हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ हर्षचरितम्
इधर-उधर घूमती हुई सहस्रों विद्याधरी अभिसारिकाओं के चरणों में लगे महावर से पुत गया हो । आकाश में घूमते हुए सिद्धों द्वारा सूर्यास्त के अर्घ्यरूप में ढाला गया, दिशाओं को रंजित करता हुआ कुसुंभी रंग का रक्तचन्दन चू रहा था, मानों शिवके प्रणाम करने में विभोर संध्या के शरीर से पसीना निकल रहा हो। वन्दनशील मुनिजन अपनी संध्योपासना में अञ्जलियाँ बाँध रहे थे, मानों ब्रह्माजी की उत्पत्ति वाले कमल की सेवा के लिए समस्त कमल इकट्ठे हों, इस प्रकार ब्रह्मलोक सुशोभिन हो रहा था। ब्रह्माजी तीसरी बार (संध्या- कालीन) सवन (यज्ञीय स्नान) विषयक वेद का उच्चारण कर रहे थे। सप्तर्षियों के गृह- प्रांगण में यज्ञाग्नि की ज्वालाएँ व्याप्त थीं, मानों शिविर में धर्म का एक कार्य नीराजन (आरती) नामक शान्तिकर्म हो रहे हों। अघमर्षण मंत्र के जप से पाप के विषाक्त रोग का विनाश हो जाने से यतिलोग स्वस्थ हो रहे थे। मन्दाकिनी के तट का पुलिन संध्यो- पासना के लिए तपस्वियों के बैठने से और भी पवित्र हो रहा था। तैरता हुआ ब्रह्मा जी का वाहन हंस अपनी उज्ज्वल हंसी से मन्दाकिनी की तरंगों को निम्नोन्नत बना रहा था। जलदेवता के छत्रस्वरूप और पक्षिकामिनियों के अन्तःपुर के प्रासादरूप, अपने मकरंद की मीठी सुगन्ध वाले, तथा भौरों को प्रसन्न करने वाले कुमुद तत्काल खिल रहे थे। राजहंसों का समूह ढंपते हुए कमलों के मीठे मधु (मकरन्द या मध) का सहपान करने से छक कर, गर्दन को कुण्डलित करके कोमल मृणालों द्वारा शरीर खुज- लाते हुए, पंखों को फड़फड़ा कर पद्मसरोंवरों को हवा देते हुए ऊँघ रहा था। तट की लताओं के फूलों की धूल उड़ा कर नदी को धूसर बनाती हुई, सिद्धों के नगर की उत्तम महिलाओं के बंधे हुए केशपाश की मल्लिका की गंध लेकर रात की सांस के समान वायु मंद-मंद बहने लगी। झुण्ड के झुण्ड भौरे सिकुड़ जाने से पराग भरे कमलों के कोशों की संकीर्ण कुटिया में विश्राम करने लगे। नृत्य के समय हिलती हुई भगवान् शंकर की जटा के कुटज फूल-जैसे गुच्छेदार तारे आकाश में छिटक गए। संध्या की लाली लिए हुए, पकते हुए तालफल की त्वचा के समान कलौंस भरी ललाई वाला प्रलयकालीन मेघों के सदृश गहन पहला अंधेरा धरती पर छा गया। रात्रिरूपी कामिनी के कान में खोंसी हुई चम्पा की कली-जैसे दीपक गहन अंधेरे को हटाने लगे। यमुना का रेतीला किनारा नीले जल के हट जाने पर जैसा लगता है उसी प्रकार पूर्व दिशा का मुख चन्द्रमा की कुछ-कुछ रश्मियों के लुनाई-भरे आलोक से पीला होने लगा और अंधकार को क्षीण करने लगा। विलीन होता हुआ अंधकार आकाश को छोड़ने लगा, खिले हुए कुवलय वाले सरोवर अभिन्न वर्ण के हो गए। चह्वे पक्षी के पंख जैसा और रात्रि रूपी भीलनी के बालों जैसा अंधेरा चन्द्र की किरणों के कचग्रह से मानिनी नायिका के मन के समान कम पड़ने लगा। रात्रिवधू के अधरराग के समान लाल चन्द्रमा उदित हो गया, मानों उदयाचल की खोह में रहने वाले सिंह के द्वारा कड़े पंजे से मारे गए