हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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निष्पन्दिना तिलकबन्दुना मुद्रितमिव मनोभवसर्वस्वं वदनमुद्वहन्ती, ललाटलासकस्य सीमन्तचुम्बिनश्चटुलातिलकमणेरुद्वमता चटुलेनांशु- जालेनेव रक्तांशुकेनेव कृतशिरावगुण्ठना, पृष्ठप्रेङ्खदनादरसंयमन- शिथिलजूटिकाबन्धा नीलचामरावकूलिनीव, चूडामणिमकरिका- सनाथा मकरकेतुपताकेव कुलदेवतेव चन्द्रमसः, पुनःसञ्जीवनौषधिरिव पुष्पधनुषः, वेलेव रागसागरस्य, ज्योत्स्नेव यौवनचन्द्रोदयस्य, महा- नदीव रतिसामृतस्य, कुसुमोद्गतिरिव सुरततरोः, बालविद्येव वैदग्ध्यस्य, कौमुदीव कान्तेः, धृतिरिव धैर्यस्य, गुरुशालेव गौरवस्य, बीजभूमिरिव विनयस्य, गोष्ठीव गुणानाम्, मनस्वितेव महानुभाव-
कस्तूरिका । तिलकबन्दुः परिवर्तुलस्तिलकः । लासको नर्तकः । 'सुवर्णशृङ्खला- बद्धो नानारत्नोघमण्डितः । ललाटलम्ब्यलङ्कारश्चटुलातिलको मतः ॥' अवचूलं चिह्नम् । मकारिका मकाराकारं रूपम् । वेला यथा सागरं क्षोभयति तद्वदेवेयं रागम् । क्षोभेन यथा सागरो दुरुत्तर एवमेतयापि रागः । यथा ज्योत्स्नया विना चन्द्रोदयो भवन्नपि क्वापि विलसन्विभाव्यते तथैतया विना यौवनं सविलासमप्यन्यत्र न दृश्यते । रतिप्रधानो रसः शृङ्गार एव । माधुर्यातिशययोगित्वात्प्रकृष्टत्वाच्च । ह्लादनममृतम् । यदुक्तम्-'शृङ्गार एव परमः परः प्रह्लादनो रसः' इति । संप्रयोगो रतं रहःशयनं मोहनमिति पर्यायाः । बालविद्या न कश्चन मुञ्चति, तद्वदेव वैद- ग्ध्यम् । कौमुदीति । तथाविधकान्त्यतिशयसम्भवात् । ध्रियते तेन धृतिः । अस्यां सत्यां धैर्यमपि यद्वा-धृतिः प्रवेशरक्षणम् । यथा प्रविशन्कश्चिद्राजनिकटं ध्रियते केनचित्तथा धैर्यं तावत्प्रसरति । यावदेषा न दृष्टा एतस्यां दृष्टायां सर्वे धैर्यशून्या
कस्तूरी की गन्ध फैलाने वाला तिलक बिन्दु कामदेव के सर्वस्व उसके मुख पर मुँहर की भांति लगा था । चटुला-तिलक नाम की मणि सीमन्त से ललाट पर झूल रही थी, उससे निकलते हुए चंचल किरण-जाल से ऐसा लगता था मानों उसे लाल वस्त्र का सिर का अवगुण्ठन बना लिया हो । उसके बालों का जूड़ा पीठ पर ठीक से न बाँधने के कारण ढीला होकर लटक रहा था मानों नील चामर लटक रहा हो । चूडामणि मकरिका पहनने मानों मकरकेतु (कामदेव) की पताका हो । चन्द्रमा की कुलदेवता हो, काम को फिर से जीवित कर देने वाली संजीवन बूटी हो, प्रेम की समुद्र की तटी हो, यौवनरूपी चन्द्रोदय की चाँदनी हो, रति रस के अमृत की महानदी हो, सुरत वृक्ष की पुष्पोद्गति हो, वैदग्ध्य की बाल विद्या हो, कान्ति की कौमुदी हो, धैर्य की धृति हो, गौरव की गुरुशाला हो, विनय की बीजभूमि हो, गुणों की गोष्ठी हो, महानुभावता की मनस्विता हो, और जवानी की