भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

१६ हर्षचरितम् निर्मलं दिक्षु दशनज्योत्स्नालोकं विकिरन्ती १ देवी सरस्वती श्रुत्वा जहास । दृष्ट्वा तु तां तथा हसन्तीं स मुनिः 'आः पापकारिणि, दुर्गृहीत- विद्यालवावलेपदुर्विदग्धे, मामुपहससि' इत्युक्त्वा शिरःकम्पशीर्य- माणबन्धविशरारोरुन्मिषत्पिङ्गलिम्नो जटाकलापस्य २ रोचिषा ३ सिञ्च- न्निव रोषदहनद्रवेण दश दिशः, कृतकालसन्निधानामित्रांन्धकारित- ४ ललाटपट्टाष्टापदामन्तकान्तःपुरमण्डनपत्रभङ्गमकरिकां भ्रुकुटिमाबध्नन्, अतिलोहितेन चक्षुषाऽमर्षदेवतायै स्वरुधिरोपहारमिव प्रयच्छन्, दृष्ट्वेत्यादौ । स मुनिस्तां तथा हसन्तीं दृष्ट्वा शापजलं जग्राहेति सम्बन्धः । तथेति पादताडनभ्रूक्षेपादिपूर्वम् । स मुनिरिति प्राग्वर्णितस्वरूपः । आ इत्यक्षमायाम् । मामिति योऽहं त्रैलोक्यप्रख्यातरौषणस्तमेवेति । समीप एव विशीर्यंते तच्छीलो विश- रारुरितश्चामुतश्च । अत एवोन्मिषत्पिङ्गलिमा । रोचिषा दीप्त्या । रोषदहनो द्रवो रस इव, द्रवत्वं च यद्यपि विशिष्टस्यैव तेजसः सुवर्णादि सम्भवति, तथाप्यत्रोप- चारात्साहश्यम् । कालः कृष्णो गुणो यमश्च । अन्धकारितं संकुचितत्वाददर्शनीयमेव चकितं ललाटपट्टमेवाष्टापदम् । यथा प्रतिपङ्क्ति अष्टौ पदान्यस्येत्यष्टापदं चतुरङ्गफलकम् । अत एवानेन भ्रूसमुन्नमनमव्यक्तीकृतरखेवत्तया विस्पष्टव्यलीक- मेतत् । 'ललाटमुपगीयते । भ्रुवोर्मूलसमुत्क्षेपादभ्रुकुटिं परिचक्षते' । सुशब्द्ः सुतरां अंशुक उसका शरीर ढँक रहा था। वह वाङ्मय के समान निर्मल अपने दाँतों से चाँदनी का आलोक दिशाओं में छिटका रही थी। (दुर्वासा के स्वरहीन पाठ को) सुन कर वह हँस पड़ी। दुर्वासा ने सरस्वती को उस प्रकार हँसते देखकर 'ओ पाप करने वाली, निम्न रूप से प्राप्त विद्या के लेश पर अभिमान से भरी ओ दुर्विदग्धे ! तू मेरा उपहास कर रही है?' यह कह कर बार-बार शिरःकम्प के कारण बंधन के शिथिल हो जाने पर इधर उधर खुले हुए पीताभवर्ण की चमक से युक्त, जटा-समूह के तेज से मानो क्रोधाग्नि के द्रव से समस्त दिशाओं को सींचने लगे। भौंहें चढ़ने लगीं, यमराज का सन्निधान प्राप्त कर चुकी थीं, उनके ललाटरूपी शतरंज खेल के पट्टे को मानो अपनी कालिमा से मलिन १. किरन्ती । २. जटासञ्चयस्य । ३. शोचिषा । ४. ललाटाष्टापदां, ५. अन्तर्केमण्डन ।