हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उच्छ्वासः १७ निराकृतोऽस्वाध्यायः विळक्षो लज्जितः । सुरासुरमनुजाश्च परस्परविरुद्धानुष्ठानाः । अत्र पुनरीदृशामपि न विप्रतिपत्तिरिति भावः। अभिलषसीति । इच्छामात्रकमपीदं महत्साहसमित्यर्थः । ॐकार एव मुखरितं मुखं येषां तैः । परिकरबन्धः पर्यङ्कबन्धः । स चोत्थितस्यापि संरम्भभाजो भवति । आटोपो वक्षःप्रदेशे श्यामायमानो रात्रि- रिवाचरद्दिवसा यैर्हेतुभिरित्यर्थः । अमर्षनिःश्वासैर्दोलावदग्रेऽन्दोलितश्चलितो ब्रह्मलोको यैः। कुशन्तूनां चामरमिव चामरं गुच्छः । कुशतन्तुचामरं दर्भपिञ्जलम्, चीर- चीवरं वृक्षत्वग्वस्त्रं ते विद्येते येषां तैः। 'आषाढसंज्ञो दण्डस्तु पालाशो व्रतचारिणाम्' । इस अवसर पर देवी सावित्री ब्रह्माजी के समीप सदेह बैठी थी। वह अमृत के फेन- पटल के सदृश उज्ज्वल कल्पद्रुम से प्राप्त दुकूलाकृति छाल को पहने थी। उसने अपने उन्नत स्तनों के मध्य को बिसतन्तु के बने हुए अंशुक की स्वस्तिकाकार गाँती से बाँध रखा था। भस्म की तीन रेखाएँ उसके ललाट के प्रांगण में शोभायमान थीं मानों उसके अपने तपोबल से जीत गए तीनों भुवन की जयपताका हों। कंधे पर अवलम्बित, अमृत- फेन के समान धवल और मानों तपस्या के प्रभाव से टेढ़े किए हुए गङ्गा के सोते के समान उसने अपने योगपट्ट को वक्ष पर टेढ़ा लटका कर वैकक्ष्यक बना लिया था। उसके बायें हाथ में ब्रह्माजी की उत्पत्ति वाले पुण्डरीक के मुकुल के सदृश स्फटिक मणि का कमण्डलु डोल रहा था। वह अपनी दाहिनी भुजा को ऊपर की ओर फेंक रही थी, जो अक्षमाला से परिवेष्टित, शंख की बनी अंगूठी से व्याप्त थी और जिसकी तर्जनी चञ्चल हो रही थी। वह बोल उठी—'अरे पापी, क्रोध का मारा, दुरात्मा, मूर्ख, अपने आप को न पहचानने वाला, पतित ब्राह्मण, पाखण्डी साधु, नीच, स्वाध्यायशून्य, अपनी गलती से लज्जित, तू देवता, असुर, मुनि, मनुष्यसमूह द्वारा वन्दनीय त्रिभुवन की माता देवी सरस्वती को शाप देना चाहता है ?' यह कहती हुई सावित्री मूर्तिमान चारों वेदों के साथ कुशासन छोड़ उठ खड़ी हुई । क्रोध से उन मूर्तिमान् वेदों ने भी अपने-अपने वेत्रासन छोड़ दिए, उनके मुख ओंकार की ध्वनि से भर रहे थे, वेग से ऊपर की ओर फेंकने से उनका चञ्चल जटाभार मानों दिशाओं में फैलने लगा। उनकी कमर में लपेट कर बाँधे हुए काले मृगचर्म की घनी छाया से दिन में अंधेरा छाने लगा, वे अपने अमर्षजन्य निश्वासों से सारे ब्रह्मलोक को दोलायमान करने लगे। उनके शरीर से सोमरस के समान स्वेदजल निकल रहे थे। अग्निहोत्र के पवित्र भस्म से उनके ललाट चमक रहे थे। वे कुश के तन्तुओं से बने चामर एवं वल्कल और आषाढ़संज्ञक पलास का दण्ड धारण किए हुए थे। वे अपने कमण्डलु से मारने के लिए तत्पर हो उठे। ततो 'मर्षय भगवन्, अभूमिरेषा शापस्य' इत्यनुनाथ्यमानोऽपि विबुधैः, 'उपाध्याय, स्खलितमेकं क्षमस्व' इति बद्धाञ्जलिपुटैः प्रसाद्य- २ ह० च०