भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 73

२८ हर्षचरितम् हृदयम्। अपि च त्वमेव वेत्सि मे भुवि धर्मधामानि समाधिसाधनानि योगयोग्यानि च स्थानानि स्थातुम्' इत्येवमभिधाय विरराम। रणरण- कोपनीतप्रजागरा चानिमीलितलोचनैव तां निशामनयत् । आर्द्रयति स्नेहयति। धर्मधामानि मध्यदेशादीनि। समाधिश्चित्तैकाग्रथम्। योगे हि तदुक्तम्—'आदौ समाधिमासीत पश्चाद्योगमुपाचरेत्' इति। रणरणको दुःखमरतिकृतम् । इस प्रकार सावित्री के कहने पर मोतों की भाँति सफेद आँसू के कण आँखों से टपकाती हुई सरस्वती बोली—'प्रिय सखी, ब्रह्मलोक का विरह या शापजनित शोक कोई भी पीड़ा उत्पन्न नहीं कर सकेंगे, जब तक तेरे साथ मैं विचरण कर रही हूँ। केवल ब्रह्माजी की सेवा का सुख मेरे हृदय को पिघला रहा है। पृथिवी पर मेरे लिए धर्म के स्थान जो समाधि (चित्त की एकाग्रता) के साधन एवं योग (चित्तवृत्ति का निरोध) के उपयुक्त हैं उन्हें तू ही जानती है।' इतना कह वह चुप हो गई। मानसिक उथल-पुथल (रणरणक) के कारण उसकी नींद उचट गई और उसने आँखें बिना बंद किए उस रात को बिताया। अन्येद्युरुदिते भगवति त्रिभुवनशेखरे खणखणायमानस्खलत्खली- नक्षतनिजतुरगमुखक्षिप्रेन क्षतजेनेव पाटलितवपुष्युदयाचलचूडामणौ जरत्कृकवाकुचूडारुणारुणपुरःसरं विरोचने नातिदूरवर्ती विविच्य पिताम- हविमानहंसकुलपालः पर्यटन्नपरवक्त्रमुच्चैरगायत्— 'तरलयसि दृशं किमुत्सुकामकलुषमानसवासलालिते। अवतर कलहंसि वापिकां पुनरपि यास्यसि पङ्कजालयम्' ।। तच्छ्रुत्वा सरस्वती पुनरचिन्तयत्—'अहमिवानेन पर्यन्द्युक्ता। भवतु। मानयामि मुनेर्वचनम्' इत्युक्त्वोत्थाय कृतमहीतलावतरणसंकल्पा परि- त्यज्य वियोगविह्वलं स्वपरिजंनं ज्ञातिवर्गमविगणय्यावगणा त्रिः प्रदक्षिणी- कृत्य चतुर्मुखं कथमप्यनुनयनिवर्तितानुयायिव्रतित्राता ब्रह्मलोकतः सावि- त्रीद्वितीया निर्जगाम । अन्येद्युरन्यस्मिन्नहनि। एते च कालाः संख्यादयो व्यवहारा इहंत्या ब्रह्मलोक उपचरिताः। शेखर इव। शेखरो मुण्डमालकः। खलीनं कविका। क्षतजं रक्तम् । कृकवाकुः कुक्कुटः। चूडा मांसमयी शेखरिका। विविच्य विचार्य। विमानपालः स्वप्रस्तावे हंसीं यदाह तेन सरस्वती पर्यन्द्योजितेवाभूत् । अपरवक्त्राख्यं वृत्तमाख्यायिकासु प्रयोक्तव्यम्। तथा चाह भामहः—'वक्त्रं चापर-