भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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प्रथम उच्छ्वासः १५ पादताडनभूक्षेपादिपूर्वंम् । स मुनिरिति प्राग्वर्णितस्वरूपः । आः इत्यवज्ञायाम् । मामिति योऽहं त्रैलोक्यप्रख्यातरौषणस्तमेवेति । समीप एव विशीर्यते तच्छीलो विशरारुरितश्चामुतश्च । अत एवोन्मिषत्पिङ्गलिमा । रोचिषा दीप्त्या । रोषदहनो द्रवो रस इव, द्रवत्वं च यद्यपि विशिष्टस्यैव तेजसः सुवर्णादि सम्भवति, तथाप्यम्ब- श्चोपचारात्साद्दश्यम् । कालः कृष्णो गुणो यमश्च । अन्धकारितं सङ्कुचितत्वाददर्श- नीयमेव चकितं ललाटपट्टमेवाष्टापदम् । यथा प्रतिपङ्कि अष्टौ पदान्यस्येत्यष्टापदं चतुरङ्गफलकम् । अत एवानेन भूसमुन्नमनमव्यक्तीकृतररेखवत्तया विस्पष्टम्यलीक- मेतत् । 'ललाटमुपगीयते । भ्रुवोर्मूलसमुत्क्षेपाद्भ्रुकुटिं परिचक्षते' । सुशब्दः सुतरां नैरपेक्ष्यसूचनाय वा चोभयसम्बन्धः । अमावससिन इति । संरम्भाच्छ्वासनपट्टः शुक्कृत्वान्निषिकाष्ण्यांच सितासितवर्णसंवलितमध्यः पर्यन्तशुक्लश्च भवति । अत एव ते बिन्दुचित्रत्वादुपान्तशुक्लत्वाच्च कृष्णाजिनमुखेक्षते । यथा शासनपट्टे सति क्वचि- द्ग्रामादावधिकागे भवति, तदृञ्च जनसमूहः प्रार्थनां करोति । सहस्तपाददिके सर्वस्मिन्नङ्गे गलति । कोपेत्यादौ कम्पग्रहणम् । रोषः शरीरं बाधत इति यावत् । सन्निवेशसाधर्म्माद्युक्तम् — अक्षरमालामिवेति । सरस्वतीसम्बन्धितया चोक्तम्— प्रसादनप्राप्तमिति · विक्षिप्यन्ते । यश्च विक्षेपतः प्रसादयति स विक्षिप्यते तिरस्क्रि यते । कामण्डलवेन मुनिकरकमलेन । समुपस्पृश्याचम्य । दुर्वासा ने सरस्वती को उस प्रकार हँसते देखकर कहा—'ओ पाप करने वाली, निम्न रूप से प्राप्त विद्या के लेश पर अभिमान से भरी ओ दुर्विदग्धे, तू मेरा उपहास कर रही है !' यह कह कर मुनि बार-बार शिरःकम्प के कारण बंधन के शिथिल हो जाने पर इधर- उधर खुले हुए, पीताभवर्ण को चमक से युक्त, अपने जटा-समूह के तेज से मानों अपनी क्रोधाग्नि के द्रव से समस्त दिशाओं को सींचने लगे । उनकी भौंहें चढ़ने लगीं, मानों यमराज का सन्निधान प्राप्त कर चुकी थीं, उनके ललाटरूपी शतरंज खेल के पट्टे को मानों अपनी कालिमा से मलिन कर रही हो और जैसे वे यमराज के अन्तःपुर की पत्रमंग- मकरिकाएँ हों । मुनि की आँखें अत्यन्त लाल हो गई, मानों वे अमर्ष देवता के लिए अपने ही रुधिर का उपहार भेंट कर रहे थे । बड़ी बेदर्दी से ओठ कट जाने के भय से भागती हुई वाणी को वे अपने दाँतों को प्रभा के बहाने मानो रोक रहे थे । शाप के शासनपट्ट की भाँति कंधे से गिरते हुए कृष्ण मृगचर्म को गाँठ दूसरे प्रकार से बाँधने लगे । शाप के भय से शरण में आए हुए की तरह सुर, असुर और मुनि उनके स्वेदकणों से भरे समस्त अङ्गों में प्रतिबिम्बित हो रहे थे । क्रोध से उत्पन्न कँपकँपी के कारण चंचल अंगुलियों वाले हाथ से उन्होंने मानों प्रसन्न करने के लिये लगी हुई अक्षमाला की भाँति अपनी अक्ष- माला को फेंक दिया और कमण्डलु के जल से आचमन करके शाप देने के लिए जल उठाया ।