हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
पृष्ठ 103, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ेंमानेनाविरतश्वाससंदोहदोलायितां जीविताशामिव समासन्नतरुणतरु- लतामवलम्बमाना, समुत्फुल्लस्य मुखशशिनो लावण्यप्रवाहेण शृङ्गार- रसेनेवाप्लावयन्ती सकलं जीवलोकम्, शयनकुसुमरिमललग्नेर्मधुकर- कदम्बकैर्मदनानलग्राहश्यामलैर्मनोरथैरिव निर्गत्य मूर्तैरुत्क्षिप्यमाणा, कुसुमशयनीयात्स्मरशरसंञ्चारिणी, मन्दं मन्दमुदगात् । 'उपांशु कथय' इति कपोलतलप्रतिबिम्बितां लज्जया कर्णमूलमिव मालतीं प्रवेशयन्ती मधुरया गिरा सुधीरमुवाच—'सखि मालति, किमर्थमेवमभिदधासि ? काहमवधानदानस्य शरीरस्य प्राणानां वा ? सर्वस्याप्रार्थितोऽपि प्रभवत्येवातिवेलं चक्षुष्यो जनः । सा न काचिद्या न भवसि मे स्वसा सखी प्रणयिनी प्राणसमा च । नियुज्यतां यावतः कार्यस्य क्षमं क्षोदो- यसी गरीयसी वा शरीरकमिदम् । अनवस्करमाश्रवं त्वयि हृदयम् । प्रीत्या प्रतिसरा विधेयास्मि ते । व्यावृणु वरवर्णिनि, विवक्षितम्' दगादुदतिष्ठदिति सम्बन्धः । अवतंसपल्लवेन गलतेतीत्थंभूतलक्षणे तृतीया । संदोहः समूहः । संज्वरः संतापः । उपांश्वनुक्तम् । अतिवेलमतिमात्रम् । 'अतिपेशलः' इति पाठे पेशलः । सुन्दरः । चक्षुष्योऽनुकूलः । त्वमिव व्यक्तम् । चक्षुष्य इति भङ्ग्या दधीच इति ध्वनति । स्वसा भगिनी । प्रणयिनी विश्वस्ता । अतिशयेन क्षुद्रमल्पं क्षोदीयः । 'ज्ञेयं गुह्यमवस्करम्' । आश्रवं वचसि स्थितम् । प्रतिसरानुकूला । विधेया- लगा हुआ पल्लव गिरने लगा, मानो उसका कान ही सुनने के कुतूहल से दौड़ पड़ा हो । निरन्तर साँस के झूले पर बैठी हुई जीविताशा को समीप के तरुण वृक्ष पर मानों अवलम्बित करने के लिए सहारा ले रही थी । खिलखिलाये हुए मुखचन्द्र के लावण्य की धारा से शृङ्गार रस के रूप में प्रवाहित करके मानों समस्त जीवलोक को भरने लगी । शय्या के फूल के रस पीने में लगे हुए, मदनाग्नि से जले उसके मूर्त मनोरथ के रूप में श्यामवर्ण वाले भौरों ने उसे झटका दिया और कामज्वर से पीड़ित वह अपने पुष्पशयन से धीरे-धीरे उठी । 'धीरे बोल' यह कहती हुई सरस्वती अपने कपोल पर प्रतिबिम्बित मालती को लज्जा ने मानों अपने कानों में पहुँचाती हुई मधुर आवाज से धीरतापूर्वक बोली—'सखी मालती कैसी बात कर रही है ? मैं क्या अवधान देकर सुनूं ? शरीर और प्राण पर मेरा वश नहीं । प्रार्थना के बिना ही प्रिय- जन का प्रभुत्व सब पर व्याप्त हो रहा है । तू तो मेरी सब कुछ है, बहन तू, सखी तू, प्रण- यिनी तू, और प्राणसमा भी तू । छोटे-बड़े किसी योग्य काम के लिए इस शरीर को नियुक्त कर । मेरा हृदय तेरे प्रति प्रकट और बात मानने वाला है । तू प्रेम से मुझे अनुकूल और अपने