भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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प्रथम उच्छ्वासः २७ हिरन के रक्त से वह रँग गया था। उदयाचल से बहती हुई चन्द्रकान्त मणियों की जलधारा से मानों सारा अंधेरा धुल गया। आकाश में उठ कर चन्द्रमा अपनी सफेद चाँदनी से समुद्र को ऐसे भरने लगा जैसे हाथी के दाँतों का बना हुआ मकरमुखी पनाला गोलोक से दूध की धार बहा रहा हो। इस प्रकार प्रदोष समय के स्पष्ट हो जाने पर सावित्री शून्य हृदय होकर कुछ सोचती और डबडबाती हुई सरस्वती से बोली— 'सखि, तू त्रिभुवन को उपदेश देने में चतुर है, तेरे सामने मेरी जीभ कुछ बकते हुए शर्मिन्दा हो रही है। तू तो जानती ही है कि गुणवान् लोगों के विषय में जैसी दैवी प्रवृत्तियाँ मर्यादाहीन, दुर्जनों की तरह क्रूर, क्षणभङ्गुर, दुरन्त एवं अरमणीय होती हैं। समानता न रखने वालों द्वारा बिना किसी कारण के उत्पन्न परिभव का लेश भी मनस्वी के मन को कलुषित कर डालता है। विपत्ति का अंकुर निरन्तर आँसुओं से सींचे जाने पर वृक्ष के समान हजारों शाखा-प्रशाखाओं में बढ़ता ही जाता है। मालती के फूल की तरह अतिसुकुमार लोगों को सन्ताप के परमाणु मुरझा डालते हैं। छोटा भी अंकुश जैसे हाथियों पर गिर कर उनको परेशान कर देता है वैसे ही बड़ों के ऊपर थोड़े ही क्लेश का पड़ना बहुत कष्टकर हो जाता है। बंधु-बांधव के समान अपनी जन्मभूमियाँ, जिनके साथ स्वाभाविक स्नेहपाश का गठबंधन हो चुका है, दुस्त्यज हैं। अपने परिचित जनों का विरह दारुण आरे की तरह हृदय को चीर डालता है। पर तुझे इस तरह नहीं होना चाहिए। दुःख रूपी विष के पौधे के उत्पन्न होने के लिए तू स्थान नहीं है। और भी, जब कि पूर्वजन्म के बलवान् शुभ या अशुभ कर्म आगे और पीछे फल देने वाले हैं ही तो बुद्धिमान् को शोक करने का क्या अवसर है ? त्रिभुवन का मंगल करने वाले तेरे कमल के समान इस मुख को अमंगल आँसू क्यों अपवित्र कर रहे हैं ? बस रहने दे, अब बता—धरती के किस भाग को अलंकृत करना चाहती है ? किस पुण्यवान् प्रदेश में उतरने के लिए तेरा हृदय तुझे प्रेरित कर रहा है ? किन तीर्थों को तू अनुगृहीत करना चाहती है ? तपोवन के किन धन्य स्थानों में तपस्यानिरत रहने के लिए सोच रही है ? उपचार करने में चतुर, बाल्यकाल से ही धूल की क्रीडाओं का साथी और प्रिय यह जन तेरे साथ पृथिवी पर उतरने के लिए तैयार है। अनन्यशरण तू आज से ही मन, वचन और कर्म से भगवान् शंकर को मान, जो समस्त विद्याओं के विधाता एवं कल्याण को देने वाले, देवों के देव और त्रिभुवन के गुरु हैं। जिन्होंने अपने चरण की धूल से सुर, असुर दोनों को पवित्र किया है और चन्द्र की एक कला को अपना कर्णावतंस बनाया है। बहुत थोड़े समय में वे तेरे शापजन्य शोक को कम कर देंगे।' एवमुक्ता मुक्तमुक्ताफलधवललोचनजललवा सरस्वती प्रत्यवादीत्— 'प्रियसखि, त्वया सह विचरन्त्या न मे कांचिदपि पीडामुत्पादयिष्यति ब्रह्मलोकविरहः शापशोको वा। केवलं कमलासनसेवासुखमार्द्रयति मे