हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ हर्षचरितम् अनुसृत मोक्षमार्ग की तरह प्रतीत हो रहा था। मुख में विद्यमान समस्त विद्याओं के चरण के आलते से मानों पाटल हुए (क्रोध से) फड़कते ओठ उसे सुशोभित कर रहे थे। उसके कपोलों पर ब्रह्माजी के काले मृगचर्म की छाया पड़ रही थी, मानों उसके मीठे गानों को सुनने के लिए चन्द्रमा का मृग ही वहाँ उतर कर आ गया हो। उसकी एक भौंह कुछ तिरस्कार का भाव लिए हुए टेढ़ी और ऊपर की ओर उठी हुई थी। आँख के कोने से निकलते हुए आँसू की धारा से मानों वह भ्रष्ट पाठ के श्रवण करने से कलुषित अपने एक कान को धो रही थी और उसके दूसरे कान पर खिले हुए श्वेत सिन्धुवार की मंजरी हँस रही थी जिससे उसका विद्यामद प्रकट हो रहा था। उसके कान पर लगे कनकफूल पर भौंरे छाए हुए थे, मानों वह श्रुति (वेद) से प्रेम करने वाले अनेक प्रणवों (ओं अक्षरों) से उपासित हो रही थी। प्रज्ञा के प्रतान की तरह बहुत बारीक तन्तुओं से बना और उज्ज्वल अंशुक उसका शरीर ढँक रहा था। वह वाग्द्व्य के समान निर्मल अपने दाँतों से चाँदनी का आलोक दिशाओं में छिटका रही थी। (दुर्वासा के स्वरहीन पाठ को) सुन कर वह हँस पड़ी। दृष्ट्वा च तां तथा हसन्तीं स मुनिः 'आः पापकारिणि, दुर्गृहीतविद्या- लवावलेपदुर्विदग्धे, मामुपहससि' इत्युक्त्वा शिरःकम्पशीर्यमाणबन्धविश- रारोरुन्मिषत्पिङ्गलिम्नो जटाकलापस्य १ रोचिषा २ सिञ्चन्निव रोषदहन- द्रवेण दश दिशः, कृतकालसंनिधानामिवान्धकारितललाटपट्टाष्टापदा- मन्तकान्तः ४ पुरमण्डनपत्रभङ्गमकरिकां भ्रुकुटिमाबध्नन् , अतिलोहितेन चक्षुषामर्षदेवतायै स्वसृधिरोपहारमिव प्रयच्छन् , निर्दयदष्टदशनच्छ- दभयपलायमानामिव वाचं रुन्धन्दन्तांशुच्छलेन, अंसावंसंसिनः शापशासनपट्टस्येव प्रध्नन्ग्रन्थिमन्यथा कृष्णाजिनस्य, स्वेदकणप्रति- बिम्बितैः शापशङ्काशरणागतैरिव सुरासुरमुनिभिः प्रतिपन्नसर्वावयवः, कोपकम्पतरलिताङ्गुलिना करेण प्रसादनलग्नामक्षरमालामिवाक्षमाला- माक्षिप्य कामण्डलवेन वारिणा संमुपस्पृश्य शापजलं जग्राह। दृष्ट्वेत्यादौ। स मुनिस्तां तथा हसन्तीं दृष्ट्वा शापजलं जग्राहेति सम्बन्धः। तथेति १. जटासञ्चयस्य। २. शोचिषा। ३. ललाटाष्टापदां । ४. अन्तक मण्डन । ५. अंससंसिनः। ६. स्वेदप्रति। ७. शापभयाच्छरण । ८. प्रसादलग्नामक्षमालां विक्षिप्य; अङ्करावस्थितामिवाक्षरमाला। ९. स समुप।