ने उससे कहा—'भद्र, मैंने दर्पशात का नाम
१०४ हर्षचरितम् महान्दृश्यते' इति । स तमवादीत्—'भद्र ! श्रूयते दर्पशातः । यद्येवम- दोषो वा पश्यामि तावद्वारणेन्द्रमेव । अतोऽर्हसि मामत्र प्रापयितुम् । अतिपरवानस्मि कुतूहलेन' इति । सोऽभाषत—'भवत्वेवम् । आगच्छतु भवान् । को दोषः । पश्यतु तावद्वारणेन्द्रम्' इति । गत्वा च तं प्रदेशं दूरादेव गम्भीरगलगर्जितैर्वियति चातक- कदम्बकैर्भुवि च भवननीलकण्ठकुलैः कलकेकाकलकलमुखरमुखैः क्रियमाणाकालकोलाहलम् , विकचकदम्बसंवादिमदसुरासौरभभरित- भुवनम् , कायवन्तमिवाकालमेघकालम् , अविरलमधुबिन्दुपिङ्ग- लपद्मजालकितां सरसीमिवात्यवगाढां दशां चतुर्थीमुत्सृजन्तम् ,
निश्चीयते । जात्यन्तरितो द्वितीयां जातिं हस्तिरूपां प्राप्तः । यद्येवमिति । यदि सत्यं दर्पशातोऽयमदोषो वेति । वाशब्दश्चार्थे । यदि च न दोष इत्यर्थः । यतो रसदाना- विभयेन केनचिद्रष्टुं न लभ्यते । कुतूहलेन परवान्कुतूहलायितः । गत्वेत्यादौ । दूरादेव दर्पशातमपश्यदिति संबन्धः । गर्जितं बृंहितम् । चातकाः स्तोककाः । नीलकण्ठा मयूराः । केका मयूररुतानि । मेघकालमिति । मेघकालश्च चातककदम्बनीलकण्ठकुलकदम्बकसौरभादियुक्तः । अविरला घना ये मधुबिन्दव इव मधुबिन्दवो माक्षिककणास्तद्वत्पिङ्गलानि पद्मजालकानि संजातानि यस्याम् । 'पद्मकं बिन्दुजालं स्याद्गात्रकं करिणीमिति' । यथा—'पद्मस्वस्तिकसंस्थानो बिन्दु- मिश्र कचैस्तथा । स्वङ्गिताङ्कस्तुषाराभः शावः शक्तिकरः करी ॥' इत्युक्तम् । अन्ये मधुबिन्द्वो मकरन्दकणास्तैः पिङ्गलानीति व्याख्येयम् । महत्सरः सरसी । अत्यव- गाढामिति । परिणताम् । दशां कालावस्थाम् । चतुर्थीमिति । 'चतुर्थ्यामवगाढायां
सुना है । यदि ऐसी बात है और कोई झंझट न हो तो उस गजराज को देखूँगा । मुझे वहाँ ले चलो, मैं अपने कुतूहल के वेग से लाचार हूँ ।' वह बोला—'ऐसी बात है तो आइए, झंझट क्या है ? तब तक गजराज को ही देख लें ।' उस स्थान में जाकर बाण ने दूर ही से दर्पशात को देखा । उसकी गम्भीर चिग्घाड़ सुनकर आकाश में चातक पक्षी मेघ की गड़गड़ाहट समझ कर कोलाहल करने लगे और पृथिवी के गृहमयूर अपनी केका-वाणी द्वारा असमय में मुखरित हो उठे । खिले हुए कदम्ब के समान अपने मद की सुरा-सौरभ से उसने दिशाओं को भर दिया था । असमय में वर्षाकाल शरीरधारी हो गया था । इसके गण्डस्थल से निरंतर मदजल क्षरित हो रही था । वह अपनी चौथी दशा मदावस्था में बिल्कुल परिणत हो रहा था । उसके ढिंकते
द्वितीय उच्छ्वासः १०५ अनवरतमवतंसशङ्खैरामन्द्रकर्णतालदुन्दुभिध्वनिभिः पञ्चमीप्रवेशमङ्गला- रम्भमिव सूचयन्तम्, अविरतचलनचित्रत्रिपदीललितलास्यलयैर्दोलाय- मानदीर्घदेहाभोगवत्तया मेदिनीबिदलनभयेन भारमिव लघयन्तम्, दिग्भित्तितटेषु कायमिव कण्डूयमानम्, आहवायोदस्तहस्ततया दिग्बार- णानिवाह्वयमानम्, ब्रह्माण्डस्तम्भमिव स्थूलनिशितदन्तेन करपत्रेण पाटयन्तम्, अमान्तं भुवनाभ्यन्तरे बहिरिव निर्गन्तुमीहमानम्; सर्वतः- सरसकिसलयलतालासिभिर्लेशिकैश्चिरपरिचयोपचितैर्वनैरिव विक्षिप्तं, सशैवलबिसविसरशबलसलिलैः सरोभिरिव चाधोरणैराधीयमाननिदाघ- समयसमुचितोपचारानन्दम्, अपि च प्रतिगजदानपवनादानदूरोत्क्षिप्तेना- नेकसमरविजयगणनालेखाभिरिव वलिवलयराजिभिस्तनीयसीभिस्तरङ्गि- तोदरेणातिस्थवीयसा हस्तार्गलदण्डेनार्गलयन्तमिव सकलं सकुलशैलस- मुद्रद्वापकाननं ककुभां चक्रवालम्, एकं करान्तरापितेनोत्पलाशेन लेखाविन्दुभिरचितः' इत्युक्तम् । शङ्खैः शङ्खशब्दैरित्यर्थः । कर्णेत्यादि । कर्णौ च दुन्दुभिध्वनितौ । 'कर्णौ च करिणः कार्यकारिणौ सप्रशंसिनौ' इति । पञ्चमी दशा त्रिपदी । एकपदोत्क्षेपे पादत्रयावस्थितिः । लयो लीला । आहवः संग्रामः । ब्रह्मस्तम्भो ब्रह्माण्डम् । करपत्रं क्रकचं स्थूलनिशितदन्तं भवति । तच्च भेदयति स्तम्भम् । अमान्तमवर्तमानम् । लेशिकैर्घासिकैः । आधोरणैर्गजारोहैः । वलयाकारा वलिर्वलिवलयम् । अर्गलयन्तं सनाटंकं कुर्वाणम् । कुमुदवनानीत्युत्प्रेक्षा । दन्तयो- र्वर्णप्राशस्त्यमाह-'पयः कुमुदकुन्दाभौ केतकीकुमुदद्युती । मृगाङ्ककिरणालोकौ हुए कानों के शंख दुन्दुभि के समान आवाज कर रहे थे, मानो वह पाँचवीं स्वास्थदशा के प्रवेश का मंगलारम्भ सूचित कर रहा था। अपने तीन पैरों पर खड़ा होकर सुन्दर नृत्य की मुद्रा में स्थूल शरीर को कम्पित कर रहा था, मानों पृथिवी के धँस जाने के भय से बोझ को हल्का कर रहा हो । मानों वह झूमता हुआ दिशाओं की भीतों में अपनी देह खुजला रहा था। मानों अपनी सूँड़ उठा-उठाकर दिग्गजों को युद्ध के लिए गुहार रहा था। अपने मोटे-मोटे और तेज दाँतों के आरे से मानों ब्रह्माण्ड को फाड़ रहा था । वह संसार में न अटने के कारण बाहर निकलना चाहता था। बहुत दिनों से परिचय में आए हुए घसियारे उसके सामने पत्ते लाकर फेंकते जा रहे थे । महावत भी ग्रीष्मकाल के अनुकूल उपचार से उसे आनन्दित कर रहे थे। वह किसी अपने प्रतिद्वंद्वी गज के मद की गंध सूँघ कर सहन न करके अपनी सूँड़ फेंक रहा था। उसकी सूँड़ पर सिकोड़ने से छोटी छोटी खाएं पड़ने लगीं, मानों अनेक लड़ाइयों में विजय पाने की गणना के चिह्न हों
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द्वितीय उच्छ्वासः १०७ वनानीवोपभुक्तानि पुनःपुनः करटाभ्यां बहलमदामोदव्याजेन विसृज- न्तम्, अहर्निशं विभ्रमकृतहस्तस्थितिभिरर्धखण्डितपुण्ड्रेक्षुकाण्डकण्डूयन- लिखितैरलिकुलवाचालितैर्दानपट्टकैरिवलभमानमिव सर्वकाननानि करिप- तीनाम्, अविरलोदबिन्दुस्यन्दिना हिमशिलाशकलमयेन विभ्रमनक्षत्र- मालागुणेन शिशिरीक्रियमाणम्, सकलवारणेन्द्राधिपत्यपट्टबन्धबन्धुर- मिवोच्चैस्तरां शिरो दधानम्, मुहुर्मुहुः स्थगितापावृतदिङ्मुखाभ्यां कर्णता- लतालवृन्ताभ्यां वीजयन्तमिव भर्तृभक्त्या दन्तपर्यङ्किकास्थितां राजल- सतां मतः ॥' इति । करटाभ्यां गण्डाभ्याम् । अर्धेत्यादिनेक्षुकाण्डकस्य लेखनीसा- दृश्यमाह । लिखितैः कृतलेखैरप्यलिकुलेषु सत्सु वाचालितशब्दयोगो येषामित्यने- नालिकुलस्य लिप्यक्षररूपतां ध्वनयति । लिप्यक्षरेषु च सत्सु पाठ्यमानेषु वाचा- लता । दानपट्टकलिखितैः किंचिद्धि लभ्यते । अक्षरपाटिकाैश्च तेषां हस्तस्थितिर्न क्रियते । तानि च वाच्यन्ते । यद्वा स्वहस्तेनाक्षरकरणं हस्तस्थितिः । हिमशिला वातवन्नीभूतं हिमम् । केचित्तु 'हिमानि हिमशकलानि चन्द्रकान्ताः' इत्याहुः । हिमस्य च तदा वर्णनानुचितत्वात् पर्वतेभ्यो हिमानयनं सुलभमेवेति पूर्वोक्तमेव श्रेष्ठम् । यतश्चन्द्रकान्तानां दिवा स्रुतिर्न भवतीति । नक्षत्रमाला हस्त्याभरणभेदः । उच्चैस्तरामिति । उच्चं हि शिरः करिणः शस्यते । यदुक्तम्—'समं महत् पूर्ण च नातिस्तब्धोञ्चमस्तकम् । नावानं नातिपृथुलं वितानावग्रहं मृदु ॥' इति । दन्तावेव तदवस्थानसमुचितत्वात् । पर्यङ्किका च दन्तमयः पर्यङ्कः आस्त इति श्लेषः । आय- व्याज से वह उन्हीं की गन्ध को फैला रहा था । १ उसे मानों राजकीय दानपट्ट मिले थे जिनसे हाथियों के जंगलों को अपने वश में कर रखा था । उसके द्वारा तोड़े गये इक्षुकांड की लेखनी से उन पट्टों पर अक्षर खोदे गये थे, उन पर सजावट के साथ हस्ताक्षर भी बनाये गये थे और भौंरे मानों उन्हें पढ़कर सुना रहे थे । नक्षत्रमाला नाम के आभूषण से वह विभूषित था जो मानों बर्फ के टुकड़ों से बनाया गया था और उससे निरन्तर जलबिन्दु के रूप में प्रभा निकल रही थी । उसका मस्तक निम्नोन्नत और ऊँचा था मानों उसने समस्त गजों के आधिपत्य का पाट बाँध लिया था । बारबार उसके कानों के पंखे चलते रहते थे जिससे दिशायें ढकती और खुलती रहती थीं । इस प्रकार वह अपने स्वामी की भक्ति से दाँत के पलंग पर बैठी हुई राजलक्ष्मी को पंखा झल रहा था । उसके पृष्ठवंश से १. उस समय सहकार, कपूर, कङ्कोल, लवंग, पारिजातक आदि सुगन्धद्रव्य थे जिनसे मुखवास बनाया जाता था, उसी की गन्ध दर्पशात के मदजल में थी, क्योंकि जंगलों में उसने भी इनके वृक्षों का उपभोग किया था ।
२०८ हर्षचरितम् दर्पम्, आयतवंशक्रमांगतेन गजाधिपत्यचिह्नेन चामरेणेव चलता बाल- धिना विराजमानम्, स्वच्छशिशिरशीकरच्छलेन दिग्विजयपीताः सरित इव पुनःपुनर्मुखेन मुञ्चन्तम्, क्षणमवधानदाननिःस्पन्दीकृतसक- लावयवानामन्यद्विरदडिण्डिमाकर्णनाङ्गवलनानामन्ते दीर्घफूत्कारैः परिभव- दुःखमिवावेदयन्तम्, अलब्धयुद्धमिवात्मानमनुशोचन्तम्, आरोहाधिरू- ढिपरिभवेन लज्जमानमिवाङ्गुलीलेखितमहीतलं, मदं मुञ्चन्तम्, अवज्ञा- गृहीतमुक्तकवलकुपितारोहाटनानुरोधेन मदतन्द्रीनिमीलितनेत्रत्रिभागम्, कथं कथमपि मन्दमन्दमनादरादाददानं कवलान्, अर्धजग्धतमालपल्लवर- तश्यामलरसेन प्रभूततया मदप्रवाहमिव मुखेनाप्युत्सृजन्तम्, चेलन्तमिव तवंशः, चक्रवंशः, शरवंशः, बालवंशश्चेति चत्वारो वंशाः । तेषु बालवंश आयत एव शास्त्रकृतामभिप्रेतः । तथा च—'यावत्पूरितपार्श्वश्च वंशश्चापलताकृतिः। शुभो ज्ञेयो गजेन्द्राणामायतः कुरुते सुखम् ॥' इति तैरुक्तम् । आयताद्वंशात्क्रमेण गोपु- च्छवदायत इति विग्रहः । समानाहों हि बालधिः शोकं करोति । यदुक्तम्—'वक्रं स्थूलं च हस्वं च पुच्छं कचविवर्जितम् । समानाहं हि नागस्य भर्तुः शोककरं स्मृतम् ॥' इति । वंशं पृष्ठनाभि, कुलं च । क्रम आनुपूर्वी, पारम्पर्यं च । वालधिः पुच्छम् । लज्जमानमिति । यश्च लज्जते स भूमिं लिखति, दर्प चोज्झति । अङ्गुली करिकराग्रावयवः, करशाखा च । तन्द्री आलस्यम्, गाढनिद्रा वा । चलन्तमि- चँवर के समान पूँछ निकली थी जिससे यह स्पष्ट प्रतीत होता था कि वह गजों का अधिपति है। वह अपने मुँह से ठण्डे और सफेद जल के फुहारे बारबार फेंकता रहता था, मानों दिग्विजय के समय सोखी हुई नदियों को उगल रहा हो । वह दूसरे हाथी के डिण्डिम घोष को सुनकर क्षण भर ध्यान से स्थिर होकर खड़ा हो जाता और अन्त में जोर से शीत्कार करते हुए मानों अपना परिभव समझ कर कष्ट व्यक्त करता था और ऐसा अपने आपको सोचता कि उसे युद्ध करने का अवसर नहीं दिया जा रहा है। दूसरे उसकी पीठ पर चढ़ते तो वह अपना परिभव महसूस करता, अपने नखों से जमीन पर कुछ लिखने लगता, लज्जित होता और मद का त्याग करने लगता। उसने कौर लेकर भी अवज्ञा से छोड़ दिया, इसपर महावत ने कुपित होकर खाने के लिये हठ किया तो उसने मद से अलसा कर आँखें बन्द कर लीं। बहुत प्रयत्न करने पर रह-रहकर अनादर से कौर ले लेता था। आधे चबाये हुए तमाल-पल्लव के रस की काली धारा धीरे धीरे मद के समान उसके मुँह से चू रही थी। दर्प से वह मानों काँप रहा था, शौर्य से जीवित १. दृप्तन्त ।
द्वितीय उच्छ्वासः १०५ दर्पेण, ग्रसन्तमिव शौर्येण, मूर्च्छन्तमिव मदेन, त्रुट्यन्तमिव तारुण्येन, द्रवन्तमिव दानेन, वल्गन्तमिव बलेन, माद्यन्तमिव मानेन, उद्यन्त- मिवोत्साहेन, ताम्यन्तमिव तेजसा, लिम्पन्तमिव लावण्येन, सिञ्चन्त- मिव सौभाग्येन स्निग्धं नखेषु, परुषं रोमविषये, गुरुं मुखे, सच्छिष्यं विनये, मृदुं शिरसि, दृढं परिचयेषु, ह्रस्वं स्कन्धबन्धे, दीर्घमायुषि, दरिद्रमुदरं, सततप्रवृत्तं दाने, बलभद्रं मदलीलासु, कुलकलत्रमायत्त- तासु, जिनं क्षमासु, वह्निवर्षं क्रोधमोक्षेषु, गरुडं नागोद्धृतिषु, नारदं कलहकुतूहलेषु, शुष्काशानिपातमवस्कन्देषु, मकरं वाहिनीक्षोभेषु, आशी- विषं दशनकर्मसु, वरुणं हस्तपाशाकृष्टेषु, यमवागुरामरातिसंवेष्टनेषु, त्यादि दर्पाधिकरणसमुचितक्रियाप्रतिपादनसाभिप्रायं व्याख्येयम् । स्निग्धमिति । उक्तं च—'नखाः स्निग्धाः सिताः शस्ताः' इति । परुषं निष्कृपम् । यश्च स्निग्धः प्रीतिमान्स कथं परुषः प्रीतिशून्यो भवतीति विरोधः । एवं गुरुर्विस्तीर्णः, आचा- र्यश्च । विनय इति । उक्तं च—'विनये मुनिभिस्तुल्याः क्रुद्धा नागाश्च राक्षसाः । नित्रिंशस्याधिकत्वाच्च शस्त्रां नागा महीपतेः ॥' इति । स्कन्धबन्धे ग्रीवामूले । दरिद्रः कृशः, दुर्गतश्च । दानं मदवारि, वितरणं च । बलभद्रो हलधरः । मदो दानम् , सुराकृतश्च । नागाः करिणः, सर्पाश्च । कलहो रणोऽपि । अविदितशत्रुसैन्ये पातोऽवस्कन्दः । मकरं कुर्मम् । वाहिनी सेना नदी च । दशनकर्म दन्तव्यापारः, दशनरूपा च क्रिया । हस्त एव पाशः, प्रशस्तहस्तो हस्तपाश इति वा । हस्ते च पाशः । वागुरा जालम् । परिणतिषु दन्तविदारणकर्मसु । कालं यमम् । शुभाशुभा- था, मद से मूर्च्छित हो रहा था, जवानी से उसके अङ्ग-अङ्ग टूट रहे थे, दानजल के रूप में वह ढल रहा था, बल से मचल रहा था, मान के कारण अपने मद और भी प्रकट कर रहा था, वह अपने भड़कीले चेहरे से सबको लिप रहा था, सौभाग्य से सींच रहा था, स्निग्धता उसके नखों में थी, परुषता उसके रोमों में, गुरुता मुख में, सच्छिष्यता विनय में, मृदुता सिर में, दृढ़ता परिचय में, ह्रस्वता ग्रीवामूल में, लम्बी आयु, पेट छोटा और दान में हमेशा उसकी प्रवृत्ति थी, वह मदलीलाओं में बलभद्र, अधीनता स्वीकार करने में कुलाङ्गना, क्षमा करने में जिन, क्रोध और त्याग करने में अग्नि और वर्षा, नागों (हाथियों, सर्पों) को उठा लेने में गरुड़, झगड़े के कुतूहल में नारद, आक्रमण में शुष्क वज्रपात, वाहिनी (सेना या नदी) को क्षुब्ध करने में मकर, काटने में सर्प, सूँड़ से पकड़ कर खींच लेने में वरुण, शत्रुओं को घेरने में यमपाश, दाँतों का प्रहार करने में काल, सूँड़ से प्रचण्ड आघात करने में (सूर्य के ग्रहण करने में) राहु, टेढ़ी चाल में
११० हर्षचरितम् कालं परिणतिषु, राहुं तीक्ष्णकरग्रहशेषु, लोहिताङ्गं वक्रचारेषु, अलातचक्रं मण्डलश्रान्तिविज्ञानेषु, मनोरथसंपादकं चिन्तामणिपर्वतं विक्रमस्य, दन्तमुक्ताशैलस्तम्भनिवासप्रासादमभिमानस्य, घण्टाचामरमण्डनमनो- हरमिच्छासंचरणविमानं मनस्वितायाः, मदधारादुर्दिनान्धकारं गन्धो- दकधारागृहं क्रोधस्य, सकाञ्चनप्रतिमं महानिकेतनमहंकारस्य, सगण्ड- शैलप्रस्रवणं क्रीडापर्वतमवलेपस्य, सदन्ततोरणं वज्रमन्दिरं दर्पस्य, उच्चकुम्भकूटाट्टालकविकटं संचारिगिरिदुर्गं राज्यस्य, कृतानेकबाणविव- रसहस्रं लोहप्राकारं पृथिव्याः, शिलीमुखशतझांकारितं पारिजात- दिकर्मविपाकेषु च कालमहरादिरूपम् । तीक्ष्णं कृत्वा करेण हस्तेन ग्रहणम्, रविश्च तीक्ष्णकरः । लोहिताङ्गोऽङ्गारकः । वक्रं कुटिलम् । पश्चाच्च मण्डलाकृत्या भ्रान्तेर्भ्र- मणस्य विज्ञानानि कौशलातिशयगतिः । गोमूत्रिकामण्डले त्रिविधा हि गतिः । तन्नालातचक्रमुलमुकचक्रं भ्रमणं करोति । मनोरथसंपादकमिति । शेषे षष्ठीसमासः । ‘कर्मण्यण्’ इति वाऽणि कृते स्वार्थे कः । दन्तौ मुक्ताशैलस्य श्वेतपाषाणस्य स्तम्भा- विव यस्य । अन्यत्र, -दन्तस्थ मुक्ताशैलानां च स्तम्भा यत्र । प्रतिमा दन्तकोशः, देवताकृतिश्च । महानिकेतनं साधुदेवगृहम् । गण्डावेव शैलौ तत्र प्रस्रवणं दाननि- र्यासः । संह तेन वर्तते निर्झरश्च । 'महतो मुक्त्तपाषाणानगण्डशैलान्प्रचक्षते' । संचारी जङ्गमः । यदाह कौटिल्यः—'हस्तिनो हि जङ्गम दुर्गम्' इति । कृतान्यनेकानि बाणैर्विवरसहस्राणि यस्य तम् । प्राकारेषु बाणानुत्स्त्रष्टुं विवरसहस्राणि क्रियन्ते, य इन्द्रकोशा इति चाणक्यादिषु प्रसिद्धाः । भून्न्दनो राजा । 'देवोद्यानं च मंगलग्रह और मण्डलाकार भ्रमण करने में अलातचक्र था। वह विक्रम का चिन्तामणि पर्वत था जो सब प्रकार के मनोरथ को सम्पन्न करने वाला था। वह अभिमान का निवास-भवन था जिसमें मुक्ताशैल के दो खम्भे दाँतों के रूप में लगे थे। वह मनस्विता का स्वेच्छाचारी विमान था जो घण्टा और चँवर के आभूषणों से सुसज्जित था। क्रोध का वह सुगन्धित जल से भरा हुआ धारा-गृह था जिससे मद की धारा के हमेशा बरसते रहने से अन्धकार छाया हुआ था। वह अहङ्कार का महानिकेतन था जिसमें सोने की मढ़ी हुई प्रतिमायें थीं। वह अवलेप का क्रीड़ापर्वत था, उसके गण्डस्थल से झरने के रूप में मद की धारा झरती रहती थी। दर्प का वह वज्रमन्दिर था जिसमें दाँतों के तोरण लगे हुए थे ! वह राज्य का संचरणशील गिरिदुर्ग था, जिसके कुंभ के रूप में ऊपरी भाग में अट्टालक था। वह पृथ्वी की लौह दीवार था जिसमें बाणों की मार से हजारों छिद्र
पादपं भूनन्दनस्य, तथा च संगीतगृहं कर्णतालताण्डवानाम्, आपान- मण्डपं मधुपमण्डलानाम्, अन्तःपुरं शृङ्गाराभरणानाम्, मदनोत्सवं मदलीलालास्यानाम्, अक्षुण्णप्रदोषं नक्षत्रमालामण्डलानाम्, अकाल- प्रावृट्कालं मदमहानदीपूरप्लवानाम्, अलीकशरत्समयं सप्तच्छद- वनपरिमलानाम्, अपूर्वहिमागमं शीकरनीहाराणाम्, मिथ्याजलधरं गर्जिताडम्बराणां दर्पशातमपश्यत् । आसीच्चास्य चेतसि—'नूनमस्य निर्माणे गिरयो ग्राहिताः परमाणु- ताम् । कुतोऽन्यथा गौरवमिदम् । आश्चर्यमेतत् । विन्ध्यस्य दन्तावादिव- राहस्य करः' इति विस्मयमानमेवं दौवारिकोऽब्रवीत्— 'पश्य,— मिथ्यैवालिखितां मनोरथशतैर्निःशेषनष्टां श्रियं चिन्तासाधनकल्पनाकुलधियां भूयो वने विद्विषाम् । नन्दनम्' । कर्णतालानां ताण्डवानीव ताण्डवानि । अन्यत्र,—लाभप्रधानानि ताण्ड- वानि । मधुपा भ्रमराः, विटाश्च । शृङ्गारः सिन्दूरादिदानम्, रसभेदश्च । अक्षुण्णः परिपूर्णः, अत्रादिनानावृतः, अपूर्वो वा । ग्राहिताः प्रापिताः । मिथ्यैवेति । तस्या निःशेषनष्टत्वात्पुनरभावप्रसङ्गाच्चिः- शेषेत्याद्यभिप्रायेणाह—मनोरथशतैरिति । तस्यां व्यापाररहितत्वाच्छून्यमनस्कत्वा- थे। पृथ्वी के नन्दनवन का वह मानों पारिजात वृक्ष था जिसमें सैकड़ों भौरे झंकार रहे थे । कानों के संचालन रूप नृत्य का वह संगीतगृह था, भौरों का आपानमण्डप था, शृङ्गार और आभरणों का अन्तःपुर था, मदलीला के नृत्य का मदनोत्सव था, नक्षत्रमाला ( एक अलंकार ) का वह कभी नष्ट न होने वाला प्रदोष था, मद की महानदी के प्रवाह का वह असामयिक वर्षाकाल था, सप्तच्छदवन के सौरभोँ का मिथ्या शरत्काल था। जलकण के शीकरों का वह अपूर्व समागम था । गरज-तरज के आडम्बर का वह मिथ्या मेघ था । बाण ने मन में सोचा—निश्चय ही दर्पशात के बनाने में पर्वत के परमाणु लगे होंगे, नहीं तो इसमें इतनी गुरुता कहाँ से आती ? आश्चर्य होता है। यह हाथी क्या है ? दाँतों वाला विन्ध्य पर्वत है। अथवा सूँड से युक्त भगवान् आदिवराह है ।' इस तरह आश्चर्य में पड़े हुए बाण से दौवारिक ने कहा—'देखो— पराजित होकर वनमें भागे हुए शत्रु राजा अपनी समूल नष्ट धन-सम्पत्ति को फिर १. अकाण्डप्रावृट् ।
११२ हर्षचरितम् आयातः कथमप्ययं स्मृतिपथं शूनीभवच्चेतसां नागेन्द्रः सहते न मानसगतानाशागजेन्द्रानपि ॥ तदेहि । पुनरप्येनं द्रक्ष्यसि । पश्य तावद्देवम्' इत्यभिधीयमानश्च तेन मदजलपङ्किलकपोलपट्टपतितां मत्तामिव मदपरिमलेन मुकुलितां कथमपि तस्माद्दृष्टिमाकृष्य तेनैव दौवारिकेणोपदिश्यमानवर्त्मा समतिक्रम्य भूपालकुलसहस्रसंकुलानि त्रीणि कक्षान्तराणि चतुर्थे भुक्तास्थानमण्ड- पस्य पुरस्तादजिरे स्थितम्, दूरादूर्ध्वस्थितेन प्रांशुना कर्णिकारगौरेण व्यायामठवायतवपुषा शस्रिणा मौलेन शरीरपरिवारलोकेन पङ्क्ति- स्थितेन कार्तस्वरस्तम्भमण्डलेनेव परिवृतम्, आसन्नोपविष्टविशिष्टेष्ट- देवाह—सहत इत्यादि । मानसं मनः, सरोभेदोऽपि । आशा दिशः, अभिलाषोऽपि । देवमिति इत्यादौ । चक्रवर्तिनं हर्षमद्राक्षीदिति संबन्धः । मदजलेन पङ्किले कपो- लपट्टे पतिताम् । मत्तामिवेति । मत्तश्च पतति, मुकुलितदृष्टिश्च भवति, गतिवैकल्या- दन्येन कृष्यते । भोजनं भोक्तव्यम् । भुक्ते सत्यास्थानं लोकदर्शनं तदर्थं मण्डप- स्तस्य । ऊर्ध्वस्थितेत्यादि साधारणम् । प्रांशुनोन्नतेन; अन्यत्र, प्रकृष्टा अंशवो यस्य तेन । कर्णिकारमारग्वधपुष्पम् । व्यायामः श्रमः । व्यायतं विभक्तावयवम्, विशे- षेण दीर्घं च । शस्रिणा सायुधेन, स्तम्भा अपि शस्रेण वध्यन्ते । मौलभृतकश्रेणि- मित्रामित्राटविकभेदेन षट्प्रकाराः सहाया भवन्ति । अन्यत्र,—मूले बुध्ने भवं मौलम् । बुध्नप्रतिष्ठमित्यर्थः । पङ्क्तिस्थितेनेति साधारणम् । कार्तस्वरं सुवर्णम्, यस्योदूप्यमानस्य सतः कुङ्कुमस्येव रागो जायते; सौगन्ध्यं च तद्वरिचन्दनम् । से प्राप्त करने के सैकड़ों मनोरथों की चिन्तापूर्ण कल्पना करने लगते हैं, पर किसी प्रकार जब उन्हें दर्पशात का स्मरण हो जाता है तब अत्यन्त निराश हो जाते हैं । इस प्रकार यह गजराज मन के आशारूपी गजेन्द्रों को भी सह नहीं पाता ।' तो चलो, फिर इसे देखना । तब तक महाराज के दर्शन करो । दौवारिक के इस प्रकार कहने पर बाण ने दर्पशात के मदजल से पंकिल गण्डस्थल पर पड़ी हुई मतवाली और मद के सौरभ से कुछ अलसाई हुई अपनी दृष्टि को किसी प्रकार फेर लिया और उसके द्वारा बताये मार्ग से चलकर हजारों राजाओं से भरी ड्योढ़ियों को पार करते हुये चौथी में पहुंच कर चक्रवर्ती महाराज हर्ष को देखा । वे भुक्तास्थानमण्डप के सामने आंगन में बैठे हुए थे । कुछ दूर पर दृढ़ होकर खड़े हुए, कर्णिकार के समान गौर वर्ण वाले, व्यायाम से गठीले शरीर वाले, शस्त्रधारी पुश्तैनी अंगरक्षक उनके चारों ओर सोने के स्तम्भ के समान पंक्ति में खड़े थे । उनके समीप विशिष्ट और प्रेमी जन
द्वितीय उच्छ्वासः ११३ श्लोकम्, हरिचन्दनरसप्रक्षालिते तुषारशीकरशीतलतले दन्तपाण्डुरपादे शशिमय इव मुक्ताशैलशिलापट्टशयने समुपविष्टम्, शयनीयपर्यन्तविन्यस्ते समर्पितसकलविग्रहभारं भुजे, दिङ्मुखविसर्पिणि देहप्रभावित्ताने विततमणि- मयूखे घर्मसमयसुभगे सरसीव मृदुमृणालजालजटिलजले सराजकं रम- माणम्, तेजसः परमाणुभिरिव केवलैर्निर्मितम्, अनिच्छन्तमपि बलादा- रोपितमिव सिंहासनम्, सर्वावयवेषु सर्वलक्षणैर्गृहीतम्, गृहीतब्रह्मचर्य- मालिङ्गितं राजलक्ष्म्या, प्रतिपन्नासिधाराधारणव्रतमविसंवादिनं राजर्षिम्, शशिमय इति वक्ष्यमाणाभिप्रायेण । तुषारेत्यादिना शीतत्वममुष्य दर्शयति । दन्ते तद्वच्च पाण्डुरे पादे । रश्मयोऽपि पादाः । मुक्तेत्यादिना शुक्कतयापि शशिमय इवेत्येतदेव पोषयति । विग्रहः कायः, रणश्च । घर्मेत्यादि । मणीनां स्वभावत एव शीतत्वात्तदीया मयूखा अपि ह्लादयन्ति । यो हि बलवानारोप्यते स सर्वाङ्गेषु गृह्यते । गृहीतब्रह्मचर्यमिति । स्वदारसंतुष्ट ऋतुकालगामी । 'गृहस्थोचितव्यापारो ब्रह्मचर्यमेव' इति श्रुतेः । यत्त्वेवमनुश्रूयते—'यावन्मया न सकला जिता भूमिस्ता- वन्मे ब्रह्मचर्यम्' इति श्रीहर्षः प्रतिज्ञातवान् । द्वादशभिश्च वर्षेर्जित्वा तां महिषीम- ब्रवीत्—'प्रतिज्ञा मे निर्व्यूढा' इति । ततो रोषात् 'अहमपि द्वादशवर्षं ब्रह्मचर्यं चरामि' इति सा प्रतिज्ञामकरोत् । इति ब्रह्मचर्येणाज्ञाकालोऽतिवाहितः । यश्च गृहीतब्रह्मचर्यः स कथं योषितालिङ्ग्यत इति विरोधः । असिधारा खड्गधारा, व्रतविशेषश्च । यत्र स्त्रीपुंसावकपटौ ब्रह्मचर्येण तिष्ठतः । यश्च प्रतिपन्नेषु विश्वा- सितेषु खड्गधारां पातयति स कस्मान्न विसंवदते; नान्यथा भवति कथं च राज- र्षिरसावुच्यत इति विरोधः । यश्च राजर्षिरुत्तममुनिर्गृहीतासिधारो ब्रह्मचारी च बैठे थे । संगमरमर की चौकी पर वे विराजमान थे जो हरिचन्दन के रस से धुली हुई, बर्फ के फुहारे की तरह ठंडी, एवं हाथीदाँत के बने उजले गोड़ों वाली थी, मानों चन्द्र को गढ़ कर बन ई गई हो । शयन के सिरे की ओर टिकी हुई भुजा पर वे सारे शरीर का भार डाले थे । उनके शरीर का प्रभा-वितान दिशाओं में फैल रहा था, मानों वे कोमल मृणालों से भरे तालाब में ग्रीष्म के समय उन राजाओं के साथ स्नान का आनन्द ले रहे थे, मानों केवल तेज के परमाणुओं से उनका निर्माण हुआ था । ऐसा लगता था कि उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें सिंहासन पर बैठने के लिए बाध्य किया गया था । उनके समस्त अंगों में सब के सब लक्षण दिखाई दे रहे थे । ब्रह्मचर्य ग्रहण करके भी राजलक्ष्मी से आलिङ्गित थे १ । उन्होंने असिधाराव्रत लिया था और वे सदा १. हर्ष ने राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद यह प्रतिज्ञा की थी कि जब तक मैं सम्पूर्ण भूमि को दिग्विजय न कर लूंगा तब तक ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा । ८ ह० च०
११४ हर्षचरितम् विषमराजमार्गविनिहितपदस्खलनभियेव संलग्नं धर्मे, सकलभूपालपरि- त्यक्तेन भीतेनेव लब्धवाचा सर्वात्मना सत्येन सेव्यमानम्, आसन्नवार- विलासिनीप्रतियातनाभिश्चरणनखपातिनीभिर्दिग्भिरिव दशभिर्विग्रहावर्जि- ताभिः प्रणम्यमानम्, दीर्घैर्दिगन्तपातिभिर्दृष्टिपातैर्लोकपालानां कृताकृतमिव प्रत्यवेक्षमाणम् मणिपादपीठपृष्ठप्रतिष्ठितकरेणोपरिगमनाभ्यनुज्ञां मृग्य- माणमिव दिवसकरेण, भूषणप्रभासमुत्सारणबद्धपर्यन्तमण्डलेन प्रद- क्षिणीक्रियमाणमिव¹ दिवसेन, अप्रणमद्भिर्गिरिभिरपि² दूयमानं, शौर्यो- ष्मणा फेनायमानमिव चन्दनधवलं लावण्यजलधिमुद्वहन्तमेकराज्यो- र्जितेन, निजप्रतिबिम्बान्यपि नृपचक्रचूडामणिधृतान्यसहमानमिव, दर्पदुःखासिकया चामरानिलनिभेन बहुधेव श्वसन्तीं राजलक्ष्मीं दधानम्, स कयाचिदालिङ्गयेत । विषमोऽशक्यानुष्ठानो नतोन्नतरूपः । मार्गो व्यवहारः, पन्थाश्च । विषमे पथि च स्खलति येन क्वचित्सुलभेन भूयते । लब्धवाचेति । सत्यस्य वागेवाश्रयणीयश्च । सर्वैस्त्यक्तः सन्भीतः संस्थां त्यजामीति वाचं लब्ध्वान्यं सेवते, वारविलासिनी शरीरोपचारचतुरा मुख्यललनाप्रतिबिम्बम् । दशभिरिति । नखानां दिशां च दशसंख्याकत्वात् । मणिपादेति । मणिसंबन्धप्र- तिष्ठानमेव पोषयति । करो हस्तोऽपि । फेनायमानमिति । जलं संतापेन सफेनं एकरस रहने वाले राजर्षि थे। टेढ़े-मेढ़े राजमार्ग (राजा के पद) पर पैर फिसलने के भय से मानों उन्होंने धर्म का आश्रय लिया था। मानों सत्य दूसरे राजाओं से तिरस्कृत होकर डरते-डरते वचन लेकर सब प्रकार से उन्हीं की सेवा में तत्पर था। पास में एक वेश्या (चामरग्राहिणी) खड़ी थी जिसकी परछाइयाँ उनके चरण के नखों पर पड़ रही थीं, मानों दसो दिशाएं शरीर धारण करके उनको प्रणाम कर रही हों। वे दूर तक लम्बे दृष्टिपात करते हुए मानों लोकपालों की गलती-सही देख रहे थे। सूर्य की किरणें उनके मणिमय पादपीठ पर पड़ रही थीं मानों वह आकाश में दूर जाने के लिए सम्राट् की अनुमति पाने की इच्छा से प्रार्थना कर रहा था। आभूषणों की प्रभा से उनके चारों ओर मंडल-सा बन गया था मानों दिन उनकी प्रदक्षिणा कर रहा हो। उन्नत होने के कारण न झुकने वाले पर्वत भी मानों उनसे प्रभावित थे। वह उस चन्दन के सदृश उज्ज्वल लावण्य के समुद्र को धारण कर रहे थे जो उनके ऐकाधिपत्य के बढ़े शौर्य के प्रताप से खौल कर फेनिल हो रहा था। अपने ही प्रतिबिम्बों को जो राजाओं की चूड़ामणियों में पड़ रहे थे, सहन नहीं कर पाते थे। चंवर की हवा के १. मिव गलितोष्मणा दिवसेन । २. भूभृद्भिर्दूयमानं ।
सकलमिव चतुःसमुद्रलावण्यमादायोत्थितया श्रिया समुपश्लिष्टम्, आभरणमणिकिरणप्रभाजालजायमानानीन्द्रधनुःसहस्राणीन्द्रप्राभृतप्रहि- तानि बिभ्रमानमिव, राज्ञां संभाषणेषु परित्यक्तमपि मधु वर्षन्तम्, काव्यकथास्वपीतमप्यमृतमुद्वमन्तम्, विश्रम्भभाषितेष्वनाकृष्टमपि हृदयं दर्शयन्तम्, प्रसादेषु निश्चलामपि श्रियं स्थाने स्थाने स्थापयन्तम्, वीरगोष्ठीषु पुलकितेन कपोलस्थलेनानुरागसंदेशमिवोपांशु रणश्रियः शृण्व- न्तम्, अतिक्रान्तसुभटकलहालापेषु स्नेहवृष्टिमिव दृष्टिमिष्टे कृपाणे पातय- न्तम्, परिहासस्मितेषु गुरुप्रतापभीतस्य राजकस्य स्वच्छमाशयमिव दशनांशुभिः कथयन्तम्, सकललोकहृदयस्थितमपि न्याये तिष्ठन्तम्, भवति । असहमानमिवेति । कथं सामान्येन समान इति । सकलमित्यादि । सकल- पदेन चतुःशब्देन च शौरेरस्य विशेषमाह । यतो लवणत्वस्य तत्राद्यापि शिष्यमा- णत्वात् । अलं लावण्यमादाय । एकस्माच्च समुद्रादुत्थाय लक्ष्म्या शौरिः समुप- श्लिष्टः । लावण्यं लवणता, सौन्दर्यं च । प्राभृतं ढौकनिकम् । मधु मद्यम्, अमृतं च। विश्रम्भ आश्वासः । उपांश्वप्रकटम् । अतिक्रान्ते कलहे रणे शस्त्राणां स्नेहो दीयते रुधिरादिसलिलनिवारणाय । स्वच्छं निर्मलम् । सुप्रसादमाशयं भावं, प्रकृष्टतापभी- तस्य च स्वच्छो निर्मल आशयो जलाधारो दृश्यते । अत्र प्रतापेत्यादि प्रकरणसाह- चर्यात्स्वच्छतान्यथानुपपत्त्या च जलशब्दं विना जलाशय एव प्रतीयते । न्याये तिष्ठन्तम् । न्यायमनुरुन्धन्तमित्यर्थः । य सर्वेषां हृदयस्थितः स एकस्मिन्नेव तिष्ठ- बहाने दर्प के दुःख से बार-बार साँस ले छोड़ती हुई राजलक्ष्मी को धारण कर रहे थे, मानों चारों समुद्रों के लावण्य को लेकर निकली हुई श्री ने उनका आलिंगन किया था, मानों उपहार के रूप में इन्द्र द्वारा भेजे गए उनके आभरणों की प्रभा से हजारों इन्द्रधनुष बन गए थे, मानों उपहार के रूप में इन्द्र ने भेजा हो। राजाओं के साथ बातचीत के प्रसंग में छुटे हुए भी मधु (मदिरा अथवा मधुरस) की मानों वर्षा कर रहे थे। कविता की गोष्ठियों में न पिए हुए अमृत को भी मानों उगल रहे थे। विस्रंभालाप करते हुए अपने अनाकृष्ट हृदय को मानों दिखा रहे थे। प्रसन्न होकर स्थान-स्थान में अपनी निश्चल श्री को भी अर्पित कर रहे थे। वीरगोष्ठियों में उनके कपोल रोमांच से भर आए थे मानों एकान्त में रणश्री द्वारा भेजे गए अनुरागसंदेश को सुन रहे थे। बड़े-बड़े योद्धाओं की बातचीत के प्रसंग के बाद अपने प्रिय कृपाण पर दृष्टिपात कर रहे थे। हँसी-मजाक में मुस्कुराते हुए वे अपने प्रचंड प्रताप से भीत राजाओं के प्रति दाँत की किरणों से अपने स्वच्छ मनोभाव को व्यक्त कर रहे थे। सारे जन-समूह के हृदय में स्थित होकर भी न्याय में स्थिर थे। उनमें लक्ष्मी का
अगोचरे गुणानामभूमौ सौभाग्यानामविषये वरप्रदानानामशक्य आशि- षाममार्गे मनोरथानामतिदूरे दैवस्यादिश्युपमानानामसाध्ये धर्मस्या- दृष्टपूर्वे लक्ष्म्या महत्त्वे स्थितम्, अरुणपादपल्लवेन सुगतमन्थरोरुणा वज्रायुधनिष्ठुरप्रकोष्ठपृष्ठेन वृषस्कन्धेन भास्वद्विम्बाधरेण प्रसभावलो- कितेन चन्द्रमुखेन कृष्णकेशेन वपुषा सर्वदेवतावतारमिवैकत्र दर्श- यन्तम्, अपि च मांसलमयूखमालामलिनितमहीतले महति महार्हे माणि- क्यमालामण्डितमेखले महानीलमये पादपीठे कलिकालशिरसीव सलीलं विन्यस्तवामचरणम्, आक्रान्तकालियफणाचक्रवालं बालमिव पुण्ड- रीकाक्षम्, क्षौमपाण्डुरेण चरणनखदीधितिप्रतानेन प्रसरता महीं महादेवीपट्टबन्धेनेव महिमानमारोपयन्तम्, अप्रणतलोकपालकोपने-
तीति विरोधः। अरुणो लोहितः, अनूरुश्च। शोभनं गमनं ययोस्तौ मन्थरावूरू यस्य । बुद्धश्च सुगतः। वज्राख्यमायुधं तद्वन्निष्ठुरं कठोरं प्रकोष्ठस्य पृष्ठं यस्य तेन। इन्द्र- श्चास्य वज्रमायुधम् । 'प्रकोष्ठमन्तरं विद्यादरत्निमणिबन्धयोः' । वृषो दान्तः, धर्मश्च । भास्वद्भास्वरम्, रविश्च भास्वान्। बिम्बं फलभेदः, मण्डलं च। अवलोकितं वीक्षि- तम्, बुद्धिभेदश्चावलोकितः। कृष्णः कालः, हरिश्च कृष्णः। कलिकालेति । कलिका- लस्य मलिनत्वादेवमुत्प्रेक्षा । वामपादेन पराभवनीयत्वमेव पोष्यते। कालियो
उत्कर्ष था जो गुणों का अगोचर, सौभाग्य का अभूमि, वरदान का अविषय, आशीर्वचनों का अशक्य, मनोरथों का अमार्ग, भाग्य से भी अतिदूर, उपमानों का अविषय, एवं धर्म का असाध्य था। अपने आप को समस्त देवताओं के अवतार के रूप में प्रकट कर रहे थे, उनके पादपल्लव अरुण (लाल, सूर्य का सारथी अरुण), सुगत (बुद्ध) अर्थात् सुन्दर गमन करने वाले और मन्दगामी दोनों ऊरु, हाथ के गट्ट वज्र के समान (वज्रायुध = इन्द्र) कड़े, वृष (बैल, धर्म) के समान कंधे, चमकते हुए (भास्वत = सूर्य) बिम्बाधर, दृष्टिपात (अवलोकितेश्वर) प्रसन्न, चन्द्र के सदृश मुख एवं केश काले (कृष्ण) थे। सम्राट् का बायाँ पैर महानीलमणि के बहुमूल्य, विविध रत्नों से मंडित पादपीठ पर रखा हुआ था जिसकी गहरी कृष्ण वर्ण की आभा चारों ओर फैल रही थी मानों उन्होंने कलिकाल के सिर पर अपना पैर रख दिया हो। अथवा बालक श्रीकृष्ण ने कालिय नाग के फनों पर आक्रमण किया हो। क्षौम वस्त्र के समान उनके चरणों के नखों की रश्मियाँ फैलती थीं मानों पृथिवी को पट्टबंध द्वारा राजमहिषी के पद पर प्रतिष्ठित कर रहे थे। सम्राट् के दोनों चरण प्रणत होने वाले लोकपालों पर क्रोध के कारण मानो लाल हो रहे थे, राजाओं के मुकुट में पद्मराग
द्वितीय उच्छ्वासः ११७ वातिलोहितौ सकलनृपतिमौलिमालास्वतिपीतं पद्मरागरत्नआतपबिंबं वमन्तौ सर्वतेजस्विमण्डलास्तमयसंध्यामिव धारयन्तावशेषराजककुसुम- शेखरमधुरसस्रोतांसीव स्रवन्तौ समस्तसामन्तसीमन्तोत्तंसस्रक्सौरभ- भ्रान्तैर्भ्रमरमण्डलैरमित्रोत्तमाङ्गैरिव मुहूर्तमप्यविरहितौ संवाहनतत्परायाः श्रियो विकचरक्तपङ्कजवनवासभवनानीव कल्पयन्तौ जलजशङ्खमीन- मकरसनाथतलतया कथितचतुरम्भोधिभोगचिह्नाविव चरणौ दधा- नम्, दिङ्नागदन्तमुसलाभ्यामिव विकटमकरमुखप्रतिबन्धबन्धुराभ्यामु- द्वेल्ललावण्यपयोधिप्रवाहाभ्यामिव फेनाहितशोभाभ्यां कूलाचन्दनद्रुमा- भ्यामिव भोगिमण्डलशिरोरत्नरश्मिरज्यमानमूलाभ्यां हृदयारोपितभूभार- धारणमाणिक्यस्तम्भाभ्यामूरुदण्डाभ्यां विराजमानम्, अमृतफेनपिण्ड- पाण्डुना मेखलामणिमयूखखचितेन नितम्बबिम्बव्यासङ्गिना विमल- पयोधौतेन नेत्रसूत्रनिवेशशोभिनाधरवाससा वासुकिनिर्मोकेणेव मन्दरं द्योतमानम्, अघनेन सतारागणेनोपरिकृतेन द्वितीयाम्बरेण भुव- नागभेदः। पुण्डरीकाक्षमिवि राज्ञो विशेषणम्। तेजस्विनो वीराः, आदित्याश्च। जलजेत्यादीनि महाराजविशेषणानि लक्षणानि। एवमादि च संभवति। मकर- मुखं जानुसंधिः, मकरमुखवच्चिह्नित्तान्तकपोलश्च। उद्वेलतया लावण्यस्य समु- च्छलद्रूपत्वमाह। फेनो रससंतानः, डिण्डीरश्च। भोगिनो नृपाः, सर्पाश्च। फेनवत्तैश्च पाण्डु। मेखला रशना, पर्वतमध्यभूमिश्च। पयो जलम्, क्षीरं च। नेत्रसूत्रं पट्टसूत्रम, मन्थनरज्जुश्च। अघनेन छातेन, अनभ्रेण च। ताराः सूत्रबिन्दवः मणि का आतप वमन कर रहे थे, मानों समस्त तेजस्वियों के अस्त हो जाने के कारण संध्याराग को धारण कर रहे थे, समस्त राजाओं के सिर की पुष्परचित माल के मधुरस बरस रहे थे, सामन्तों के केशविन्यास की माला की सुगन्ध में लुभाए हुए भौरे शत्रुओं के सिर के रूप में चरणों को नहीं छोड़ते, सेवा में लीन लक्ष्मी के निवास के लिए खिले हुए लाल कमलों के भवनों को मानों बना रहे थे, तलवे में कमल, शंख, मछली और मकर के चिह्न थे जिनसे व्यक्त होता था कि उन्होंने चारों समुद्रों के उपभोग के चिह्नों को प्राप्त किया था। उनको दोनों जांघें दिग्गजों के मूसल जैसे दांतों के समान थीं, मकर के विकट मुह के प्रतिबंध से ऊपर-नीचे तरंगित होते हुए लावण्य- समुद्र के दो प्रवाह के सदृश थीं, जिसमें फेनों द्वारा शोभा बढ़ गई थी, कला के चन्दनवृक्ष की भाँति थीं जो भोगिमण्डल (धनिकसमूह, सर्पमण्डल) के सिर के रत्नों की रश्मियों से मूल में रंजित हो रही थीं, मानों हृदय पर पृथिवी के भार को धारण करने के लिए दो बड़े बड़े खम्भे गाड़ दिए गए हों। वासुकि सर्प के केंचुल से मंदराचल
११८ हर्षचरितम् नाभोगमिव भासमानम् , इभपतिदशनमुसलसहस्रोल्लेखकठिनमसृणे- नापर्याप्ताम्बरप्रथिम्ना विविधवाहिनीसंक्षोभकलकलसंमर्दसहिष्णुना कैला- समिव महता स्फटिकतटेनोरुणोरःकपाटेन विराजमानम् , श्रीसरस्वत्यो- रुरोवदनोपभोगविभागसूत्रेणेव पतितेन शेषेणेव च तद्भुजस्तम्भविन्य- स्तसमस्तभूभारलब्धविश्रान्तिसुखप्रसुप्तेन हारदण्डेन परिवलितकन्धरम् , जीवितावधिगृहीतसर्वस्वमहादानदीक्षाचीरेणेव हारमुक्ताफलानां किरण- निकरेण प्रावृतवक्षःस्थलम् , अजजिगीषया बालैर्भुजैरिवापरैः प्ररोहद्भि- र्बाहूपधानशायिन्याः श्रियाः कर्णोत्पलमधुरसधारासंतानैरिव गलद्भिर्भु- वजन्मनः प्रतापस्य निर्गमनमार्गैरिवाविर्भवद्भिररुणैः केयूररत्नकिरणदण्डै- रुभयतःप्रसारितमणिमयपक्षवितानमिव माणिक्यमहीधरम् , सकल- नक्षत्राणि च । अम्बरं वासः, नभश्च । इभपतीत्यादि साधारणम् । अपर्याप्तमम्बरं वासो यस्य तादृक्प्रथिमा यस्य, अम्बरं च खम् । वाहिनी सेना, नदी च । अन्यपर्वतसाधारण्येऽपि छायावत्त्वादुन्नतत्वाच्च कैलासमिवेत्युक्तम् । हारेत्यादिना उरुत्वं काठिन्यमाह । परिवलिता । 'परिवेष्टिता-' इति पाठे व्याप्तेत्यर्थः । अजो हरिः । भुजेत्यादिना सेनादिकृतं नयादिकृतं च प्रतापं व्यवच्छिनत्ति । माणिक्य- पर्वत की शोभा होती है उसी प्रकार उनका अधोवस्त्र अत्यन्त महान्, श्वेत फेन की तरह, मेखलामणि की किरणों से खचित, नितम्बों से सटा हुआ था और उसके ऊपर रेशम का पटका लगा हुआ था। दूसरा वस्त्र उत्तरीय था जिसमें जामदानी की भाँति छोटे छोटे तारे या सूत्रबिन्दु कढ़े हुए थे, वह सम्राट् को उस प्रकार शोभित कर रहा था जैसे तारों-भरा आसमान भुवनाभोग को। जैसे कैलास-पर्वत का स्फटिक तट ऐरावत के दाँतों के हजारों प्रहार से कठिन और चिकना हो गया है और आकाश के लिए जिसका विस्तार पर्याप्त नहीं, एवं विविध नदियों के कोलाहलपूर्ण संमर्द को जो सहता है उसी प्रकार सम्राट् का उरःकपाट भी गजों के दशनों के घात-प्रतिघात से कठिन और कोमल, एवं विविध सेनाओं के कोलाहल में भी क्षुब्ध न होने वाला था। उनका हारदंड कंधे से घिर कर लटक रहा था, मानों वह लक्ष्मी और सरस्वती के क्रम से वक्ष और मुख के उपभोग का विभाग-सूत्र था, अथवा मानों शेषनाग सम्राट् की भुजाओं पर सारे पृथिवी के भार को रख कर विश्राम की नींद ले रहे हों। हार में पिरोई हुई मुक्ताओं की किरणे फैलकर उनके वक्ष में लिपट रही थीं मानों सम्राट् ने जो प्रति पाँचवें वर्ष सर्वस्वदक्षिण महादान दिए हैं उन्हीं के दीक्षावस्त्र हों। उनके बिजाइठ के रत्नों की दंडाकार किरणें उनके दोनों ओर फैल रही थीं, मानों चतुर्भुज