भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

प्रथम उच्छ्वासः १३ रागो जातो ययोरिति व्याख्येयम् । पदक्रमं पादन्यासपरिपाटी । अन्यत्र च-पदानि च क्रमश्च तत्पदक्रमम्, चरणौ पादौ चरणाश्च विशिष्टशाखापाठकता वाचालिताः शोभिता ययेति । उल्का उत्सुकाः । मेखलादाम्नि रशनागुणे । मानसं चित्तं, सरोवि- शेषश्च । गुणा अपि भास्वान्दीप्तो मध्यनायकः पदकं यत्र तत् । अथ च भास्वतो मध्यं तेन नयति सः । यदुक्तम्-‘परिव्राड्योगयुक्तश्च शूरश्चाभिमुखे हतः । द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डलभेदिनौ ॥' इति । मुक्ता मौक्तिकानि, मोक्षगामिनश्च । हारं मुक्ता- कलापं च, अपवर्गमपि ।' हारं हरसम्बन्धिनं तत्प्रसादप्राप्यत्वात् । 'अलक्तरसेनेव पाटलेन' इति वा पाठः । स्फुरतेति रोषात् । भगवतीकपोले शशिहरिणस्यैवावतारः सम्भाव्यत इति शशिपदम् । अत्र हि कपोले ब्रह्मकृष्णाजिनसंक्रान्तिः, तत्र काम- सम्भावना सामान्यहरिणस्यावतरणे । कलुषितं प्रक्षालयन्तीवेति । सलिलस्य क्षालन- मेव युक्तमिति समुचितेयमुक्तिः । श्रुतिप्रणयिभिरिति । श्रूयते इति श्रुतिर्ध्वनिस्तस्या प्रणयः प्रशंसातिशयो येषां तैः । यद्वा-श्रुती श्रोत्रे तत्कर्तृकः प्रणयः प्रार्थना मधुर- ध्वनित्वाद्येषां तैः । कर्णसम्बन्धैरिति व्याख्याने तु कर्णावतंसेत्यादिना पौनरुक्त्यम- परिहार्यम् । श्रुतिर्वेदोऽपि । सूक्ष्मार्थदर्शित्वात्सूक्ष्मस्तीक्ष्णः विमलस्तत्त्वग्राही । अन्यत्र-सूक्ष्मं तनु, विमलं शुक्लम् । प्रतानः प्रसारः । इसी बीच स्वभाव से अत्यन्त क्रोधी, महातपस्वी, अत्रि का पुत्र, तारापति का भ्राता दुर्वासा नाम का मुनि उपमन्यु नाम के दूसरे मुनि के साथ झगड़ा कर बैठा और सामगान करते हुए क्रोध से अन्धे होकर उसने स्वर-भंग कर दिया । शाप न दे दे इस डर से सबके सब चुप हो गए और दूसरों के साथ बात करने के बहाने ब्रह्माजी ने भी (उस विस्वर सामगान की) उपेक्षा की । पर कुमारी सरस्वती वहीं उपस्थित थी । वह कुछ कुछ अपना बालभाव छोड़ नये यौवन को सुशोभित करने वाली उम्र में आ पहुँची थी । चँवर पकड़ कर भुजलता को हिलाते हुए पितामह ब्रह्माजी पर झल रही थी । दुर्वासा के प्रति झुंझलाहट के कारण भूमि पर पटकने से मानो लाल हुए पल्लव के समान स्वाभाविक लाल अपने चरणों से शोभित थी । पदन्यास से मुखरित होने वाले नूपुरों से उसके दोनों चरण वाचाल हो रहे थे, मानों पदपाठ और क्रमपाठ के अभ्यास में मुखर दो शिष्य अपने चरण अर्थात् शाखा का स्वाध्याय कर रहे हों । उसकी दोनों जांघें धर्मनगर के तोरणस्तम्भ का अनुकरण कर रही थीं । उत्सुक कलहंस की भांति अव्यक्त शब्द करती हुई अपनी करधनी (मेखलादाम) पर वह लीला के साथ किसलयसदृश अपना बायां हाथ रखे हुए खड़ी थी । विद्वानों के चित्त में हमेशा निवास करने से संक्रान्त हुए गुणों (श्लेष से तन्तुओं) के समान कंधे पर लटके हुए ब्रह्मसूत्र से उसका शरीर पवित्र हो रहा था । वह चमकते हुए मध्यमणि से युक्त और अनेक मोतियों से गुम्फित हार को पहने थी, जो सूर्य के मध्य से के जाने वाले और अनेक मोक्षगामी जीवों द्वारा

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