हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ हर्षचरितम् वर्तमाना, गृहीतचामरप्रचलद्भुजलता पितामहमुपवीजयन्ती, निर्भर्त्सनताडनजातरागाभ्यामिव १स्वभावारुणाभ्यां पादपल्लवाभ्यां समुद्भासमाना, शिष्यद्वयेनेव पदक्रममुखरेण नूपुरयुगलेन वाचालित- चरणयुगला, धर्मनगरतोरणस्तम्भविभ्रमं बिभ्राणा जङ्घाद्वितयम्२, सलीलमुत्कलहंस३कुलकलालापप्रलापिनि मेखलादाम्नि४ विन्यस्त- वामहस्तकिसलया, विद्वन्मानसनिवासलग्नेन गुणकलापेनेवांसाव५- लम्बिना ६ब्रह्मसूत्रेण पवित्रीकृतकाया, भास्वन्मध्यनायकमनेकमक्ता- नुयातमपवर्गमार्गमिव ७हारमुद्वहन्ती, वदनप्रविष्टसर्वविद्यालक्तक- हास्यादिकं नानुचितमिति दर्शयति । भूषितेत्यनेन दर्शनीयत्वमाह- पितामहमिति । सर्वप्राधान्यमनेनोक्तम् । निर्भर्त्सनं ताडनं तेन तदर्थं वा यत्ताडनं रोषादमुमिहननं तद्वशाच्च जातरागाभ्यामिव पादपल्लवाभ्यामित्येनेनारुणत्वं सौकुमार्यं चाह । अत एव गाढताडनेन रक्तत्वमुत्प्रेक्षितम् । ताडितो वायं ताडितस्तत्तुल्यो रागो जातो ययोरिति व्याख्येयम् । पदक्रमं पादन्यासपरिपाटी । अन्यत्र च—पदानि च क्रमश्च तत्पदक्रमम्, चरणौ पादौ चरणाश्च विशिष्टशाखापाठकता वाचालिताः शोभिता ययेति । उत्का उत्सुकाः । मेखलादाम्नि रशनागुणे । मानसं चित्तं, सरोविशेषश्च । चँवर पकड़ कर भुजलता को हिलाते हुए पितामह (ब्रह्माजी) पर झल रही थी। दुर्वासा के प्रति झुंझलाइट के कारण भूमि पर पटकने से मानो लाल हुए स्वाभाविक लाल अपने पादपल्लवों से शोभित हो रही थी। पदन्यास से मुखरित होने वाले नूपुरों से उसके दोनों चरण वाचाल हो रहे थे, मानो पदपाठ और क्रमपाठ के अभ्यास में मुखर दो शिष्य अपने चरण अर्थात् शाखा का स्वाध्याय कर रहे हों। उसकी दोनों जाँघें धर्मनगर के तोरणस्तम्भ का अनुकरण कर रही थीं। उत्सुक कलहंस की भाँति अव्यक्त शब्द करती हुई करधनी (मेखलादाम) पर वह लीला के साथ बायें हस्त-किसलय को रखे हुए खड़ी थी। विद्वानों के मानस (चित्त या मानस सरोवर) में हमेशा निवास करने से संक्रान्त हुए गुणों (श्लेष से तन्तुओं) के रूप में कंधे पर लटकते हुए ब्रह्मसूत्र से उसका शरीर पवित्र हो रहा था। वह चमकते हुए मध्यमणि युक्त और अनेक मोतियों से गुम्फित हार को पहने थी, जो सूर्य के मध्य से ले जाने वाले और अनेक मोक्षगामी जीवों द्वारा अनुसृत मोक्षमार्ग की तरह था। मुख में प्रविष्ट समस्त विद्याओं के चरण- १. स्वभावारुणपाद। २. द्वितीयम्। ३. कुलकल, कुलाकलालापप्र । ४. धाम्नि । ५. नेवांशाव । ६. सहजब्रह्म । ७. हारमुरसासमु ।