हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
पृष्ठ 98, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ेंमाननूपुरपट्टरणितस्यातिबहलेन पिण्डालक्तकेन पल्लवितस्य कुङ्कुमपि- ञ्जरितपृष्ठस्य चरणयुगलस्य प्रसरद्भिरतिलोहितैः प्रभाप्रवाहैरुभयतस्ता- डनदोहदलोभागतानि किसलयितानि रक्ताशोकवनानीवाकर्षयन्ती, सकलजीवनलोकहृदयहठहरणाघोषणयेव रशनया शिञ्जानजघनस्थला, धौतधवलनेत्रनिर्मितेन निर्मोकलघुतरेणाप्रपदीनेन कञ्चुकेन तिरोहित- तनुलता, छातकञ्चुकान्तरदृश्यमानैराश्यानचन्दनधवलैरवयवैः स्वच्छ- सलिलाभ्यन्तरविभाव्यमानमृणालकाण्डेव सरसी, कुसुम्भरागपाटलं पुलकबन्धचित्रं चण्डातकमन्तःस्फुटं स्फटिकभूमिरिव रत्ननिधानमाद- धाना, हारेणामलकीफलनिस्तुलमुक्ताफलेन स्फुरितस्थूलग्रहगणशार- शारदीव श्वेतविरलजलधरपटलावृता द्यौः, कुचपूर्णकलशयोरुपरि
षंयोरावन्धेत्याद्युक्तम् । प्रियमधुरशब्दत्वादश्वानामाकर्ण्यमानेत्युक्तम् । पिण्डालक्तकः क्वथितोऽलक्तरसः । दोहदोऽभिलाषः । वाद्यविशेषानुगताङ्गघोषणा । रशना मेखला । शिञ्जानं शब्दायमानम् । निर्मोकः सर्पत्वक् । आप्रपदं प्राप्नोत्याप्रपदीनः पादं यावत् । छातस्तनुः । कुसुम्भं पद्मकम् । नानावर्णविन्दुव्यासः पुलकबन्धः मणिविशेषाश्च पुलकाः । चण्डातकमधोरुकम् । कुचावेव कस्यापि पुण्यवत इवेति वक्ष्यमाणामिप्रायेण पूर्णकलशौ कस्यापीत्यलौकिकस्य । वनमाला पत्त्रपुष्पयो-
करके गर्दन टेढ़ी किए सुनता। आलते से उसके पैर रञ्जित थे। तलवे में कुंकुम लगा हुआ था। उसके पैरों की टहाका लाल कान्ति दोनों ओर फैल रही थी, मानों वह ताड़न प्राप्त करने की अभिलाषा के लोभ से आये हुए से रक्ताशोक के हरे-भरे वनों की खींचकर ला रही थी। उसके कटि प्रदेश में करधनी बज रही थी, मानों वह जीवलोक के सब लोगों के मन को हठपूर्वक हरने के लिए घोषणा कर रही हो। उसका सारा शरीर धुले सफेद रेशम के पैरों तक लटकते हुए झीने, साँप की केंचुली की तरह हल्के और बारीक कंचुक से ढँका हुआ था। सूखे चन्दन के समान उज्ज्वल अंगों से, जो झोने कंचुक के भीतर से दिखाई दे रहे थे, वह उस सरसी के सदृश थी जिसके निर्मल जल के भीतर मृणाल-काण्ड दिखाई दे रहे हों। कुसुंभी रंग का लाल लहँगा झलक रहा था जिस पर रंग-बिरंगी बुंदकियाँ पड़ी हुई थीं, मानों स्फटिक की जड़ाव में मोतियाँ जड़ी हों। आँवले जैसे बड़े बड़े मोतियों का हार गले में लटक रहा था, वह तारों भरे शरत्काल के आकाश जैसी लग रही थी जिसमें कहीं-कहीं सफेद मेघ के टुकड़े घिरे रहते हैं। उसके स्तनरूपी कलश पर रत्नों की प्रालम्ब माला लटक रही थी, मानों किसी पुण्यवान् के हृदय में प्रवेश