हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ | हर्षचरितम्
तथैव निवारितपरिजनश्छत्रधारिद्वितीयो विकुक्षिर्दुढौके । सरस्वती तु तं दूरादेव संमुखमागच्छन्तं प्रीत्या ससंभ्रममुत्थाय वनमृगीवोद- ग्रीवा विलोकयन्ती मार्गपरिश्रान्तमस्नपयदिव धवलितदशदिशा दृशा । कृतासनपरिग्रहं तु तं प्रीत्या सावित्री पप्रच्छ—'आर्य, कच्चित् कुशली कुमारः ?' इति । सोऽब्रवीत्—'आयुष्मति, कुशली । स्मरति च भवत्योः । केवलममीषु दिवसेषु तनीयसीमिव तनुं बिभर्ति । अविज्ञात- माननिमित्तां च शून्यतामिवाधत्ते । अपि च । अन्वक्षमागमिष्यत्येव मालतीति नाम्ना बाणिनी वार्तां वो विज्ञातुम् । उच्छ्वसितं हि सा कुमारस्य' इति । तच्छ्रुत्वा पुनरपि । सावित्री समभाषत—'अतिमहा- नुभावः खलु कुमारो येनैवमविज्ञायमाने क्षणदृष्टेऽपि जने परिचिति- मनुबध्नाति । तस्य हि गच्छतो यदृच्छया कथमप्यंशुकमिव मार्ग-
गमनमिति दर्शयति । प्रधानप्रकृतेः स्थवीयसस्तथाविधव्यापारविनियोगाद्यनोकि- त्यात् । अत एव वक्ष्यति—'यथामिलषितं देशमयासीत्' । दुढौके इत्यनेन निमित्त- परतन्त्रतया संनिकृष्टमेवैनमालुलोकेति प्रदर्शितम् । यदुक्तम्—'पटुता धाष्टर्यता इङ्गि- ताकारज्ञानं प्रतारणे देशकालज्ञता कार्येषु विष्ह्यबुद्धित्वं लघ्वी प्रतिपत्तिः सापाया च इति दूतीगुणः' । भरतमुनिरपि—'विज्ञानगुणसंपन्ना कथिनी लिङ्गिनी तथा । रङ्गोपजीविनी चापि प्रतिपत्तिविचक्षणा ॥ प्रोत्साहनेककुशलेत्यादिदूतीगुणैर्युक्ता ॥ इति । अत एवागृह्णाच्चाकारतः प्रभृतीत्यादि वक्ष्यते' अन्वक्षं प्रत्यक्षम् । बाणिनी दूती । उच्छ्वासितमित्येनेनातिविस्रम्भवत्ता ख्याता । उच्छ्वसितं प्राण इति वा ।
को बाहर रोक छत्रवाहक को साथ ले पहुँचा । सरस्वती ने दूर ही से सामने आते हुए उन्हें देखा और प्रेम से फड़क उठी, वह हिरनी की तरह गर्दन ऊँची उठाकर देखने लगी मानों मार्ग में थके हुए विकुक्षि को दिशाओं को धवलित करने वाली दृष्टि से स्नान कराने लगी । जब वह आकर आसन पर बैठ गया तब सावित्री ने प्रीतिपूर्वक पूछा— 'आर्य, क्या कुमार दधीच कुशल से हैं?' उसने कहा—'आयुष्मती, कुमार सकुशल हैं, आप दोनों का स्मरण करते हैं । इन दिनों उनका शरीर क्षीण होता जा रहा है । पता नहीं क्यों, शून्य-शून्य से लगते हैं । और भी, मालती नाम की दूती समाचार लेकर सामने आने वाली है । कुमार का उसे प्राण ही समझना । यह सुनकर फिर सावित्री बोली—'कुमार सचमुच बड़े ही महानुभाव हैं, जो अज्ञातजन में भी क्षण भर की देख- देखी में ही अपना परिचय-सम्बन्ध जोड़ रहे हैं । वे जाने लगे तो उनका मन हम लोगों में क्षण भर इस तरह लग गया जैसे मार्ग की लताओं में अंशुक फँस जाता है । आप के