हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ हर्षचरितम् पटलपाण्डुरं कल्पद्रुमदुकूलवल्कलं १ वसाना, २बिसतन्तुमयेनांशुके- नोन्नतस्तनमध्यबद्धगात्रिकाग्रन्थिः, ३तपोबलनिर्जितत्रिभुवनजयपताका- भिरिव तिसृभिर्भस्मपुण्ड्रकराजिभिर्विराजितललाटाजिरा, स्कन्धावल- म्बिना ४सुधाफेनधवलेन तपःप्रभावकुण्डलीकृतेन गङ्गास्रोतसेव ५ योग- पट्टकेन विरचितवैकक्ष्यका, ६ सव्येन ब्रह्मोत्पत्तिपुण्डरीकमुकुलमिव ७स्फटिककमण्डलुं करेण कलयन्ती, दक्षिणमक्षमालाकृतपरिक्षेपं कम्बुनिर्मितोर्मिकादन्तुरितं ८ तर्जनतरङ्गिततर्जनीकमुत्क्षिपन्ती करम्, 'आः पाप, क्रोधोपहत, दुरात्मन्, अज्ञ, अनात्मज्ञ, ब्रह्मबन्धो, मुनि- खेट ९, अपसद, १०निराकृत, कथमात्मस्खलितविलक्षः सुरासुरमुनि- अभ्याशे समीपे । गात्रिकाग्रन्थिर्ग्रन्थिविशेषः स्वस्तिकाकारः स्त्रीणामुत्तरीयस्य स्तनो- द्देशे भवति । तिलकं पुण्ड्रकं स्कन्धावंसौ वायुस्थानानि च स्कन्धाः । फेनैस्तद्वद्धव- लेन । 'तिर्यग्वक्षसि विक्षिप्तं वैकक्ष्यकमुदाहृतम्' । सव्येन वामेन । पुण्डरीकमुकुलं मुकुलितं पद्मम् । कलयन्ती क्षिपन्ती, धारयन्ती वा । परिक्षेपः परिवलनम् । कम्बुः शङ्खः । ऊर्मिका बालिका । दन्तुर इव दन्तुरो व्याप्तस्तम् । तर्जनं निभर्त्सनम् । तरङ्गिता तर्जिता चलिता । तर्जनौ प्रदेशिन्यङ्गुष्ठनिकटाङ्गुलिः क्रोधोपहतेत्यात्म- विनाशायैव ते क्रोध इत्युक्तं, भवति । ब्रह्मबन्धो निकृष्टब्राह्मण । अपसदो नीचः । पटल के सदृश उज्ज्वल कल्पद्रुम से प्राप्त दुकूलाकृति छाल को पहने थी । उसने अपने उन्नत स्तनों के मध्य को बिसतन्तु के बने हुए अंशुक को स्वस्तिकाकार गाँती से बाँध रखा था। भस्म की तीन रेखायें उसके ललाट के प्रांगण में शोभायमान थीं मानो उसने अपने तपोबल से जीते हुए तीनों भुवन की जयपताका हो। कंधे पर अवलम्बित, अमृत फेन से समान धवल और मानों तपस्या के प्रभाव से टेढ़े किये हुए गङ्गा के सोते के समान उसने अपने योगपट्ट को वक्ष पर टेढ़ा लटका कर वैकक्ष्यक बना लिया था । उसके बायें हाथ में ब्रह्माजी की उत्पत्ति वाले पुण्डरीक के मुकुल के सदृश स्फटिक मणि का कमण्डलु डोल रहा था। यह अपनी दाहिनी भुजा को ऊपर की ओर फेंक रही थी जो अक्षमाला से परिवेष्टित, शंख की बनी अंगूठी से व्याप्त थी और जिसकी तर्जनी चञ्चल हो रही थी (वह बोल उठो—) 'अरे पापी, क्रोध का मारा, दुरात्मा, मूर्ख, अपने आप को न पहचानने वाला, पतित ब्राह्मण, पाखण्डी साधु, नीच, स्वाध्यायशून्य, अपनी गलती से लज्जित, १. दुकूल । २. बिश । ३. तपोनिर्जित । ४. फेनध । ५. शगाप ऽ६. वैकक्षा । ७. स्फुरि । ८. दन्तुरं । ९. खेटापसदनिरस्कृत । १०. निराकृते CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.