हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उच्छ्वासः ५७ रत्नप्रालम्बमालिकामरुणहरितकिरणकिसलयिनीं कस्यापि पुण्यवतो हृदयप्रवेशनवनमालिकामिव बद्धां धारयन्ती, प्रकोष्ठनिविष्टस्यैकस्य हाटककटकस्य मरकतमकरवेदिकासनाथस्य हरितीकृतदिगन्ताभिर्मं- यूखसंततिभिः स्थलकमलिनीभिरिव लक्ष्मीशङ्कयानुगम्यमाना, अति- बहलताम्बूलकृष्णिकान्धकारितेनाधरसंपुटेन मुखशशिपीतं ससंध्यारागं तिमिरमिव वमन्ती, विकचनयनकुवलयकुतूहलालीनयालिकुलसंहत्या नीलांशुकजालिकयेव निरुद्धाध्र्ववदना, नीलीरागनिहितनीलिम्ना शिखि- द्योतमाना, बकुलफलानुकारिणीभिस्तिसृभिर्मुक्ताभिः कल्पितेन बालिका- युगलेनाधोमुखेनालोकजलवर्षिणा सिञ्चन्तीवातिकोमले भुजलते, दक्षिणकर्णवतंसितया केतकीगर्भपलाशलेखया रजनिकरजिह्वालतयेव लावण्यलोभेन लिह्यमानकपोलतला, तमालश्यामलेन मृगमदामोद- जिता स्रक् । सापि पूर्णकलशयोरुपरि बध्यते । प्रकोष्ठः प्रकुञ्चनकः । वेदिका रत्न- प्रतिष्ठापीठिका । बहलं पौनःपुन्येन कृतम् । कृष्णिका कृष्णलेखा । मुखमेव तमःपारप्रतिपिपादयिषया शशी । ताम्बूलकारणत्वेन लोहित्यमेव सम्भवतीति ससन्ध्यारागमित्युक्तम् । नील्योषधिभेदः । शितिनीलः । पल्लवः पिण्डः । बालिका कर्णोपवेष्टेऽलंकारः । अधोमुखेन घटादिना जलवर्षिणा लता सिच्यते । मृगमदः करने के स्वागत में मङ्गलार्थ घट में वनमाला बँधी हो। उसके एक हाथ की कलाई में सोने का कड़ा था जिसके ग्राहमुखी सिरों पर पन्ने जड़े हुए थे, उनकी हरित किरणें दिशाओं में फैल रही थीं, मानों स्थल-कमलिनियाँ उसे लक्ष्मी समझ कर पीछे लग गई थीं। उसके अधर पर पान चबाने से काली रेखा पड़ गई थी, मानों उसका मुखचन्द्र पिये हुए संध्याराग के सहित अन्धकार को उगल रहा हो। भौंरे उसके नेत्रों को खिले हुए कुवलय समझ कर छा रहे थे मानों उसका मुख नीले अंशुक की नकाब से आधा ढँका हुआ था। उसके बायें कान का दन्तपत्र नीली राग द्वारा रंग कर नीला कर दिया गया था, उसका वर्ण मयूर की गर्दन की तरह था, मानों विस्तृत नीले मेघ में बिजली के समान वह शोभ रही थी। मौलसिरी के फल जैसे लम्बोतरे तीन मोती वालो, उसके कानों में एक एक बाली थी, जो नीचे लटक कर अपने आलोक के जल से भुज-रूपी लता को सींच रही थीं। उसके दाहिने कान पर केतकी का नुकीला टाँसा लगा हुआ था, मानों उसके लावण्य का लोभी चन्द्र अपनी जीभ से उसके कपोल को चाट रहा था। तमाल की भाँति श्यामल,