हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 74, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उच्छ्वासः २६ वक्रं च काव्ये काव्यार्थशंसिनि' इति । तरलयसीत्यादि । अकलुषं मानसं यस्य स निर्मलचेता ब्रह्मा, मानसाख्यं च सरः । लालिता स्वीकृता । वापिका पुष्करिणी, उप्यन्तेऽस्यां तानि कर्माणीति वापिका, मर्त्यभूमिरपि । पङ्कजमा- लयो यस्य स ब्रह्मा, सरश्च । पर्यंनुयुक्ता उपपस्या बोधिता । अवगणा केवला सावित्रीव्यतिरेकेण नान्यपरिवारा । कथमपीति । न मृत्त्यादिवत् । व्रतिव्रातस्त- पस्विसमूहः । दूसरे दिन तीनों भुवन के शिरोमाल एवं उदयाचल के चूड़ामणि भगवान् सूर्य उदित हुए । उनका मण्डल टहाका लाल था, मानों खण-खण करते हुए लगाम की क्षति से उत्पन्न अपने घोड़ों के मुखरुधिर के फव्वारे उन पर पड़ गए हों। वृद्ध कुक्कुट की चूड़ा के समान लाल वर्ण वाला अरुण उनके आगे बैठा था। इसी समय कुछ ही दूर पर घूमते हुये ब्रह्मा जी के वाहन हंसों के रक्षक ने सोच कर ऊँचे स्वर से अपवक्त्र का गान किया— 'अरी कलहंसी, मानसरोवर के निर्मल जल में रहने वाली तू अपनी उत्सुक आँखों को क्यों चंचल कर रही है ? अभी बावली में उतर जा, फिर पंकहालय (सरोवर) में जाना' ।१ उसे सुन कर सरस्वती ने फिर सोचा—'मानों मुझसे इसने पूछा है। अच्छा, मैं मुनि दुर्वासा के वचन मानती हूँ।' यह कह कर पृथिवी पर उतरने के लिए संकल्प करती हुई उठी और वियोग से व्याकुल परिवार को छोड़, अपने बन्धु-बांधवों को न मान, ब्रह्मा जी की तीन बार प्रदक्षिणा करके, साथ आते हुए तपस्वियों को किसी प्रकार अनुनय-विनय द्वारा लौटा कर, अकेले सावित्री को साथ ले ब्रह्मलोक से निकल पड़ी। ततः क्रमेण ध्रुवप्रवृत्तां धर्मधेनुमिवाधोधावमानधवलपयोधराम्, उद्धरध्वनिम्, अन्धकमथनमौलिमालतीमालिकाम्, आलीयमानवालखि- ल्यरुद्धरोधसमरुन्धतीधौततारवत्वचम्, तुङ्गतुङ्गतराङ्गतस्तरत्तरलतरतार- तारकाम्, तापसवितीर्णतरलतिलोदकपुलकितपुलिनाम्, आप्लवनपूतपि- तामहपातितपितृपिण्डपाण्डुरितपाराम्, पर्यन्तसुप्तसप्तर्षिकुशशयनसूचि- तसूर्यग्रहसूतकोपवासाम्, आचमनशुचिशचीपतिमुच्यमानार्चनकुसुम- निकरशाराम्, शिवपुरपतितनिर्माल्यमन्दारदामकामनोदरदारितमन्दरद- रीहृषदम्, अनेकनाकनायकनिकायकामिनीकुचकलशविलुलितविमृहाम्, १. इस श्लोक में हंसपाल सरस्वती को भी सिखावन दे रहा है कि सरस्वती, तू निर्मलचित्त ब्रह्मा जी की लाड़ली है, क्यों अपनी उत्सुक आँखें थका रही है ? अभी वापिका ( मर्त्यलोक ) में उतर, फिर ब्रह्मा जी ( पंकहालय ) को प्राप्त कर लेना ।