भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

रसेनेव पाटलेन१ स्फुरता दशनच्छदेन विराजमाना, संक्रान्तकमला- सनकृष्णाजिनप्रतिमां २मधुरगीताकर्णनावतीर्णशशिहरिणामिव कपोल- स्थलीं दधाना, तिर्यक्सौवज्ञनुन्नमितैकभ्रूलता, श्रोत्रमेकं विस्वरश्रवण- कलुषितं प्रक्षालयन्तीवा४पाङ्गनिर्गतेन लोचनाश्रुजलप्रवाहेणेतरश्रवणेन च विकसितसितसिन्धु५वारमञ्जरीजुषा हसतेव प्रकटितविद्यामदा, श्रुतिप्रणयिभिः प्रणवैरिव कर्णवतंस६कुसुममधुकरकुलैरूपास्यमाना, सूक्ष्मविमलेन प्रज्ञाप्रतानेनेवांशुकैनाच्छादितशरीरा,७ वाङ्मयमिव

गुण अपि भास्वान्दोषो मध्यनायकः पदकं यत्र तत् । अथ च भास्वतो मध्यं तेन नयनि सः । यदुक्तम्—‘परिव्राड्योगयुक्तश्च शूरश्चाभिमुखे हतः । द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डलभेदिनौ ॥’ इति । मुक्ता मौक्तिकानि, मोक्षगामिनश्च । हारं मुक्ता- कलापं च, अपवर्गमपि । हारं हरसम्बन्धिनं तत्प्रसादप्राप्यत्वात् । ‘अलक्तरसेनेव पाटलेन’ इति वा पाठः । स्फुरतेति रोषात् । भगवतीकपोले शशिहरिणस्यैवावतारः सम्भाव्यत इति शशिपदम् । अत्र हि कपोले ब्रह्मकृष्णाजिनसंक्रान्तिः, तत्र काम- सम्भावना सामान्यहरिणस्यावतरणे । कलुषितं प्रक्षालयन्तीवेति । सलिलस्य क्षालन- मेव युक्तमिति समुचितेयमुक्तिः । श्रुतिप्रणयिभिरिति । श्रूयते इति श्रुतिर्ध्वनिस्तया प्रणवः प्रशंसातिशयो येषां तैः यद्वा = श्रुतौ श्रोत्रे तत्कर्तृकः प्रणयः प्रार्थना मधुरः ध्वनित्वाद्येषां तैः । कर्णसम्बन्धैरिति व्याख्याने तु कर्णवतंसेत्यादिना पुनरुक्त्यम- परिहार्यम् । श्रुतिर्वेदोऽपि । सूक्ष्मार्थदर्शित्वात्सूक्ष्मस्तीक्ष्णः विमलस्तत्त्वग्राही । अन्यत्र—सूक्ष्मं तनु, विमल शुक्ल्म् । प्रतानः प्रसारः ।

के आलते मे मानों पाटल हुए (क्रोध से) फड़कते ओठ उसे सुशोभित कर रहे थे । उसके कपोलों पर ब्रह्माजी के काले मृगचर्म की छाया पड़ रही थी; मानो उसके मीठे गीतों को सुनने के लिए चन्द्रमा का मृग ही वहाँ उतर कर आ गया हो । उसकी एक भौंह कुछ तिरस्कार का भाव लिये हुए टेढ़ी और ऊपर की ओर उठी हुई थी । आँख के कोने से निकलते हुए आँसू की धारा से मानो वह भ्रष्ट पाठ के श्रवण करने से कलुषित अपने एक कान को धो रही थी और उसके दूसरे कान पर खिले हुए श्वेत सिन्धुवार की मञ्जरी हँस रही थी जिसमें उसका विद्यामद प्रकट हो रहा था । उसके कान पर लगे कर्नफूल पर भौंरे छाये हुए थे, मानों वह श्रुति (वेद) से प्रेम करने वाले अनेक प्रणवों (‘ओँ’ अक्षरों) से उपासित हो रही थी । प्रज्ञा के प्रतान की तरह बहुत बारीक तन्तुओं से बना और उज्ज्वल

१. पाटलेनेव च । २. साममधुर; समम; प्रतिबिम्बां मधुर । ३. सावर्णमु । ४. तीवाङ्गवनि । ५. सिन्दु । ६. संसक्तमधु; वतंसमधु । ७. तनुलता ।