हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
मानेनाविरतश्वाससंदोहदोलायितां जीविताशामिव समासन्नतरुणतरु- लतामवलम्बमाना, समुत्फुल्लस्य मुखशशिनो लावण्यप्रवाहेण शृङ्गार- रसेनेवाप्लावयन्ती सकलं जीवलोकम्, शयनकुसुमरिमललग्नेर्मधुकर- कदम्बकैर्मदनानलग्राहश्यामलैर्मनोरथैरिव निर्गत्य मूर्तैरुत्क्षिप्यमाणा, कुसुमशयनीयात्स्मरशरसंञ्चारिणी, मन्दं मन्दमुदगात् । 'उपांशु कथय' इति कपोलतलप्रतिबिम्बितां लज्जया कर्णमूलमिव मालतीं प्रवेशयन्ती मधुरया गिरा सुधीरमुवाच—'सखि मालति, किमर्थमेवमभिदधासि ? काहमवधानदानस्य शरीरस्य प्राणानां वा ? सर्वस्याप्रार्थितोऽपि प्रभवत्येवातिवेलं चक्षुष्यो जनः । सा न काचिद्या न भवसि मे स्वसा सखी प्रणयिनी प्राणसमा च । नियुज्यतां यावतः कार्यस्य क्षमं क्षोदो- यसी गरीयसी वा शरीरकमिदम् । अनवस्करमाश्रवं त्वयि हृदयम् । प्रीत्या प्रतिसरा विधेयास्मि ते । व्यावृणु वरवर्णिनि, विवक्षितम्' दगादुदतिष्ठदिति सम्बन्धः । अवतंसपल्लवेन गलतेतीत्थंभूतलक्षणे तृतीया । संदोहः समूहः । संज्वरः संतापः । उपांश्वनुक्तम् । अतिवेलमतिमात्रम् । 'अतिपेशलः' इति पाठे पेशलः । सुन्दरः । चक्षुष्योऽनुकूलः । त्वमिव व्यक्तम् । चक्षुष्य इति भङ्ग्या दधीच इति ध्वनति । स्वसा भगिनी । प्रणयिनी विश्वस्ता । अतिशयेन क्षुद्रमल्पं क्षोदीयः । 'ज्ञेयं गुह्यमवस्करम्' । आश्रवं वचसि स्थितम् । प्रतिसरानुकूला । विधेया- लगा हुआ पल्लव गिरने लगा, मानो उसका कान ही सुनने के कुतूहल से दौड़ पड़ा हो । निरन्तर साँस के झूले पर बैठी हुई जीविताशा को समीप के तरुण वृक्ष पर मानों अवलम्बित करने के लिए सहारा ले रही थी । खिलखिलाये हुए मुखचन्द्र के लावण्य की धारा से शृङ्गार रस के रूप में प्रवाहित करके मानों समस्त जीवलोक को भरने लगी । शय्या के फूल के रस पीने में लगे हुए, मदनाग्नि से जले उसके मूर्त मनोरथ के रूप में श्यामवर्ण वाले भौरों ने उसे झटका दिया और कामज्वर से पीड़ित वह अपने पुष्पशयन से धीरे-धीरे उठी । 'धीरे बोल' यह कहती हुई सरस्वती अपने कपोल पर प्रतिबिम्बित मालती को लज्जा ने मानों अपने कानों में पहुँचाती हुई मधुर आवाज से धीरतापूर्वक बोली—'सखी मालती कैसी बात कर रही है ? मैं क्या अवधान देकर सुनूं ? शरीर और प्राण पर मेरा वश नहीं । प्रार्थना के बिना ही प्रिय- जन का प्रभुत्व सब पर व्याप्त हो रहा है । तू तो मेरी सब कुछ है, बहन तू, सखी तू, प्रण- यिनी तू, और प्राणसमा भी तू । छोटे-बड़े किसी योग्य काम के लिए इस शरीर को नियुक्त कर । मेरा हृदय तेरे प्रति प्रकट और बात मानने वाला है । तू प्रेम से मुझे अनुकूल और अपने
६२ हर्षचरितम् इति । सा त्वावादीत्—'देवि, जानास्येव माधुर्यं विषयाणाम्, लोलुपतां चेन्द्रियग्रामस्य, उन्मादितां च नवयौवनस्य, पारिप्लवतां च मनसः। प्रख्यातेव मन्मथस्य दुर्निवारता । अतो न मामुपालम्भेनोपस्थातु- मर्हसि । न च बालिशता चपलता चारणता वा वाचालतायाः कारणम् । न किंचिन्न कारयत्यसाधारणा स्वामिभक्तिः । सा त्वं देवि, यदैव दृष्टासि देवेन तत एवारभ्यास्य कामो गुरुः, चन्द्रमा जीवितेशः, मलयमरुदुच्छ्वासहेतुः, आधयोऽन्तरङ्गस्थानेषु, संतापः, परमसुहृत्, प्रजागर आप्तः, मनोरथाः सर्वगताः, निःश्वासा विग्रहाग्रेसराः, मृत्युः पार्श्ववर्ती, रणरणकः संचारकः संकल्पा बुद्ध्युपदेशवृद्धाः । किंच वश्या । व्यावॄणु प्रकटय । वरवर्णिनि वरारोहे । लोलुपतां साभिलाषत्वम् । 'चलाथंको निगद्येते पारिप्लवपरिप्लवौ' । बालिशोऽज्ञः । चारणता धूर्तता । असा- धारणानन्यसदृशी । देवी देवेनेति च परस्परसमगुणयोगित्वमभिव्यनक्ति । गुरुर्ग- रीयान्, उपदेष्टा वा । तद्वशवर्तित्वात् । यच्च देवस्तस्य गुरुराचार्यः कश्चिदवश्यं सम्भवति । जीवितस्येश्वरः स्वामी जीवितेशः । शिशिरतया मदनदाहप्रशमनहेतु- त्वात् । अमृतमयत्वेन च जीवितसन्धारणशक्तत्वात् । अथ च जीवितेशो मृत्युः । चन्द्रादयो ह्यापातत एव तापं शमयन्ति, अनवरतं सेव्यमानाः पुनः कामोद्दीप- कत्वेन मृत्युं दिशन्ति । राजपक्षे जीवितेशः कश्चित्पुरोहितप्रायः । उच्छ्वसनमुच्छ्वा- सस्तत्र हेतुः । अथ च श्वासोत्क्रान्तो कारणम्, इतरत्र सचिवप्राया विश्वसनीयः । आधयश्चित्तपीडाः । अत एवान्तरङ्गमन्तःशरीरं यानि स्थानानि तेषु, इतरत्रान्त- रङ्गास्तन्वंशिकस्तत्स्थानेषु विश्वसनीयजनाधिकारेषु । परं प्रकृष्टम् । असुहरोऽमित्रो वा । अन्यत्र—परमसुहृन्मित्रं च । आप्तं प्राप्तो बान्धवप्रायः कश्चित् । सर्वगताश्चारा अपि संस्थाख्याः । विग्रहो विरोधः, देहश्च । मृत्युरिति । त्वदनङ्गीकारेण निश्चितं वश में कर ले । अरी वरारोहे मालती, कह, क्या कहना चाहती है ?' वह बोली—'देवी तू जानती ही है कि विषय मधुर लगते हैं, इन्द्रियाँ लोलुप होती हैं, नई जवानी मतवाली होती है और मन चञ्चल रहता है । काम को रोकना कठिन है यह बात प्रसिद्ध ही है । तो मुझे तू उपालम्भन न देना । मेरे इस वाचालता का कारण मूर्खता, चपलता या धूर्तता नहीं है । स्वामी की असाधारण भक्ति क्या नहीं कराती ? जब से तुम्हें उन्होंने देखा है तभी से कामदेव उनका आचार्य बन बैठा है, चन्द्रमा उनके प्राणों का अधिपति हो गया, मलयानल उनके उच्छ्वास का कारण बन गया, मन की व्यथाएँ अन्तरंग बन गईं, सन्ताप परममित्र बन गया, जागरण आत्मीय हो गया, मनोरथ अन्यवस्थित हो गए, निःश्वास विरह के आगे
[Header] प्रथम उच्छ्वासः ६३ विज्ञापयामि । अनुरूषो देव इत्यात्मसंभावना, शीलवानिति प्रक्रम- विरुद्धम्, धीर इत्यवस्थाविपरीतम्, सुभग इति त्वदायत्तम्, स्थिर- प्रीतिरिति निपुणोपक्षेपः, जानाति सेवितुमित्यस्वामिभावोचितम्, इच्छति दासभावमामरणत्कर्तुमिति धूर्तालापः, भवनस्वामिनी भवेत्युप- प्रलोभनम्, पुण्यभागिनी भजति भर्तारं तादृशमिति स्वामिपक्षपातः, त्वं तस्य मृत्युरित्यप्रियम्, अगुणज्ञासीत्यधिक्षेपः, स्वप्नेऽप्यस्य बहुशः कृतप्रसादासीत्यसाक्षिकम्, प्राणरक्षार्थमर्थयत इति कातरता, तत्र गम्यतामित्याज्ञा, वारितोऽपि बलादागच्छतीति परिभवः । तदेवमगोचरे गिरामसीति श्रुत्वा देवी प्रमाणम्' इत्यभिधाय तूष्णीमभूत् । अथ सरस्वती प्रीतिविस्फारितेन चक्षुषा प्रत्यवादीत्—'अयि, म्रियते । राज्ञोऽपि पार्श्वे मृत्युस्तिष्ठत्येव । रणरणको दुःखमरतिकृतम् । अत एव संचारक एकत्र नरे सम्भवदितरत्र संचारयति, चरितं वस्तु यः प्रापयते सः । द्विविधा हि चाराः— संस्थाः, संचारकाश्च । वृद्धा महान्तः स्थविराश्च । अनुरूप इत्यादिनेदमिदं तन्नास्तीति वक्रोक्त्या सातिशयं मालती वैदग्ध्येनाह । प्रक्रम आरम्भः । निपुणोपक्षेपो बुद्धिमत्प्रक्रमः । धूर्तालापः प्रतारणावचनम् । वारित इति । मवत्येवेत्यर्थात् । चलने लगे, मृत्यु पाश्वंचर हो गई, मानसिक दुःख ही संचारक बने, संकल्प ही बुद्धि के उपदेशक-वृन्द बने । और क्या कहूँ ? अगर कहती हूँ 'देव दधीच सुयोग्य हैं', अपने सम्मान की बात होती है; 'वे सुशील हैं' तो बात प्रसंग के विरुद्ध होती है; 'धीर हैं' यह बात मदनावस्था से विपरीत है, 'सुभग हैं' यह तो तुम कह सकती हो; 'उनकी प्रीति स्थिर है' यह चतुरता की बात होती है; 'सेवा करना वे जानते हैं' यह कहना स्वामी के लिए उचित नहीं; 'मरने तक तुम्हारी दासता चाहते हैं' प्रलोभन हुआ; 'धन्यभाग नारी हो ऐसे पति को प्राप्त करती है' यह स्वामी के द्रुति में पक्षपात करना है; 'तू उसकी मृत्यु है' यह बात अप्रिय होती है; 'तू गुणों को नहीं समझती' यह निन्दा की बात होती है; 'स्वप्न में भी तुमने इस पर बहुत बार प्रसन्नता की' इस बात में कोई साक्षी नहीं; 'अपने प्राणों की भीख माँगता है' यह कातरता है; 'वहां जाओ' यह आज्ञा होती है; 'रोकने पर भी हठपूर्वक आता है' यह अनादर की बात है । इस प्रकार तुमसे मैं कुछ नहीं कह पाती । यह सुन कर आप ही प्रमाण हैं। यह कहकर चुप हो गई । तब सरस्वती प्रीति से विस्फारित आंखों से (उसे देखती हुई) बोली—'सखी मालती,
३. उच्छ्वास ५-६: हूण-विजय अभियान, महाराज का देहावसान एवं राज्यवर्धन बलिदान
६४ हर्षचरितम् न शक्नोमि बहु भाषितुम् । एषास्मि ते स्मितवादिनि वचसि स्थिता । गृह्यन्ताममी प्राणाः' इति । मालती तु देवि, यदाज्ञापयसि, अति- प्रसादाय' इति व्याहृत्य प्रहर्षपरवशा प्रणम्य प्रजविना तुरगेण ततार शोणम् । अगाच्च दधीचमानेतुं च्यवनाश्रमपदम् । इतरा तु सखीस्नेहेन सावित्रीमपि विदितवृत्तान्तामकरोत् । उत्कण्ठाभार- भृता च ताम्यता चेतसा कल्पायितं कथंकथमपि दिवसशेषमने- षीत् । अस्तमुपगते च भगवति गभस्तिमति, स्तिमिततरमवतरति तमसि, प्रहसितामिव सितां दिशं पौरंदरीं दरीमिव केसरिणि मुञ्चति चन्द्रमसि सरस्वती शुचिनि चीनांशुकसुकुमारतरे तरङ्गिणि दुगूल- कोमलशयन इव शोणसैकते समुपविष्टा स्वप्नकृतप्रार्थना पादपतन- लग्नां दधीचचरणनखचन्द्रिकामिव ललाटिकां दधाना, गण्डस्थला- दर्शप्रतिबिम्बितेन 'चारुहासिनि, अयमसावाहूतो हृदयदयितो जनः' प्रजविनेति साभिप्रायम् । अस्तमित्यादौ सरस्वती प्रतिपालयामासेति संबन्धः । गभस्तिमान्रविः । पौरंदर्यैन्द्री । दरी गुहा शोणेत्यादि सैकतविशेषम् । उपमा- नस्य तु दुकूलकोमल इत्युक्तम् । तरङ्गिणो प्रतिदिनं क्षीयमाणेन वारिणा कृतलेखे भङ्गियुक्ते च । चन्द्रिका कान्तिरतत्र । ललाटालंकारो ललाटिका । चक्रवालं समूहः । मैं बहुत बात नहीं कर सकती । हे स्मितवादिनि ! मैं तेरी बात मान जाती हूँ । मेरे प्राणों की तू रक्षा कर ।' 'देवि, अत्यन्त प्रसाद के लिए, जो आज्ञा ।' मालती यह कह और अत्यन्त प्रसन्न हो प्रणाम करके अपने तेज घोड़े पर चढ़ सोन के उस पार चली गई और दधीच को लाने के लिए च्यवनाश्रम पहुँची । सरस्वती ने इस वृत्तान्त को सखी के स्नेह से सावित्री को भी सुना दिया । उत्सुकता से बोझिल एवं दुःखी चित्त के कारण कल्प के समान शेष दिन को किसी प्रकार बिताया । जब भगवान् सूर्य अस्त हो गए, धीरे- धीरे अन्धकार भी उतरने लगा और (चन्द्रमा, जैसे सिंह गुफा से निकलता है वैसे ही हँसती हुई उज्ज्वल पूर्व दिशा को छोड़ने लगा, तब सरस्वती पवित्र चीनांशुक के समान कोमल, और तरंगों के चिह्न वाली मानों चादर से युक्त कोमल शय्या के सदृश सोन की रेत पर आकर बैठी और प्रतीक्षा करने लगी । वह ललाट का आभूषण धारण कर रही थी, मानों वह स्वप्न में प्रार्थना करने के लिए पैरों पर गिरने से नखों की ज्योत्स्ना हो उसके गालों के आइने में चन्द्रमा प्रतिबिम्बित हो रहा था, मानों वह उसके कान के पास आकर काम का यह संदेश उसे सुना रहा था कि 'हे चारुहासिनी, देख, मैंने तेरे हृदय-दयित
प्रथम उच्छ्वासः ६५ इति श्रवणसमीपवर्तिना निवेद्यमानमदनसंदेशेवेन्दुना, विकीर्यमाण- नखकिरणचक्रवालेने वालव्यजनीकृतचन्द्रकलाकलापेनेव करेण वीज- यन्ती स्वेदितं कपोलपट्टम्, 'अत्र दधीचादृते न केनचित्प्रवेष्टव्यम्' इति तिरश्चीनं चित्तभुवा पातितां विलासवेत्रलतामिव बालमृणालि- कामधिस्तनं स्तनयन्तो कथमपि हृदयेन वहन्ती प्रतिपालयामास। आसीच्चास्या मनसि—'अहमपि नाम सरस्वती यत्रामुना मनो- जन्मना जानत्येव परवशीकृता । तत्र का गणनेतरासु तपस्विनीष्वति- तरलासु तरुणीषु' इति । आजगाम च मधुमास इव सुरभिगन्धवाहः, हंस इव कृतमृणाल- धृतिः, शिखण्डीव घनप्रीत्युन्मुखः, मलयानल इवाहितसरसचन्दन- धवलतनुलतोत्कम्पः, कृष्यमाण इव कृतकरकचग्रहेण ग्रहपतिना, बालव्यजनं चामरम् । स्तनमध्ये प्रवेशाभावात्तिरश्चीनमित्युक्तम् । यश्च वेत्री प्रवेश- निषेधननिमित्तं वेत्रलतां पातयति स तिरश्चीनः । स्तनयोरधिस्तनम् । विभक्त्यर्थे- ऽव्ययीभावः । कुचपृष्ठ इत्यर्थः । स्तृनयन्ती कलयन्ती । स्तनिः शब्दार्थश्चौरादिकः । 'स्तनन्ती' इति वा पाठः । तपस्विनीषु वराकीषु । आजगामेत्यादौ आजगामेति सम्बन्धः । सुरभिगन्धवाहो वातः सुरभिगन्धं च यो वहति । धृतिर्धारणम्, प्राणयात्रा च । घनः । सारसं सान्द्रं यच्चन्दनं तेन धवलया तनुलतयाहितत्रप उत्कम्पः कामधर्मो यस्य । अन्यत्र-चन्दनांश्च धवांश्च लान्ति श्रयन्ति यास्तन्व्यो लतास्तासामाहित उत्कम्पः कम्पनं येनेति । कृष्यमाण इत्युद्दीपनकारणत्वात् । करा रश्मयः, हस्तश्च करः । हस्तस्य कर्षशं समुचितम् । दधीच को तेरे पास पहुँचा दिया।' हाथ के नखों की किरणें चारों ओर फैल रही थीं, मानों उसने चन्द्र की कलाओं को ही चैंवर बना दिया हो, ऐसे हाथ को वह पसीने से तर अपने गालों पर झल रही थी, वह अपने स्तनों पर किसी प्रकार बाल मृणालिकाओं को धारण किये थी । 'यहाँ दधीच के अतिरिक्त कोई दूसरा प्रवेश न करे' इसलिए काम ने मानों अपनी वेत्र- लता वहाँ छोड़ दी थी। उसने मन में सोचा—'सरस्वती होकर भी मैं जब इस काम द्वारा सब कुछ समझते हुए भी परवश कर दी गई, तो उन बेचारी अति चपल स्वभाव वाली तरुण नारियों की क्या गणना ?' तब (सुगन्धि पवन से युक्त) वसन्त के समान सुगन्धि से भरे हुए, (मृणाल से जीवन धारण करने वाले) हंस के समान मृगाल धारण किये हुए, (घन या मेघ में प्रीति से उत्सुक) मयूर के समान घन (दृढ़) प्रीति के कारण उत्सुक, (चन्दन और धव वृक्षों के आश्रय पाई ५ ह०
प्रेर्यमाण इव कन्दर्पोद्दीपनदक्षेण दक्षिणानिलेन, उह्यमान इवोत्कलिका- बहुलेन रतिसरसेन, परिमलसंपातिना मधुपपटलेन पटेनेव नीलेना- च्छादिताङ्गयष्टिः, अन्तःस्फुरता मत्तमदनकरिकर्णशङ्खायमानेन प्रति- सेन्दुना प्रथमसमागमविलासवि लक्षस्मितेनेव धवलीक्रियमाणैककपो- लोदरो मालतीद्वितीयो दधीचः । आगत्य च हृदयगतदयितानूपुर- रवविमिश्रयेव हंसगद्गदया गिरा कृतसंभाषणो यथा मन्मथः समाज्ञा- पयति, यथा यौवनमुपदिशति, यथा विदग्धताध्यापयति, यथानु- रागः शिक्षयति, तथा तामभिरामां रामाम रमयत् । उपजातविस्रम्भा चात्मानमकथयदस्य सरस्वती । तेन तु सार्धमेकदिवसमिव संवत्सर- अधिकमनयत् ।
ग्रहपतिश्चन्द्रः । प्रेर्यमाण इति । अनिलस्योचितमेतत्कर्म । उह्यमान इति । जलस्यो- चितमेतत् । उत्कलिका, रुहरुहिका, ऊर्मयश्च । रसोऽभिलाषः, जलं च । परिमल आमोदः । पटलं समूहः । प्रतिमा प्रतिच्छन्दकम् । यथा मन्मथ इति । मन्मथस्य प्रभवन्शीलत्वेनाज्ञादानमुचितम् । एवं सर्वत्रोपदिशतीति । इत्थमित्थं वर्तस्वेत्यु- पदेशः । देवताविषयं सम्भोगशृङ्गारवर्णनमनुचितमिति न तत्र विस्तरः प्रवर्तते । कुमारीत्वे च गान्धर्वविवाहो विस्तरेण न तथा वर्णितः शापनिर्वाहणमात्रपरत्वा-
हुई तन्वी लताओं में कम्पन पैदा करने वाले) मलया निल के समान सान्द्र चन्दन के लेप से उज्ज्वल शरीर में कम्प से युक्त ग्रहपति दधीच मालती के साथ आये । मानों चन्द्र उन्हें किरण- रूपी हाथों से बाल पकड़ कर खींच लाया हो । काम को उद्दीप्त करने में दक्षिणानिल ने मानों उन्हें प्रेरित किया हो । अभिलाषाओं की तरंगों से भरा रतिरस मानों उन्हें ढो लाया हो । सुगन्ध पर झूलते हुए भौंरे उन पर छा रहे थे, मानों उनके अङ्ग नीले वस्त्र से ढँक रहे हों । उनके एक कपोल के भीतर चन्द्र प्रतिफलित होकर चमक रहा था, मानों मतवाले मदन- रूपी हाथी के कान का वह शङ्ख हो । या प्रथम मिलन के विलास स्वरूप स्मित से उनके कपोल के मध्यभाग की कान्ति और भी निखर गई हो । आकर उन्होंने हृदय में पहुँची हुई प्रिया के नूपुर की आवाज से मिली हुई हंस के समान गद्गद वाणी से बातचीत की । काम जो आज्ञा देता, यौवन जो उपदेश देता, अनुराग जो शिक्षा देता, विदग्धता जो समझी, उसी प्रकार अपनी सुन्दरी प्रियतमा के साथ वे विहार करने लगे । जब पूरा विश्वास हो गया तब सरस्वती ने अपने आपको उनसे स्पष्ट कह दिया (कि मैं दुर्वासा के शाप से ग्रस्त होकर मर्त्य लोक में आई हुई सरस्वती हूँ) । दधीच ने सरस्वती के साथ-साथ रह कर एक वर्ष से अधिक समय को एक दिन के समान व्यतीत किया ।
प्रथम उच्छ्वासः ६७ अथ दैवयोगात्सरस्वती बभार गर्भम् । असूत चानेहसा सर्व- लक्षणाभिरामं तनयम् । तस्मै च जातमात्रायैव ‘सम्यक्सरहस्याः सर्वे- वेदाः सर्वाणि च शास्त्राणि सकलाश्च कला मत्प्रभावात् स्वयमावि- र्भविष्यन्ति’ इति वरमदात् । सद्भर्तृश्लाघया दर्शयितुमिव हृदयेनादाय दधीचं पितामहादेशात्समं सावित्र्या पुनरपि ब्रह्मलोकमरुरोह । गतायां च तस्यां दधीचोऽपि हृदये ह्लादिन्येवाभिहतो भार्गववंशसंभूतस्य भ्रातुर्ब्राह्मणस्य जायामक्षमालाभिधानां मुनिकन्यकामात्मसूनोः संवर्ध- नाय नियुज्य विरहातुरस्तपसे वनमगात् । यस्मिन्नेवावसरे सरस्व- त्यसूत तनयं तस्मिन्नेवाक्षमालापि सुतं प्रसूतवती । तौ तु सा निर्विशेषं सामान्यस्तन्यादिना शनैः शनैः शिशू समवर्धयत् । एकस्तयोः सारस्वताख्य एवाभवत्, अपरोऽपि वत्सनामासीत् । आसीच्च तयोः सोदर्ययोरिव स्पृहणीया प्रीतिः । अथ सारस्वतो मातुर्महिम्ना यौवनारम्भ एवाविर्भूताशेषविद्या- दिति । वृत्तस्यान्यथा निजभर्तृत्यागो दोषावहः किमर्थं कृत इत्यादिकाः कुविकल्पा उत्पद्येरन्निति । अनेहसा कालेन । रहस्यं ज्ञानभागः । ह्लादिनी वज्रम् । तत्पश्चात् दैवयोग से सरस्वती ने गर्भ धारण किया और समय से सब लक्षणों वाले सुन्दर पुत्र को उत्पन्न किया और जन्म लेते ही उसे वर दिया—'मेरे प्रभाव से सम्यक् प्रकार से रहस्यों के साथ वेद, समस्त शास्त्र, समस्त कलाएँ स्वयं आविर्भूत हों। उत्तम पति के गौरव से मानो दिखाने के लिए हृदय में दधीच को रखकर ब्रह्मा जी के आदेश के अनुसार फिर सरस्वती सावित्री के साथ ब्रह्मलोक को चली गई । उसके चले जाने से दधीच के हृदय पर गहरा वज्रपात-सा हुआ। तब उन्होंने अपने पुत्र को पालने-पोसने के लिए भार्गववंश में उत्पन्न किसी ब्राह्मण भाई की पत्नी अक्षमाला नामक मुनिकन्या के पास रख दिया और स्वयं सरस्वती के विरह में आतुर होकर तपस्या करने के लिए वन में चले गये । जब सरस्वती ने पुत्र पैदा किया था तभी अक्षमाला को भी एक पुत्र हुआ था । उन दोनों को एक भाव से दूध पिलाकर उसने पाला-पोसा और बढ़ाया । उनमें से एक का नाम सारस्वत हुआ और दूसरे का नाम वत्स । दोनों में भाई के समान स्पृहणीय प्रेम- भाव था । माता के प्रभाव से सारस्वत में यौवन का आरम्भ होते ही सारी विद्याएँ प्रगट हो गईं
६८ हर्षचरितम् संभारस्तस्मिन्समवयसि भ्रातरि प्रेयसि प्राणसमे सुहृदि वत्से वाङ्मयं समस्तमेव संचारयामास । चकार च कृतदारपरिग्रहस्यास्य तस्मिन्नेव प्रदेशे प्रीत्या प्रीतिकूटनामानं निवासम् । आत्मनाप्याषाढी, कृष्णाजिनी, अक्षवलयी, वल्कली, मेखली, जटी च भूत्वा तपस्यतो जनयितुरेव जगामान्तिकम् । अथ वत्सात्प्रवर्धमानादिपुरुषजनितात्मचरणोन्नतिः, निर्गतप्रघोषः, परमेश्वरशिरोधृतः, सकलकलागमगम्भीरः, महामुनिमान्यः, विपक्ष- क्षोभक्षमः, क्षितितललब्धायतिः, अस्खलितप्रवृत्तो भागीरथीप्रवाह इव वाक्प्रस्तुता यत्र तद्वाङ्मयम् । 'आषाढसंज्ञो दण्डः स्यात्पालाशो व्रतचारिणाम् । वृक्षत्वङ्-निर्मितं वस्त्रं वल्कलं समुदाहृतम् ॥' मेखला मुञ्जतृणादिरचितं कटिसूत्रम् । जटा रूक्षसंहतकेशाः । अथेत्यादौ । वत्सात्प्रावर्तत विमलो वंश इति संबन्धः । प्रवर्धमानाः संताना- दिना वृद्धिं गच्छन्तो य आदिपुरुषाः पूर्वबान्धवाः शुक्राद्यास्तैः कृताः स्वेषां चरणानां कठादिशाखाध्यायिनामुन्नतिरुत्कर्षो यस्य सः । अन्यत्र-प्रवर्धमानस्तु वामनरूपो य आदिपुरुषो हरिस्तेन जनिता स्वपदोन्नतिर्माहात्म्यं यस्य स इति । किल त्रैलोक्या- तो उसने प्राण के समान प्रिय अपने समवयस्क भाई तथा मित्र वत्स ने भी समस्त वाङ्मय को उड़ेल दिया और वत्स का विवाह करा उसी प्रदेश में प्रीति के कारण प्रीतिकूट नाम का निवास बनवाया । और खुद वह पलाश का डंडा, कृष्ण मृगचर्म, अक्षवलय, वल्कल, मेखला और जटा धारण करके तपस्या में लगे हुए पिता दधीच के ही पास चला गया । वत्स से विमल-वंश पावन गङ्गा-प्रवाह की भांति चला, जिसके बढ़ते जाते हुए आदि- पुरुषों ने अपने चरणों-कठादि वैदिक शाखाओं के अध्ययन करने वालों-की उन्नति की ( गङ्गाप्रवाह के पक्ष में-बढ़ते जाते हुए वामनरूप आदिपुरुष ने जिसकी पदोन्नति या माहात्म्य उत्पन्न किया ), जिसका निर्घोष ( यश ) निकल फैला ( पक्ष में-शब्द या ध्वनि होती रहती है ), जिसे ( या जिसकी आज्ञा को ) परमेश्वर अर्थात् राजाओं ने शिर से धारण किया (पक्ष में-परमेश्वर अर्थात् शिव जी ने शिर से धारण किया ), जो समस्त कलाओं के आगम ( अध्ययन या अज्ञान ) से गम्भीर था ( पक्ष में-जिसका आगमन कलकल शब्द के साथ होता है ), जो महामुनियों का मान्य था । ( पक्ष में-महामुनि अर्थात् जहु ने जिसका मान किया ), जो विपक्षों-शत्रुओं के क्षोभ उत्पन्न करने में समर्थ था ( पक्ष में-जो अपने
प्रथम उच्छ्वासः ६९
पावनः प्रावर्तत विमलो वंशः । यस्मादजायन्त वात्स्यायनो नाम गृहमुनयः, आश्रितश्रौता अप्यनालम्बितालीकबककाकवः, कृत- कुक्कुटव्रता अप्यबेडालवृत्तयः, विवर्जितजनपङ्क्तयः, परिहृतकपटकोरू- कुचीकूर्चकृताः, अगृहीतगह्वराः, न्यक्कृतनिकृतयः, प्रसन्नप्रकृतयः, विहतविकृतयः, परपरीवादपराचीनचेतोवृत्तयः, वर्णत्रयव्यावृत्ति-
क्रान्तिक्राले ब्रह्मलोकप्रासाद्विष्णुपदाद् ब्राह्मणा कमण्डलुजलक्षालिता गङ्गा सम- मवदिति वार्ता । प्रदोषो यशः, शब्दश्च । परमेश्वरो राजा, हरश्च । सकलानां कलानां वृत्तान्तानामागमेन च सहकलकलेन यदागमनं तेन च । महामुनिर्जह्नु- रपि । विपक्षाः शत्रवः, शैलाश्च । वीनां पक्षिणां वा पक्षच्छेदेषु सहिष्णुः । आयतिः प्रतापः, विस्तारश्च । स्खलितं स्वाचारच्युतिः । प्रवृत्तः प्रकृष्टवृत्तः । अस्ख- लितं असंरुद्धं कृत्वा गतश्च । श्रौतं वेदमभवम्, चिरवृत्तं च । 'मिन्नो भयाद्वा शोकाद्वा ध्वनिः काकुरुदाहृता' । अत्र च छद्म लक्ष्यते । बकस्य काकुः । बकच्छद्म यैश्च चिरवृत्तमाश्रितं ते छद्मचारित्वादाश्रितबककाकवो भवन्त्येव । अमी तु न तथेति विरोधः । कुक्कुटव्रतं नियमविशेषः । यत्र कुक्कुटाण्डप्रमाणग्रासभोजनम् । न वैडाली हिंसावृत्तिर्येषां तैः विरोधो तु कुक्कुटानां व्रतं भक्षणं येन कृतं स कथं बिडालवृत्तिर्न स्यात् ? पङ्क्तिर्लोकप्रसिद्धो व्यवहारः, पाको वा । कपटो व्याजवृत्तिः । कूर्चाः स्फुटाः ।
वेग से विपक्षों-पर्वतों को क्षुभित कर देता ) पृथ्वीतल में जिसका आयति-प्रताप-व्यास हो गया था ( पक्ष में—पृथ्वीतल में आयति-विस्तार-को प्राप्त हुआ है ), जो कभी स्खलित अर्थात् अपने आचार से च्युत नहीं हुआ एवं प्रवृत्त अर्थात् प्रकृष्ट वृत्त या व्यवहार वाला था ( पक्ष में—जो अस्खलित या बेरोक बहता रहता है । जिस वंश से वात्स्यायन नाम के असाधारण ब्राह्मण उत्पन्न हुए । वे गृहमूनि ( गृहस्थ होते हुए भी मुनि-वृत्ति रखने वाले ) थे । श्रौत या चिरवृत्त का आश्रयण करके भी वे मिथ्या बगुलों जैसे छल-छद्म से, बगला- भगती से अलग रहते थे ), कुक्कुट का भक्षण ( व्रत ) करते थे तथापि बिडालों जैसा व्यव- हार ( हिंसावृत्ति ) नहीं रखते थे ( परिहार यह कि वे कुक्कुटव्रत करके अर्थात् उस नियम का पालन करते जिसमें कुक्कुट के अण्डे भर का ग्रासमात्र भोजन करना चाहिए ) । उन्होंने समाज के व्यवहार ( अथवा किसी का बनाया भोजन ) वर्जित रखा था । कपट, कुटिलता और शेखी बघारने की आदत उनमें न थी । पापों से बचते थे । शठता को दूर रखते थे । प्रसन्न स्वभाव वाले थे । उनमें किसी तरह का विकार न था । दूसरे की निन्दा से उनकी चित्तवृत्ति पराङ्मुखी थी । तीनों वर्णों ( अपने गोत्र के अतिरिक्त ब्राह्मण, क्षत्रिय,
७० Digitized by Arya Samajहर्षचरितम् Chennai and eGangotri विशुद्धान्धसः, धीरधिषणाः, विधूताध्येष्णाः, असङ्कुसुकस्वभावाः, प्रणतप्रणयिनः, शमितसमस्तशाखान्तरसंशीतयः उद्घाटितसमग्र- ग्रन्थार्थग्रन्थयः, कवयः, वाग्मिनः, विमत्सराः, परसुभाषितव्यसनिनः, विदग्धपरिहासवेदिनः, परिचयपेशलाः, नृत्यगीतवादित्रेष्वबाह्याः, ऐतिहास्यावितृष्णाः, सानुक्रोशाः, सर्वातिथयः, सर्वसाधुसंमताः, सर्वसत्त्वसाधारणसौहार्दद्रवार्द्रीकृतहृदयाः, तथा सर्वगुणोपेता राज- सेनानभिभूताः, क्षमाभाज आश्रितनन्दनाः, अनिस्त्रिंशा विद्याधराः, आत्ममहिम्ना व्यवहारः, समूह इत्यन्ये । एतेष्वाकूतं परिहृतं यैः । गह्वरं पापम् । निकृतिः शाठ्यम् । प्रकृतिः स्वभावः । पराचीनं पराङ्मुखम् । अन्धोऽन्नम् । धीरा स्थिरा । धिषणा बुद्धिः । अध्येषणा याच्ञा । असङ्कुसुकः स्थिरः, मृदुर्वा । शाखाः कठाद्याः । संशीति संशयः । ग्रन्थिर्दुर्वोधः प्रदेशः । परिहासं विदन्ति, न तु स्वयं कुर्वन्ति । परिचयः संस्तवः । सुकुमाराः, अद्वन्द्वकूटा इत्यर्थः । अबाह्याः, न तु तदेकनिष्ठाः । ऐतिह्यमागमः । अनुक्रोशो दया । संमता इष्टाः । सौहार्दं प्रीतिः । सर्वे गुणा धैर्याद्याः । राज्ञां सेनया चानभिभूता ये च सर्वगुणैः सत्त्वरजस्तमोभिर्यु- क्तास्ते कथं राजसेन गुनेनानभिभूता भवन्तीति विरोधः । एवमुत्तरत्र विरोध उद्भा- वनीयः । क्षमा क्षान्तिः, भूश्च । आश्रितानां नन्दना नन्दयितारः, देवोद्यानं नन्दनं च । न निस्त्रिंशा अक्रूराः । विद्यां धारयन्तीति विद्याधराः पण्डिताः, निस्त्रिंशाश्च वैश्य ) को पृथक् करके पवित्र अन्न ग्रहण करते थे । उनकी बुद्धि स्थिर थी । उन्होंने याचना की वृत्ति को तिरस्कृत कर दिया था । उनका स्वभाव स्थिर या मृदु था । उनके मित्रजन अनुकूल थे । उन्होंने समस्त अन्य ( वैदिक ) शाखाओं के सन्देहों को भी दूर किया था । सारे ग्रन्थों की ग्रन्थियां भी उन्होंने उद्घाटित की थीं । वे कवि, वक्ता और मत्सरहित थे । दूसरों के सुभाषित को सुनने के शौकीन थे । विदग्ध जनों के परिहासों के जानकार थे । मिलने-जुलने में कुशल थे । नृत्य, गीत और वाद्य से बाहर नहीं थे । आगम या ऐतिह्य में तृष्णारहित न थे । दयावान्, सबके पूज्य, सभी सज्जनों के इष्ट थे । सभी प्राणियों के प्रति एक समान सौहार्द के कारण उनका हृदय आर्द्र था ( सभी प्रकार के गुणों से युक्त था ) । ( फिर भी ) राजस ( गुण ) से अभिभूत न थे । ( परिहार में राजसेना से अभिभूत न थे ) । पृथ्वी पर रहते थे ( फिर भी ) नन्दन ( देवोद्यान ) के आश्रित थे ( परिहार यह कि क्षमा रखते थे एवं अपने आश्रितों को प्रसन्न रखते थे ) निस्त्रिंश या खड्ग धारण नहीं करते थे ( फिर भी ) विद्याधर ( एक प्रकार के देवभूत प्राणी जो नियमितरूप से खड्ग धारण करते हैं ) थे ( परिहार यह कि क्रूर नहीं थे तथा विद्या के धारण करने वाले (पण्डित) CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
प्रथम उच्छ्वासः ७१ अजडाः कलावन्तः, अदोषास्तारकाः, अपरोपतापिनो भास्वन्तः, अनुष्माणो हुतभुजः, अकुसृतयो भोगिनः, अस्तम्भाः पुण्यालयाः, अलुप्तक्रतुक्रिया दक्षाः, अव्यालाः कामजितः, असाधारणा द्विजातयः। तेषु चैवमुत्पद्यमानेषु, संसरति च संसारे, यातसु युगेषु, अवतीर्ण खड्गा एव । ये च विद्याधरा देवभूतास्ते सखड्गा एव । न त्वनिस्त्रिंशा इति माला- खड्गगुलिकाञ्जनादिना भेदेन भिन्नानामपि विद्याधराणां खड्गहस्तत्वं न व्यभि- चरति । अजडा अमन्दधियः, अशीताश्च । कलावन्तो गीताभिज्ञाः, कलावांश्चन्द्रः स चाजडोऽशीत इति विरोधः। दोषा द्वेषाद्याः, रात्रिश्च। तारयन्तीति तारका आचार्याः, नक्षत्राणि च । उपतापः पीडा, उष्णत्वं च । भास्वन्तस्तेजस्विनः, आदित्याश्च । ते परांस्तापयन्ति । उष्मा स्मयः, दाहिकाशक्तिश्च । हुताशशब्देन हुतमिष्टमुच्यते । हुतं भुञ्जते हुतभुजः, आहिताग्नयो वह्नयश्च । कुसृतिः शाठ्यम्, कौ भूमौ सृतिः सरणम् । भोगिनः सुखिनः, सर्पाश्च । स्तम्भः स्तब्धता, सात्त्विको भावभेदश्च, अप्रणतिर्वा, गृहधारणकाष्ठं च । पुण्यालयाः सुकृतिनः, मठादिस्थानानि च । दक्षाश्च- तुराः, प्रजापतिभेदश्च दक्षः । स च लुप्तक्रतुक्रियो हररोषजेन वीरभद्रेण । व्यालाः शठाः, सर्पाश्च । कामजितः संतुष्टाः, हरश्च कामजित् । असाधारणाः सर्वोत्कृष्टाः । द्विजातयो विप्राः । येषां च द्वे जाती तेषां कथं नासादृश्यम् । काल इति पूर्वोक्ते । अन्यथैतत्पुनरुक्तं स्यात् । पक्षपातो मक्तिर्यस्यास्ति सः, थे )। कलावान् ( चन्द्र ) थे ( फिर भी ) अजड ( अशीत ) थे ( परिहार यह कि गीत आदि कला उन्हें अभ्यस्त थीं एवं जड बुद्धि वाले न थे )। दोषा ( रात्रि ) नहीं थे ( फिर भी ) तारक (नक्षत्र) नहीं थे (परिहार यह कि द्वेष आदि दोषों से रहित थे और उद्धार करने वाले (तारक) आचार्य थे। दूसरों को उपताप देने वाले न थे ( फिर भी ) सूर्य थे ( परिहार में, तेजस्वी थे )। उनमें उष्मा ( जलाने की शक्ति ) न थी ( फिर भी ) हुतभुज् ( अग्नि ) थे ( परिहार में उष्मा अर्थात् अहङ्कार से रहित एवं आहिताग्नि थे ) । भूमि में नहीं सरकते थे ( फिर भी ) भोगी अर्थात् सर्प थे (परिहार में कुसृति या शाठ्य नहीं करते एवं भोगी अर्थात् सुखी थे)। (स्तम्भ- रहित थे ) । उनके यज्ञकार्य लुप्त नहीं थे (फिर भी) दक्ष (एक प्रजापति, जिसके यज्ञकार्य का वीरभद्र ने विध्वंस कर डाला था ) थे ( परिहार में दक्ष अर्थात् चतुर थे ) । व्याल अर्थात् सर्प से रहित थे ( फिर भी ) कामजित् अर्थात् शिव थे ( परिहार में व्याल अर्थात् शठ न थे एवं काम को जीत लेने वाले थे )। इस प्रकार उस वंश में ब्राह्मण उत्पन्न होते गए, संसार-चक्र सरकता गया, युग बीते, CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
७२ हर्षचरितम् कलौ, वहत्सु वत्सरेषु, व्रजत्सु वासरेषु, अतिक्रामति च काले प्रसव- परम्पराभिरनवरतमापतति विकाशिनि वात्स्यायनकुले, क्रमेण कुबेर- नामा वैनतेय इव गुरुपक्षपाती द्विजो जन्म लेभे । तस्याभवन्नच्युत ईशानो हरः पाशुपतश्चेति चत्वारो युगारम्भा इव ब्राह्मतेजोजन्यमान- प्रजाविस्तारा नारायणबाहुदण्डा इव सच्चक्रनन्दकास्तनयाः । तत्र पाशुपतस्यैक एवाभवद् भूभार इवाचलकुलस्थितिः स्थिरश्चतुरुदधि- गम्भीरोऽर्थपतिरिति नाम्ना समग्राग्रजन्मचक्रचूडामणिर्महात्मा सूनुः। सोऽजनयद् भृगुं हंसं शुचिं कविं महीदत्तं धर्मं जातवेदसं चित्रभानुं त्र्यक्षं महिदत्तं विश्वरूपं चेत्येकादश रुद्रानिव सोमामृतरसशीकरच्छु- रितमुखान्पवित्रान्पुत्रान् । अलभत च चित्रभानुस्तेषां मध्ये राजदेव्य- भिधानायां ब्राह्मण्यां बाणमात्मजम् । स बाल एव बलवतो विधेर्व- पक्षैश्च यो याति सः । द्विजो विप्रः, विधुः, पक्षी च । युगारम्भा अपि चत्वारः । ब्रह्म वेदादि, स्रष्टा च ब्रह्मा । सच्चक्रस्य साधुवृन्दस्य नन्दकास्तोषयितारः । चक्रं सुदर्शनं च । नन्दकः खड्गश्च । बाहवोऽपि चत्वारः । अचलकुलस्थितिरभिन्नवर्षं- कलिकाल आया, साल के साल गुजरे, दिन बीते, समय बहुत चला गया । वात्स्यायन- कुल जन्म-परम्परा से निरन्तर विकसित होता गया । इसी क्रम में गुरु में पक्षपात ( भक्ति ) करने वाले कुबेर नामक द्विज विनता के पुत्र गरुड़ के समान हुए (गरुड़ भी अपने गम्भीर पक्षों से पतन या गमन करते हैं तथा द्विज अर्थात् पक्षी हैं)। उनके चार पुत्र हुए-अच्युत, ईशान, हर और पाशुपत, जो चार युगारम्भ के समान थे, जिनके ब्राह्म तेज से सन्तति चारों ओर फैल रही थी, नारायण के बाहुदण्ड की भांति जो साधुवृन्द को सन्तुष्ट करते थे (नारायण का बाहु- दण्ड सुदर्शन नामक चक्र और नन्दकनामक खड्ग से युक्त है)। उसमें पाशुपत के एक ही अर्थपति नामक पुत्र भू-भार की भांति कुल-मर्यादा का पालन करने वाले (पक्ष में अचल अर्थात् पर्वतों के कुल (समूह) के कारण स्थित रहने वाला), स्थिर, समुद्र की भाँति गम्भीर, समस्त ब्राह्मणों के चूडामणि एवं महात्मा पुत्र हुए । अर्थपति ने रुद्रों के समान ग्यारह पुत्र उत्पन्न किये- भृगु, हंस, शुचि, कवि, महीदत्त, धर्म, जातवेदस्, चित्रभानु, त्र्यक्ष, अहिदत्त और विश्वरूप । जो सोम (तृण-विशेष अथवा चन्द्रमा) के अमृतमय शीकर से सिक्त मुख वाले और पवित्र थे । उनमें से चित्रभानु ने राजदेवी नामक ब्राह्मणी में बाण नामक पुत्र को पाया । बल- वान् दैवयोग से बाण बाल्यकाल में ही माता के मर जाने से मातृहीन हो गया । स्नेह उत्पन्न
प्रथम उच्छ्वासः ७३ शादुपसंपन्नया व्ययुज्यत जनन्या। जातस्नेहस्तु नितरां पितेवास्य मातृतामकरोत्। अवर्धत च तेनाधिकतरमाधीयमानधृतिर्धाम्नि निजे। कृतोपनयनादिक्रियाकलापस्य समावृत्तस्य चास्य चतुर्दशवर्ष- देशीयस्य पितापि श्रुतिस्मृतिविहितं कृत्वा द्विजजनोचितं निखिलं पुण्यजातं कालेनादशमीस्थ एवास्तमगमत्। संस्थिते च पितरि महता शोकेनाभीलमनुप्राप्तो दिवानिशं दह्यमानहृदयः कथंकथमपि कतिपया- न्दिवसानात्मगृह एवानैषीत्। गते च विरलतां शोके शनैः शनैर- विनयनिदानतया स्वातन्त्र्यस्य, कुतूहलबहुलतया च बालभावस्य, धैर्यप्रतिपक्षतया च यौवनारम्भस्य, शैशवोचितान्यनेकानि चापल्यान्या- चरन्नित्वरो बभूव। अभवंश्चास्य सवयसः समानाः सुहृदः सहा- मर्यादः। अचलानां गिरीणां कुलैर्वृन्दैः स्थितियंरस्य। चतुरुदधिवत्तैश्च गम्भीरः। अग्र- जन्मानो द्विजाः। सोमस्तृणभेदः, इन्दुश्च। उपसंपन्ना मृता। निजे धाम्नि स्वे गृहे। उपनयनं मेखलादानम्। समावृत्तो निष्पादितवृत्तः। स्नातक इत्यर्थः। वेद- वेदाङ्गपाठक इत्यन्ये। ईषदसमाप्तश्चतुर्दशवर्षश्चतुर्दशवर्षदेशीयः। 'श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः।' दशामुपैतो दशमीस्थ उदाहृतः, न दशमीस्थः। अपूर्णायुरित्यर्थः। संस्थितो मृतः। आभीलं कष्टम्। इत्वरो गमनशीलः। 'अभवंश्च' ही जाने से पिता ने ही पूर्णरूप से उसकी माता के स्थान की पूर्ति की और उनके द्वारा अधिकतर धैर्य धारण कराया जाता हुआ वह अपने घर पर बढ़ा। बाण के उपनयन आदि कार्य-कलाप हुए और उसका समावर्तन-संस्कार भी हो चुका। बाण की आयु चौदह वर्ष की भी पूरी नहीं होने पाई थी कि उसके पिता भी वेद (श्रुति) और धर्मशास्त्र (स्मृति) द्वारा विहित एवं ब्राह्मणजन के उचित समस्त पुण्य-कर्मों को सम्पन्न करके बिना वृद्धावस्था† को प्राप्त हुए चल बसे। पिता के मरने पर उसे महान् शोक के कारण कष्ट हुआ और दिन-रात हृदय में खौलते हुए उसने अपने घर पर ही कुछ दिन बिताये। धीरे-धीरे जब उसका शोक कम हुआ तब उसे वह स्वतंत्रता मिल गई जिससे अविनय या अनुशासनहीनता बढ़ती गई। लड़कपन में बहुत से कुतूहल हो जाते हैं। यौवन का आरम्भ धैर्य को नहीं रहने देता। इसलिए बाण शैशवकाल के उचित अनेक चपलताओं में पड़ कर आवारा (इत्वर) हो गया। अब तो उसके बहुत से सुहृद् † शङ्कर के अनुसार दशा को प्राप्त, (शत-वर्ष की) पूर्ण आयु को पहुँचा व्यक्ति दश- मीस्थ होता है। हिन्दू-संस्कृति में मनुष्य की आयु सौ वर्ष की मानी गई है, किन्तु चतुर्दश- वर्षीय बाण के पिता अभी पूर्णायु नहीं थे, चल बसे।
७४ हर्षचरितम् याश्च । तथा च । भ्रातरौ पारशवौ चन्द्रसेनमातृषेणौ, भाषाकविरी- शानः परं मित्रम्, प्रणयिनौ रुद्रनारायणौ, विद्वांसो वारबाणवास- बाणौ, वर्णकविर्वेणीभारतः प्राकृतकृत्कुलपुत्रो वायुविकारः, बन्दिनाव- नङ्गबाणसूचीबाणौ, कात्यायनिका चक्रवाकिका, जाङ्गुलिको मयूरकः, ताम्बूलदायकश्चण्डकः, भिषक्पुत्रो मन्दारकः, पुस्तकवाचकः सुदृष्टिः, कलादश्चामीकरः हैरिकः सिन्धुषेणः, लेखको गोविन्दकः, चित्रकृद्वीर- वर्मा, पुस्तककृत्कुमारदत्तः, मार्दङ्गिको जीमूतः, गायनौ सोमिलग्रहा- दित्यौ, सैरन्ध्री कुरङ्गिका, वांशिकौ मधुकरपारावतौ, गान्धर्वो- इत्यादिनात्मनस्तथाभूतकलावित्संपर्कमैश्वर्यातिशयं दर्शयति । पारशवो द्विजः शूद्रायां जातः । 'परस्त्री परश्वम्' इति बिदाद्यञ् परश्वादेशश्च । भाषागेयवस्तु- वाचस्तेषु वर्णकविः । गाथादिषु गीतविदित्यर्थः । अपभ्रंशगीतवित्† । 'पञ्चाश- द्वर्षदेशीयां वीरां संस्थितभर्तृकाम् । वदन्ति कात्यायनिकां धृतकाषायवाससम्' ‡ जाङ्गुलिको गारुडिकः । भिषग्वैद्यः । 'स्वर्णकारः कलादः स्यात्तदध्यक्षस्तु हैरिकः' । पुस्तककृल्लेप्यकारः । 'प्रसाधनोपचारज्ञा सैरन्ध्री स्ववशा स्मृता' । संवाहिका या पादादिमर्दनं विधत्ते । लासको नर्तयति यः । युवेत्यादिना वयसः समानत्वमुच्यते । और सहायक मिल गए जो उसकी अवस्था के थे और उसी के समान ( आवारा ) थे । चन्द्रसेन और मातृषेण, जो शूद्रा माता से उत्पन्न द्विजपुत्र ( पारशव ) भाई थे, भाषाकवि ईशान, जो बाण का परम मित्र था; रुद्र और नारायण, जो बाण के स्नेही थे; वारबाण और वासबाण, जो विद्वान् थे; वर्णकवि वेणी भारत; प्राकृत भाषा में रचना करने वाला कुलपुत्र वायुविकार; अनङ्गबाण और सूचीबाण, जो बन्दीजन थे; कात्यायनिका चक्र- चक्रवाकिका ; जाङ्गुलिक (विषवैद्य या गारुडी ) मयूरक पान की खिल्ली लगा कर देने वाला चंडक, भिषक्पुत्र मन्दारक, पुस्तकवाचक सुदृष्टि, स्वर्णकार चामीकर, सुनारों का अध्यक्ष या हीरा काटने वाला सिन्धुषेण, लेखक गोविन्दक, चित्रकार वीरवर्मा, मिट्टी के खिलौने बनाने वाला ( पुस्तककृत् = लेप्यकार ) कुमारदत्त, मृदङ्ग बजाने वाला जीमूत, गायक सोमिल और ग्रहादित्य सैरन्ध्री ( प्रसाधिका = बनाव सिंगार करने वाली ) कुरंगिका, वांशिक ( वंशी बजाने वाले ) मधुकर और पारावत, गान्धर्वोपाध्याय ( संगीतगुरु ) दर्दुरक, संवाहिका † यह अपभ्रंश भाषा में गीत रचना करने वाला था। ‡ कात्यायनिका-शङ्कर द्वारा उद्धृत वचन के अनुसार पचास वर्ष की अवस्था वाली, वीरा, मृतपतिका तथा काषाय वस्त्र धारण करने वाली स्त्री । 'अमरकोश' में भी—'कात्याय- न्यर्थेवृद्धा या काषायावसनाऽथवा ।' ( मनुष्यवर्ग, १७ )
प्रथम उच्छ्वासः ७५ पाध्यायो दर्दुरकः, संवाहिका, केरलिका लासकयुवा ताण्डविकः, आक्षिक आखण्डलः, कितवो भीमकः, शैलालियुवा शिखण्डकः, नर्तकी हरिणिका, पाराशरी सुमतिः, क्षपणको वीरदेवः, कथको जयसेनः, शैवो वक्रघोणः, मन्त्रसाधकः करालः, असुरविवरव्यसनी लोहिताक्षः, धातुवादविद्विहंगमः, दार्दुरिको दामोदरः, ऐन्द्रजालि- कश्चकोराक्षः, मस्करी ताम्रचूडकः । स एभिरन्यैश्चानुगम्यमानो बालतया निध्नतामुपगतो देशान्तरावलोकनकौतुकाक्षिप्तहृदयः सत्स्वपि पितृपितामहोपात्तेषु ब्राह्मणजनोचितेषु विभवेषु सति चाविच्छिन्ने विद्याप्रसङ्गे गृहान्निर्गत । अगाच्च निरवग्रहो ग्रहवानिव नवयौवनेन स्वैरिणा मनसा महतामुपहास्यताम् । अथ शनैः शनैरत्युदारव्यवहृतिमनोहृन्ति वृहन्ति राजकुलानि अक्षैर्दीव्यतीत्याक्षिको द्यूतकारः । कितवो धूर्तः । शैलाली स्वयं यो नृत्यति नटः । पाराशरी भिक्षुः । असुरविवरव्यसनी पातालाभिलाषी । धातुवादविद्रसवादज्ञः । मस्करी परिव्राट् । निध्नतामस्वातन्त्र्यम् । कौतुकेति । न पुनरर्थामिलिप्सया । एत- देव सत्स्वपीत्यादिना प्रकाशयति । निरवग्रहः स्वतन्त्रः । ग्रहवान्भूतगृहीतः । स्वैरिणा स्वतन्त्रेण । अत्युदारेत्यादिः प्रकृतोपयोगी, यस्यात्कविना तथाविधवस्तुवेदिनावश्यमेव ( पैर दबाने वाली ) केरलिका, नृत्य करने वाला ताण्डविक, आक्षिक ( पासा खेलने वाला ) शिखंडक, धूर्त भीमक, स्वयं नृत्य करने वाला युवक नट शिखण्डक, नर्तकी हरिणिका, पारा- शरी ( संन्यासी ) सुमति, क्षपणक ( जैन साधु ) वीरदेव, कथक ( कथावाचक ) जयसेन, शैव- वक्रघोण, मन्त्रसाधक कराल, पाताल में घुस कर यक्ष या राक्षस को सिद्ध करने वाला लोहि- ताक्ष, रसायन बनाने की विद्या जानने वाला विहंगम, दर्दुर नामक घटवाद्य बजाने वाला दामोदर, ऐन्द्रजालिक चकोराक्ष, मस्करी ( परिव्राजक ) ताम्रचूड । ये मित्र तथा कुछ और भी लोग बाण के साथ चलते थे । लड़कपन के कारण वह विवश हो गया । उसके मन में देशान्तरों को देखने की बड़ी उत्कण्ठा थी । यद्यपि पिता-पितामह द्वारा उपार्जित ब्राह्मणजन के उचित धन सम्पत्ति उसके घर थी और विद्या का अविच्छिन्न प्रसंग भी प्राप्त था तथापि वह घर से निकल पड़ा । जैसे किसी पर ग्रहों की बाधा सवार हो वैसे ही स्वच्छन्द होकर और नवयौवन एवं स्वतंत्र मन के कारण बड़े लोगों की खिल्ली का पात्र बना । तब उसने धीरे-धीरे बड़े-बड़े राजकुलों को देखा जिनमें होने वाले उदार व्यवहारों ने उसके मन को हर लिया । अनिन्द्य विद्याओं के ( अध्ययन-अध्यापन ) से उद्भासित गुरु- कुलों में रहा । बड़ी-बड़ी गोष्ठियों में बैठने लगा जो गुणी जनों के बहुमूल्य आलाप के कारण
७६ हर्षचरितम् वीक्षमाणः, निरवद्यविद्याविद्योतितानि गुरुकुलानि च सेवमानः, महार्या- लापगम्भीरगुणवद्गोष्ठीश्चोपतिष्ठमानः, स्वभावगम्भीरधीर्धनानि विदग्ध- मण्डलानि च गाहमानः, पुनरपि तामेव वैपश्चितीमात्मवंशोचितां प्रकृतिमभजत् । महतश्च कालात्तमेव भूयो वात्स्यायनवंशाश्रममात्मनो जन्मभुवं ब्राह्मणाधिवासमगमत् । तत्र च चिरदर्शनादभिनवीभूत- स्नेहसद्भावैः ससंस्तवप्रकटितज्ञातेयैरासैरूत्सवदिवस इवानन्दितागमनो बालमित्रमण्डलमध्यगतो मोक्षसुखमिवान्वभवत् । इति श्रीमहाकविबाणभट्टकृतौ हर्षचरिते वात्स्यायनवंशवर्णनं नाम प्रथम उच्छ्वासः। ─:०:─ मवितव्यम् । वीक्षमाण इत्यनेनात्मनः किमपि प्रकृष्टमुत्कर्षातिशययोगित्वमाह । अथ च वीक्षमाणो न तु गुरुकुलवत्सेवमानः । गाहमान इत्यनेन तेजस्वित्वमाहा- त्मनः । वैपश्चितीं विद्वज्जनोचिताम् । संस्तव आदरः । ज्ञातीनां कर्म ज्ञातेयं बन्धु- त्वम् । 'कपिज्ञात्योर्ढक्' । आसैरिति । बन्धुभिर्योगिमिश्च । योगिपक्षे बाल इव बालो मित्रो रविर्निस्तेजस्त्वात् । उक्तं च—'तपस्यन्तं रविं दृष्ट्वा निस्तेजा जायते रविः । मोक्षमार्गप्रयत्ने तु तेजो नैवास्य विद्यते ॥' इति । मित्रं सखा, सूर्यश्च मित्रः । मण्डलं समूहः । बिम्बम् । मोक्षसुखमपि सूर्यबिम्बगतैरनुभूयत इति । आख्यायिकासु कविभिर्निजवंशवर्णनं कानने तथा वंशः ख्यापितः स्यादिति । आत्मनश्च विटवर्णनम् । सकलकलाकौशलं ममास्तीति हर्षस्य चरिते च वर्णयितव्ये नाप्रस्तुतं चैतदिति शिवम् ॥ इति श्रीशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेते प्रथम उच्छ्वासः । गम्भीर थी। बाण स्वयं स्वभाव से गम्भीर था। उसे धन-सम्पत्ति प्राप्त हुई और विदग्धजनों के मण्डल में रहा। अन्त में फिर वह अपने कुल के योग्य विद्वान् बन गया। बहुत समय के बाद फिर वह अपनी जन्मभूमि और वात्स्यायनवंशी ब्राह्मणों के गांव प्रीतिकूट में पहुँचा। वहाँ बन्धुओं ने, जिनका स्नेह-सद्भाव बहुत दिनों के बाद देखने से नवीन हो गया और जिन्होंने आदरपूर्वक अपना बन्धुत्व प्रकट किया, उत्सव के दिन की भांति उसके आगमन का अभिनन्दन किया तथा उसने बाल्यकाल के मित्रों के बीच मोक्षसुख-जैसा अनुभव किया।† श्रीमहाकविबाणभट्टविरचित हर्षचरित में 'वात्स्यायनवंशवर्णन' नामक प्रथम उच्छ्वास समाप्त। †यहाँ 'बालमित्रमण्डलमध्यगतः' के प्रयोग से यह अर्थ भी व्यञ्जित होता है कि योगी लोग निस्तेज सूर्यमण्डल के मध्य में पहुँच कर मोक्ष-सुख का अनुभव करते हैं।
द्वितीय उच्छ्वासः अतिगम्भीरे भूपे कूप इव जनस्य निरवतारस्य । दधति समीहितसिद्धिं गुणवन्तः पार्थिवा घटकाः ॥ १ ॥ रागिणि नलिने लक्ष्मीं दिवसो निदधाति दिनकरप्रभवाम् । अनपेक्षितगुणदोषः परोपकारः सतां व्यसनम् ॥ २ ॥ अथ तत्रानवरताध्ययनध्वनिमुखराणि, भस्मपुण्ड्रकपाण्डुरललाटैः कपिलशिखाजालजटिलैः कृशानुभिरिव क्रतुलोभागतैर्बटुभिरध्यास्यमा- अतीत्यादि । यस्य क्रोधादिभावगण इङ्गितादिना परेण न चेत्यते स गम्भीरः । उक्तं च—'यस्य प्रसादादाकारात्क्रोधहर्षभयादयः । भावस्या नोपलभ्यन्ते तद्गाम्भी- र्यमुदाहृतम् ॥' इति । अगाधश्च । अवतरणमवतारः, प्रवेशनम् । अवतरन्ति येने- त्यवतारः, सोपानादिश्च । समीहितसिद्धिं राजगृह आत्मनः प्रवेशलक्षणम् जल- ग्रहणलक्षणं च । गुणा औदार्यादयः, आकर्षणरज्जुवश्च । पार्थिवा राजानः, पृथ्वो- विकाराश्च । घटयन्ति वाञ्छितेन प्रयोजयन्तीति घटकाः, कुम्भाश्च । अनेन तादृशे राज्ञि बाणस्य कृष्ण एव समीहितसिद्धिरध्यास्यत इति सूचितम् ॥ १ ॥ रागिणि रक्ते, विषयाभिलाषिणि च । लक्ष्मीं शोभाम्, समृद्धिं च । अत्र नलिना- दिकमप्रस्तुतम् बाणाद्यास्तु प्रस्तुताः । अनेन कृष्ण ईदृशे बाणे राजप्रभवां श्रियं निधास्यतीत्युक्तम् ॥ १ ॥ अथेत्यादिना । बाणो बान्धवानां भवनानि भ्रमन्सुखमतिष्ठदिति संबन्धः । शिखा चूडा, ज्वाला च । सोमो यज्ञियं द्रव्यम् । केदारिका स्वल्पं क्षेत्रम् । प्रघटनेषु तथो- चितत्वात् । अहरिता हरिताः संपद्यमाना हरितायमानाः लोहितादित्वात्क्यङ् । जैसे किसी गहरे कुएँ से जल लेने के लिए सोपान आदि के अभाव से उतरना कठिन है ऐसी स्थिति में डोर के साथ घड़े की सहायता से जल निकालते हैं, उसी प्रकार अत्यन्त गम्भीर वाले राजा के पास न पहुँच पाया हुआ व्यक्ति गुणवान् संयोजक लोगों की सहायता से ही अपनी इष्ट-सिद्धि कर पाता है† ॥ १ ॥ राग से भरे हुए कमल में दिन सूर्य से उत्पन्न शोभा-सम्पत्ति को आहित कर देता है । दूसरे का उपकार करना सज्जनों का एक स्वाभाविक व्यसन होता है, जिसमें वे किसी के गुण-दोष की ओर ध्यान नहीं देते‡ ॥ २ ॥ वहाँ तब बाण स्नेहपूर्वक अपने चिरदृष्ट बन्धु-बान्धवों के घर जा-जाकर मिलता हुआ सुख से रहने लगा । ब्राह्मणों के वे घर निरन्तर अध्ययन की ध्वनि से मुखरित हो रहे † यहां गुणवान् पार्थिव घटक से कृष्णवर्धन का संकेत है जिन्होंने बाण की इष्टसिद्धि, उसे हर्षवर्धन से मिला कर, की थी । द्वितीय उच्छ्वास में यही प्रसंग वर्णित है । ‡ दिवस अर्थात् कृष्ण, सूर्य अर्थात् सम्राट् हर्ष से शोभा-सम्पत्ति लेकर नलिन अर्थात् बाण को अर्पित करते हैं, यह प्रस्तुत में तात्पर्य है ।
७८ हर्षचरितम् नानि, सेकसुकुमारसोमकेदारिकाहरितायमानप्रघनानि, कृष्णाजिन- विकीर्णशुष्यत्पुरोडाशीयश्यामाकतण्डुलानि, बालिकाविकीर्यमाणनीवार- बलीनि, शुचिशिष्यशतानीयमानहरितकुशपूलीपलाशसमिन्धि, इन्धनगो- मयपिण्डकूटसंकटानि, आमिक्षीयक्षीरक्षारिणीनामग्निहोत्रधेनूनां खुरवल- यैर्विलिखिताजिरवितर्दिकानि, कमण्डलव्यमृत्पिण्डमर्दनव्यग्रयतिजनानि, वैतानवेदीशङ्कव्यानामौदुम्बरीणां शाखानां राशिभिः पवित्रितपर्यन्तानि वैश्वदेवपिण्डपाण्डुरितप्रदेशानि, हविर्धूमधूसरिताङ्गणविटपिकिसलयानि, वत्सीयबालकलालितललत्तरलतर्णकानि, क्रीडत्कृष्णसारच्छागशावक- प्रघनान्यङ्कनानि । 'उशन्ति प्रघनामिरूयामेकदेशे तु वेश्मनः' । पुरोडाशीयेत्यादि सहितेत्यर्थं ईयंः। बालिका कुमार्यः । नीवारा अकृष्टपच्या व्रोहयः । कूटो राशिः । आमिक्षीयमिति । तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेवामिक्षा । 'आमिक्षा सा शृतोष्णे या क्षीरे स्याद्दधियोगतः' इति । तस्यै हितमामिक्षीयम् । आमिक्षाप्रकृतित्वमस्य च योग्यत्वात् । अग्निहोत्रेषु तस्या अनाम्नातत्वात्, यद्वा, —यदन्नस्य जुहुयादिति । यस्या अपि हवनं भवत्येव । वलयैः समूहैः । वितर्दिका वेदिका । कमण्डलुमुनिकर कस्तस्मै हिताः कमण्डल्व्याः । 'उगवादिभ्यो यत्' । यतीनां निष्किञ्चनत्वादादरत्त्वाच्च स्वयंकरणम् । वितानो यज्ञः, तत्र भवा वैतानो यज्ञाग्निकार्यभूः । शंकुः कीलकः, तस्मै हितः शङ्कव्यः । औदुम्बरीणामिति । तासां याज्ञियत्वात् । वत्सेभ्यो हिता वत्सी- याः वत्सपरिचर्यातुराः तर्णकाः सद्योजाता वत्साः । कृष्णसारेति छागविशेषणम् । थे । त्रिपुण्ड भस्म से मस्तक को उज्ज्वल किए हुए सोमयज्ञों के लोभी वटु वहां इकट्ठे थे जो कपिल वर्ण वाली ज्वाला की जटाओं से शोभित अग्नि के समान प्रतीत होते थे । आंगनों में सोम की क्यारियां सींचने से हरी हो रही थीं । बिछे हुए कृष्णाजिन पर पुरोडाश बनाने के लिए सांवा पसार कर सुखाया जा रहा था । कुमारी कन्याएँ बिना जोत के पके हुए नीवारों की बलि बिखेर रही थीं । सैकड़ों शिष्य पवित्र होकर कूशा की हरी आंटियाँ और पलाश की समिधाएँ इकट्ठी कर रहे थे । जलावन के लिए लिए गोबर के कण्डो का ढेर लगा था । आमिक्षा† बनाने के योग्य दूध देने वाली गौएँ अपने खुरों से आँगन की वेदियाँ कोड़ रही थीं । यती लोग कमण्डलुओं को मिट्टी से मलने में व्यग्र थे । वैतान अग्नियों की वेदी में लगाए जाने वाले शंकुओं के लिए गूलर की शाखाएँ किनारे रखी थीं । स्थान स्थान पर वैश्वदेवों के उजले पिण्डे रख दिए गए थे । आँगन के पेड़ के पत्ते यज्ञ- धूम से बिलकुल धूमिल हो रहे थे । देख-रेख करने वाले लड़के उचकते हुए सद्योजात † एक प्रकार का दूध से बना यज्ञीय पदार्थ । यह तप्त दूध में दही डाल कर बनाया जाता है और वैश्वदेव के लिए अर्पित किया जाता है ।
द्वितीय उच्छ्वासः ७९ प्रकटितपशुबन्धप्रबन्धानि, शुकसारिकारब्धाध्ययनदीयमानोपाध्यायविश्रा- न्तिसुखानि, साक्षात्त्रयीतपोवनानीव चिरदृष्टानां बान्धवानां प्रीयमाणो भ्रमन्भवनानि, बाणः सुखमतिष्ठत् । तत्रस्थस्य चास्य कदाचित्कुसुमसमययुगमुपसंहरञ्जृम्भत ग्रीष्मा- भिधानः समुत्फुल्लमल्लिकाधवलाट्टहासो महाकालः । प्रत्यग्रनिर्जितस्यास्त- मुपगतवतो वसन्तसामन्तस्य बालापत्येष्विव पयःपायिषु नवोद्यानेषु दर्शितस्नेहो मृदुरभूत् । अभिनवोदितश्च सर्वस्यां पृथिव्यां सकलकुसुमबन्धन- तदुक्तम्—'लोहितसारङ्गः कृष्णसारङ्गो वा' इति; सारङ्गशब्दः शबले वर्तते । कृष्ण- सारा मृगा इति केचित् । तन्न । तेषां तदानुपयुक्तत्वात् । पशुबन्धा यज्ञाः । कुसुमसमयो वसन्तः, स एव युगं कल्पस्तल्लक्षणं वा युगं मासद्वयम् । समुत्फु- ल्लमल्लिकाभिर्धवला अट्टा विक्रयस्थानानि तेषां विकासो यत्र, अन्यत्र—तद्वदट्ट- हास उद्धतं हसितं यस्य । शब्दशक्तिमूलानुरणनव्यङ्ग्यरूपो ध्वनिश्च । प्रकृतवर्णने ह्यन्यदप्यत्र प्रतीयते । न वाच्यतया । तथा च—महाकालः, साट्टहासः कल्पमुप- संहरञ्जृम्भते मुखं च विदारयति । महान्कालो ग्रीष्माख्यः भैरवश्च । पयो जलम्, क्षीरं च । बालापत्यपक्षे—नवमुग्धान्मुद्गमनं येषां तेषु । इदमप्रथमतयागमनप्रवृत्ते- ष्वित्यर्थः । दर्शितस्नेह इत्यनेनास्य विजिगीषुव्यवहार आरोपितः । निर्जितस्य च पुनः प्रतिष्ठापनमेव युक्तम् । स्नेहः आर्द्रता, प्रीतिश्च । मृदुरकठोरः सदयश्च । अभिन- वोदित इति साधारणं विशेषणम् । वासन्तिकपुष्पाभिप्रायेण सकलपदबन्धनं वृन्तकारी च । प्रतपन्प्रकर्षेण तपन्; अन्यत्र,—शत्रुहृदयेषु प्रतापं जनयन् । अभिन- वोदितश्च राजा बन्धनमोक्षं करोति । उक्तं हि—'युवराजाभिषेके वा परचक्रावरो- पणे । पुत्रजन्मनि वा मोक्षो बन्धनस्य विधीयते ॥' इति । आदरप्रतिपादनाय बछड़ा को प्यार कर रहे थे। कलोल करते हुए काले छाग शावक को देखकर वहाँ पशुबंध की तैयारी मालूम हो रही थी। शुक-सारिकाएँ स्वयं अध्ययन कराकर गुरुओं को विश्राम का सुख दे रही थीं मानों ब्राह्मणाधिवास के वे भवन त्रयीविद्या के साक्षात् तपोवन थे। यहाँ बाण के रहते हुए वसन्त के दो महीनों का उपसंहार करता हुआ महाकाल ग्रीष्म में फूली हुई चमेली के अट्टहास के साथ जंभाई लेने लगा। † अभी-अभी पराजित होकर अस्तंगत होते हुए वसन्तरूपी सामन्त के दुधमुँहे नवजात बाल-बच्चों के समान जल से सींचे जाने वाले नये-नये उद्यानों पर (ग्रीष्म) स्नेह दिखलाता हुआ मृदु व्यवहार करने लगा। प्रताप फैलाते † यह वाक्य साहित्यशास्त्र में शब्दशक्तिमूलानुरणनव्यङ्ग्यरूप ध्वनि का प्रसिद्ध उदाहरण है। यहाँ अप्रकृत अर्थ शब्द की शक्ति से इस प्रकार व्यञ्जित होता है—कल्प का अन्त (उप- संहार) करते हुए महाकाल या भैरव (शिव) ने विकसित मल्लिका के समान उज्ज्वल अट्टहास करते हुए जम्हाई ली।
मोक्षमकरोत्प्रतप्तमुष्णसमयः । स्वयमृतुराजस्याभिषेकार्द्राश्चामरकलापा इवागृह्णन्त कामिनीचिकुरचयाः कुसुमायुधेन, हिमदग्धसकलकमलिनी- कोपेनेव हिमालयाभिमुखीं यात्रामदादंशुमाली । अथ ललाटंतपे तपति तपने चन्दनलिखितललाटिकापुण्ड्रकैरळक- चीरचीवरसंवीतैः स्वेदोदबिन्दुमुक्ताक्षवलयवाहिभिर्दिनकराराधननियमा इवागृह्यन्त ललनाललाटेन्दुद्युतिभिः । चन्दनधूसराभिरसूर्यम्पश्याभिः कुमुदिनीभिरिव दिवसमसुप्यत सुन्दरीभिः । निद्रालसा रत्नालोकमपि नासहन्त दृशः, किमुत जरठमातपम् । अशिशिरसमयेन चक्रवाकमिथुना- स्वयं शब्दः । अभिषेकः स्नानम् । अन्यत्र-मङ्गलजलपातनं तत्संपर्कवशाच्चार्द्रत्वम् । चिकुराः केशाः । ते हि तदा स्नानाद्र्रतया संयमनात्सुन्दरतया विशेषतः शृङ्गार- मुद्दीपयन्ति । तथा च महाकवेः कालिदासस्य—'स्नानाद्र्रमुक्तेष्वनुधूपवासं विन्य- स्तसायंतनमल्लिकेषु । कामो वसन्तात्ययमन्दवीर्यः केशेषु लेभे रतिमङ्गनानाम्' ॥ यथा वा राजशेखरस्य—'तदा ते स्नातानां दरदलितमल्लीमुकुरिणाम्' इत्यादि । हिमाभिप्राये च हिमालयग्रहणम् । अंशून्मलति धारयतीत्यनेन हिमं प्रतिमवन- शीतळत्वमस्योच्यते । ललाटं तपतीति ललाटंतपः इति खश् । खरतर इत्यर्थः । ललाटेऽलंकारो ललाटिका । 'कर्णललाटात्कनलंकारे' । ललाटिकैव पुण्ड्रकं तिलकमिति सर्वत्र रूप- कम् । संवीतैः प्रावृतैः । चन्दनेन च तद्वद्धूसराः । असूर्यम्पश्याभिरिति । आतपासहिष्णुतया । अन्यत्र,—स्वभावात् । दिवसं सुप्यत इति द्रव्यकर्मणि लादि- विधानात्कर्मणि द्वितीयेव । भावे लः । यदा तु कर्माप्याख्याततया विवक्ष्यते तदा दिवसः सुप्यत इति भाव्यमिति निर्णीतम् । स्वापो निद्रा, मुकुलत्ता च । जरठं कठोरम् । यतो ग्रीष्मेण तनूकृता अत आह—चक्रवाकेत्यादि । रात्रौ किल हुए उषाकाल ने समस्त पृथिवी पर नवोदित होकर उसने फूलों के बन्धन खोले (जैसे राजा वन्दीगृह से बन्दियों को छोड़ता है ।) ऋतुराज वसन्त के अभिषेक द्वारा आर्द्र हुए सुन्दरियों के चामरकलाप के समान केशपाश में कुसुमायुध कामदेव ने साक्षात् निवास किया । सूर्य ने मानों हिम के कारण जली-कटी समस्त कमलिनियों के कोप से हिमालय की ओर यात्रा की । अब ललाट को तप्त करने वाले सूर्य तपने लगे । कमलिनियों के ललाटरूपी चन्द्रमा चन्दन के तिलक लगा, बालों के वस्त्रखण्ड पहन और पसीना के कणों को मुक्ता से बनी जपमालिका धारण कर सूर्य की नियमित रूप से उपासना करने लगे । चन्दन के लेप से धूसर वर्ण वाली सुन्दरियाँ कुमुदिनियों के समान सूर्यांतप के न सहन करने से दिन में CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.