हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलतासु मानसमस्मासु मुहूर्तमासक्तमासीत् । अशून्यं हि सौजन्यमभि- जात्येन वः स्वामिसूनोः । अलसः खलु लोको यदेवं सुलभसौहृदानि येन केनचिन्न क्रीणाति महतां मनांसि । सोऽयमौदार्यातिशयः कोऽपि महात्मनामितरजनदुर्लभो येनोपकरणीकुर्वन्ति त्रिभुवनम्' इति । विकु- क्षिस्तूच्चावचैरालापैः सुचिरमिव स्थित्वा यथाभिलषितं देशमयासीत् । अपरेद्युरुद्यति भगवति द्युमणावुद्यन्मद्युतावभिद्रुततारके तिरस्कृत- तमसि तामरसण्यासव्यसनिनि सहस्ररश्मौ शोणमुत्तीर्यायान्ती, तरल- देहप्रभाविततनच्छलेनात्यच्छं सकलं शोणसलिलमित्रानयन्तीं, स्फुटि- तातिमुक्तककुसुमस्तबकसमत्विषि सटाले महति मृगपताविव गौरी तुरंगमे स्थित, सलीलमुगेबन्धरोपितस्य तिर्यगुत्कर्णतुरगाकर्ण्य, यहच्छया यथाकथञ्चित् । यश्च तथा गच्छति यस्य निरवधानतया क्वचिदंशुकामि गलति । अभिजात्येन महाकुलीनत्वेनोपकरणीकुर्वन्त्यात्मतां नयन्ति । उच्चावचैः प्रकृतवस्त्वसंस्पर्शभिः, विचित्रैरिति वा । अपरेद्युरित्यादौव्वीदृशी मालती समदृश्यतेति संबन्धः। दिवि मणिरिव द्युमणिः । वियद्भूषणं सूर्यः । अभिद्रुता न्यक्कृता । तामरसं पद्मम् । व्यासो विकासः । अतिः- मुक्तकं पुष्पभेदः । केचिन्मालतीलताकुसुममाहुः । सटास्ति यस्येति । 'प्राणिस्था- दातो लज्न्यतरस्याम्' । गौरी गोराङ्गी, पार्वती च । सजलतुरङ्गाङ्गस्पर्शपरिजही- स्वामिपुत्र दधीच में कुलीनता के साथ सौजन्य भी है । दुनिया वाले बड़े आलसी होते हैं जो सुलभ सौहार्द वाले महापुरुषों के मन को जिस किसी वस्तु से खरीदते नहीं। महापुरुषों में ही इस तरह बढ़कर उदारता होती है जो इतर लोगों में नहीं होती और जिससे वे लोग त्रिभुवन को अपने वश में कर लेते हैं । विकुक्षि भी लम्बी बातचीत करके अपने अभिलषित देश की ओर चला गया । अगले दिन आकाश के रत्न, प्रखर किरणों वाले, तारों को भगा देने और अंधकार को हटा देने वाले, कमलों को विकसित करने के शौकीन भगवान् सूर्य के उदित होते ही सोन पार करके आती हुई मालती दूर ही से दिखाई पड़ी । अपने शरीर की तरल प्रभा से सोन के जल को वह और भी निर्मल कर रही थी। माधवी के फूल के गुच्छे के सदृश कान्ति वाले, अयाल-युक्त बड़े घोड़े पर वह सिंह पर गौरी की भाँति सवार थी । लीला से उसने अपने चरण रकाब पर रखे थे; जब पैर के नूपुर बजते तो उसका घोड़ा कान खड़े