भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 184 में से

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पृष्ठ 95

मदनशराहतायाश्च तस्या वार्तामिवोपलब्धुमरतिराजगाम । तथा हि—ततः प्रभृति कुसुमधूलिधवलाभिर्वनलताभिस्ताडितापि वेदना- मधत्त । मन्दमन्दमारुतविधुतः कुसुमरजोभिरदूषितलोचनाप्यश्रुजलं मुमोच । हंसपक्षतालवृन्तवातव्रातविततैः शोणशीकरैरसिक्ताप्यार्द्र- तामगात् । प्रेङ्खत्कादम्बमिथुनाभिरनूढाप्यघूर्णत वनकमलिनीकल्लोल- दोलाभिः । विघटमानचक्रवाकयुगलविसृष्टैरस्पृष्टापि श्यामतामाससाद विरह- निःश्वासधूमैः । पुष्पधूलिधूसरैरदष्टापि व्यचेष्टत मधु करकुलैः । अथ गणरात्रापगमे निवर्त्तमानस्तेनैव वर्त्मना तं देशं समागत्य

खेदेन हृद्दाहाभिनयेन च । कुर्यात्तदेवमत्यन्तमुद्योगाभिनयेन च ॥' इति । दश किल कामावस्थाः । तदुक्तम्—'प्रथमे त्वभिलाषः स्याद् द्वितीये चिन्तनं भवेत् । अनु- स्मृतिस्तृतीये तु चतुर्थे गुणकीर्तनम् ॥ उद्वेगः पञ्चमे प्रोक्तः प्रलापः षष्ठ उच्यते । उन्मादः सप्तमे चैव भवेद्व्याधिस्तथाष्टमे ॥ नवमे जडता प्रोक्ता दशमे मरणं भवेत् ॥ इति । अरतिर्दुःखासिका हि कामवधूप्रतिपक्षभूतेति तदागमनाभिधानम् । हंस- पक्षा इव तालवृन्तं व्यजनम् । आर्द्रतां सस्नेहताम्, क्लिन्नतां च । प्रेङ्खद्दोल्याय- मानम् । कादम्बाः कृष्णहंसाः । श्यामता शृङ्गाररसाविष्कारिवैवर्ण्यम् । यदुक्तम्— शृङ्गारदेवो भगवान्मुरासिः संगीयते श्यामवपुर्मुरारिः । श्यामो मनाक्स्निग्धतरश्च तेन शृङ्गारशंसी मुखराग उक्तः ॥' अथ श्यामता सधूमता । श्वामत्वेऽपि सधूमता इति विरोधाभासः । गणरात्रं निशाबह्वयः । तेनैव वर्त्मनेति । अनेन तस्य यदृच्छया तदाश्रयमा-

कामदेव ने उसे बड़ी निर्दयता से कान तक खींच कर बाण मारा। जब काम के बाण से घायल सरस्वती की नींद खुली तब उसकी खबर लेने के लिए मानों अरति (वैराग्य) आई। तब वह पुष्पराग से उज्ज्वल वनलताओं द्वारा ताड़ित न होकर भी वेदना अनुभव करने लगी । मंद मंद हवा से काँपते हुए फूलों की रज उसकी आँखों में न भी पड़ती तो भी वह आँसू बहाती । हंस पक्षियों के पंखों की हवा से फैलते हुए सोन (नदी) के फुहारों द्वारा सिक्त न होने पर भी (पसीने से) तर होने लगी। काले हंसों की जोड़ियों से युक्त वन की कमलिनी भी दोलाओं पर न बैठी हुई भी चकराने लगी। विघटित होते हुए जोड़े चक्रवाकों के विरहजन्य निःश्वास-धूम से स्पृष्ट न होने पर भी श्यामता को प्राप्त करने लगी। फूल की धूल में लोट-पोट करने से धूसर भौरों से न काटे जाने पर भी वह उद्विग्न होने लगी । इस तरह कई रातें गुजर गईं। एक दिन उसी मार्ग से लौटता हुआ विकुक्षि परिजनों

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