हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
पृष्ठ 59, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम उच्छ्वासः १७ निर्दयदष्टदशनच्छदभयपलायमानामिव वाचं रुन्धन्दन्तांशुच्छलेन, ¹अंसा- वस्रंसिनः शापशासनपट्टस्येव ग्रथ्नन्ग्रन्थिमन्यथा कृष्णाजिनस्य, ²स्वेद- कणप्रतिबिम्बितैः ³शापशङ्काशरणागतैरिव सुरासुरमुनिभिः प्रतिपन्न- सर्वावयवः, कोपकम्पतरलिताङ्गुलिना करेण ⁴प्रसादनलग्नामक्षरमा- लामिवाक्षमालामाक्षिप्य कामण्डलवेन वारिणा ⁵समुपस्पृश्याचम्य शापजलं जग्राह । अत्रान्तरे स्वयम्भुवोऽभ्याशे⁶ समुपविष्टा देवी मूर्तिमती पीयूषफेन- नैरपेक्ष्यसूचनाय वा चोभयसम्बन्धः । अंसावस्रंसिन इति । संरम्भाच्छासनपट्टः शुक्लत्वाल्लिपिकार्ष्ण्याच्च सितासितवर्णसंवलितमध्यः पर्यन्तशुक्लश्च भवति । अत एव ते बिन्दुचित्रत्वादुपान्तशुक्लत्वाच्च कृष्णाजिनमुत्प्रेक्षते । यथा शासनपट्टे सति क्वचिद्ग्रामादावधिकारो भवति, तद्वच्च जनसमूहः प्रार्थनां करोति । स हस्तपादा- दिके सर्वस्मिन्नङ्गे गलति । कोपेत्यादौ कम्पग्रहणम् । रोषः शरीरं बाधत इति यावत् । सन्निवेशसाधर्म्यादुक्तम्—अक्षरमालामिवेति । सरस्वतीसम्बन्धितया चोक्तम्—प्रसादनलग्नामिति । विक्षिप्यन्ते । यश्च विरुद्धपक्षः प्रसादयति स विक्षि- प्यते तिरस्क्रियते । कामण्डलवेन मुनिकरकमवेन । समुपस्पृश्याचम्य । अत्रान्तर इत्यादौ मूर्तेश्चतुर्भिर्वेदैः सह सावित्रो समुत्तस्थ्याविति सम्बन्धः । कर रही हो और जैसे वे यमराज के अन्तःपुर की पत्रभङ्गमकरिकाएँ हों। आँखें अत्यन्त लाल हो गईं, मानो वे अमर्ष देवता के लिए अपने ही रुधिर का उपहार भेंट कर रहे थे । बड़ी बेदर्दी से ओठ कट जाने के भय से मानों भागती हुई वाणी को वे अपने दांतों की प्रभा के बहाने मानों रोक रहे थे । शाप के शासनपट्ट की भाँति कंधे गिरते हुए कृष्ण मृगचर्म की गांठ दूसरे प्रकार से बाँधने लगे । शाप के भय से शरण में आये हुए की तरह सुर, असुर और मुनि उनके स्वेदकणों से भरे समस्त अङ्गों में प्रतिबिम्बित हो रहे थे । क्रोध से उत्पन्न काँपकँपी के कारण चंचल अंगुलियों वाले हाथ से उन्होंने मानो प्रसन्न करने के लिए लगी हुई अक्षरमाला की भाँति अपनी अक्षमाला को फेंक दिया और कमण्डलु के जल- से आचमन करके शाप देने के लिए जल उठाया । इस अवसर पर देवी सावित्री ब्रह्माजी के समीप सदेह बैठी थी। वह अमृत के फेन १. असंस्रंसिनः । २. स्वेदंप्रति । ३. शापभयाच्छरण । ४. प्रसादलग्नामक्षमालां विक्षिप्य; अक्षरावलिकामिवाक्षरमाला । ५. स समुप । ६. अभ्यासे । २ ह० CC-0. Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.