हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
DevanagariHindipublished184 पृष्ठ
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सविधमुपययौ । अवतीर्य १च दूरादेवानतेन मूर्ध्ना प्रणाममकरोत् । आलिङ्गिता च ताभ्यां सविनयमुपाविशत् । सप्रश्रयं ताभ्यां संभाशिता च पुण्यभाजनमात्मानममन्यत । अकथयच्च दधीचसंदिष्टं शिरसि निहितेनाञ्जलिना नमस्कारम् । अगृह्णाच्चाकरतः प्रभृत्यग्राम्यतया तैस्तैरतिपेशलैरालापैः सावित्रीसरस्वत्योर्मनांसि । क्रमेण चातीते मध्यंदिनसमये शोणमवतीर्णायां सावित्र्यां स्नातुमु- त्सारितपरिजना साकूतेव मालती कुसुमस्त्रस्तशायिनीं समुपसृत्य सरस्वतीमाबभाषे—'देवि, विज्ञाप्यं नः किञ्चिदस्ति रहसि । यतो मुहूर्तंमवधानदानेन प्रसादं क्रियमाणमिच्छामि' इति । सरस्वती तु दधीचसंदेशाशङ्किनी किं वक्ष्यतीति स्तननिहितवामकरनखरकिरण- दन्तुरितमुद्भिद्यमानकुतूहलाङ्कुरनिकरमिव हृदयमुत्तरीयकूलवल्कलेक- देशेन संछादयन्ती, गलतावतंसपल्लवेन श्रोतुं श्रवणेनेव कुतूहलाद्वाव-
यः स्निग्धो दूरात्सविधमायाति, तस्य लुण्ठनादिसर्वमर्चनावसानं क्रियत इति ध्वनिः । पेशलैर्हृद्यैः । आकूतर्माभिप्रायः । रहस्येकान्ते सरस्वत्यादौ । सरस्वती कुसुमशयनीयाहु-
और उतर कर दूर ही से झुके सिर प्रणाम किया और दोनों से आलिङ्गित हो विनयपूर्वक बैठी । दोनों ने उससे विनयपूर्वक सम्भाषण किया तो उसने अपने आप को धन्यवाद समझा । मालती ने दधीच के द्वारा सन्दिष्ट सिर पर अञ्जलि टेक कर नमस्कार निवेदन किया । सावित्री और सरस्वती के मन को उसने अपने अग्राम्य आकार और अतिमधुर बात-चीत से हर लिया । धीरे धीरे दोपहर बीत गई । तब सावित्री उधर शोण में स्नान करने उतरी । इधर अभिप्राय-युक्त-सी मालती परिजनों को वहां से अलग करके फूल के विस्तर पर लेटी हुई है, सरस्वती के पास आकर बोली—'देवि, एकान्त में कुछ मुझे आपको सूचित करना है, इसलिए चाहती हूँ कि क्षणभर आप ध्यान देने का प्रसाद करें। दधीच के सन्देश की आशंका से 'न मालूम क्या ब.हेगी' सरस्वती यह सोचने लगी । छाती पर रखे हुए उसके बायें हाथ के नख की किरणें ऐसी लग रही थीं मानों कुतूहल का अंकुर हृदय से निकल रहा हो । वह ऐसे हृदय को दुकूल बल्कल के अँवरे के खूंट से ढँक रही थी। कान में
१- तुरगाद् दूरादेवानतेन ।