भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 184 में से

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तायाः, तृप्तिरिव तारुण्यस्य, कुवलयदलापदीर्घलोचनया पाटला- धरया कुन्दकुङ्मलस्फुटदशनया शिरीषमालासुकुमारभुजयुगलया कमलकोमलकरया बकुलसुरभिनिःश्वसितया चम्पकावदातदेहया कुसुममय्येव ताम्बूलकरण्डवाहिन्या महाप्रमाणाश्वतरावूढयानुगम्य- माना, कतिपयपरिचारकपरिकरा मालती समदृश्यत । दूरादेव च दधीचप्रेम्णा सरस्वत्या लुष्ठितेव मनोरथैः, आकृष्टेव कुतूहलेन, प्रत्युद्गतेवोत्कलिकाभिः, आलिङ्गितेवोत्कण्ठया, अन्तःप्रवेशितेव हृद- येन, स्नपितेवानन्दाश्रुभिः, विलिप्तेव स्मितेन, वीजितेवोच्छ्वसितैः, आच्छादितेव चक्षुषा, अभ्यर्थितेव वदनपुण्डरीकेण, सखीकृतेवाशया इति । 'समानविद्यावित्तशील बुद्धिवयसामनुरूपैरालापैरेकत्रासनबन्धो गोष्ठीमन- स्विना' इत्यनेनैतस्या महानुभावताया व्यभिचारित्वमुच्यते । यस्माच्चत्र मनस्विता तत्र महाशयत्वमेवावश्यं सम्भावयतीति स्थितमेव । तृप्तिरिवेति । यथा कश्चित्संजात- तृप्तिर्नान्यत्किचित्पुनरपेक्षते तद्वदासादितमालतीकं तारुण्यम् । एतदाश्रयणेन परि- पूर्णवैषयिकोपभोगत्राप्तिस्तारुण्यस्येत्यर्थः । कुसुममय्येवेति । कुवलयादिभिर्नयनादीनां विधानम् । तरुणोऽश्वोऽश्वतराः । 'वत्सोक्षाश्ववर्षभेभ्यश्च तनुत्वम्' इति तनुत्वे तरप् । तत्र च व्याख्यातम् - 'तनुत्वं द्वितीयवयः प्राप्तिः' इति । अश्वतरो वा गर्दभेनाश्वायां जातः । मालतीति । एवं दधीचपरिवारभूतया मालत्या गुणवर्णनद्वारेण सरस्वत्या एव निःसामान्यगुणातिशययो ध्वन्यते । लुष्ठितेवेति । वक्ष्यमाणं प्रार्थनादि । तया मनोरथैरुत्प्रेक्ष्य स्वीकृतमित्यतस्तैर्लुष्ठितेवेत्युक्तम् । लुण्ठनं च पाथेयाभि- वितरणमेवमन्यत् । उत्कलिका रहुरुहिका । सविधं समीपम् । अपि च तृप्ति हो । उसके पीछे एक बड़े अश्व पर बैठी हुई ताम्बूलकरंकवाहिना आ रही थी जिसके अंग-अंग मानों फूल से बने थे, क्योंकि कुवलय की माला-सा बड़ी-बड़ी आँखें, पाटल पुष्प-सा अधर, कुन्द की कलियों जैसे दांत, शिरीषमाला जैसी सुकुमार दोनों भुजाएँ, कमल जैसे हाथ, मौलसिरी की गन्ध जैसी सरस और चम्पा के समान दमकती देह थी । उसके साथ कुछ परिचारक थे। सरस्वता ने दधीच के प्रेम से मालती को दूर से ही मानों मनोरथ द्वारा लूट लिया, कुतूहल से खींच लिया, मन की तरंगों से अगवानी की, उत्कण्ठा से आलिङ्गन किया, हृदय के भीतर रख लिया, आनन्द के आंसू से नहला दिया, स्मित के चन्दन से चर्चित किया, उच्छ्वासितों द्वारा पंखे झलने लगी, आँखों से ढँक दिया, मुख के कमल से पूजा की और आशा से उसे अपनो सखी बना लिया। तब मालती आई