हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya San... प्रथम उच्छ्वासः Chennai and eGangotri १९ 'मनुजवृन्दवन्दनीयां त्रिभुवनमातरं भगवतीं सरस्वतीं शप्तुमभिलषसि' इत्यभिदधाना, रोषविमुक्तवेत्रासनैरोङ्कारमुखरित२मुखैरुत्क्षेप३दोलायमान- जटाभारभरितदिग्भिः४ परिकरबन्धभ्रमित५कृष्णाजिनाटोपच्छायाश्यामाय- मानदिवसैरमर्षनिःश्वासदोलाप्रेङ्खोलितब्रह्मलोकैः सोमरसमिव स्वेदविसर- व्याजेन स्रवद्भीरग्निहोत्रपवित्रभस्मस्मेरललाटैः ६कुशतन्तुचामरचीरचीव- रिभिराषाढिभिः प्रहरणीकृतकमण्डलुमण्डलैमूर्तैश्चतुर्भिर्वेदैः सह बृसीमपहाय सावित्री समुत्तस्थौ । ततो 'मर्षय भगवन्, अभूमिरेषा शापस्य' इत्यनुनाथ्यमानोऽपि निराकृतोऽस्वाध्यायः विलक्षो लज्जितः । सुरासुरमनुजाश्च परस्परविरुद्धानुष्ठानाः । अत्र पुनरीदृशामपि न विप्रतिपत्तिरिति भावः । अभिलषसीति । इच्छामात्रकमपीदं महत्साहसमित्यर्थः । ओंकार एव मुखरितं मुखं येषां तैः । परिकरबन्धः पर्यङ्क- बन्धः । स चोत्थितस्यापि संरम्भभाजो भवति । आटोपो वक्षःप्रदेशे श्यामायमानो रात्रिरिवाचरद्दिवसा यैहैंतुमिरित्यर्थः । अमर्षनिःश्वासैर्दोलावत्प्रेङ्खोलितश्चलितो ब्रह्मलोको यः । कुशतन्तूनां चामरमिव चामरं गुच्छः । कुशतन्तुनचामरं दर्भपिञ्जू- लम्, चीरचीवरं वृक्षत्वग्वस्त्रं ते विद्येते येषां तैः । 'आषाढसंज्ञो दण्डस्तु पालाशो व्रतचारिणाम्' । तत इत्यादौ शापोदकं जग्राहेति विससर्जेति सम्बन्धः । मर्षय क्षमस्व । अनु- देवता, असुर, मुनि मनुष्यसमूह द्वारा वन्दनीय त्रिभुवन की माता देवी सरस्वती को शाप देना चाहता है ?' यह कहती हुई सावित्री मूर्तिमान चारों वेदों के साथ कुशासन छोड़ उठ खड़ी हुई। क्रोध से उन मूर्तिमान वेदों ने भी अपने-अपने वेत्रासन छोड़ दिए, उनके मुख ओंकार की ध्वनि से भर रहे थे, वेग से ऊपर की ओर फेंकने से उनका चञ्चल जटाभार मानों दिशाओं में फैलने लगा। उनकी कमर में लपेट कर बाँधे हुए काले मृगचर्म की बनी छाया से दिन में अंधेरा छाने लगा, वे अपने अमर्षजन्य निःश्वासों से सारे ब्रह्मलोक को दोलायमान करने लगे । उनके शरीर से सोमरस के समान स्वेदजल निकल रहे थे । अग्नि- होत्र के पवित्र भस्म से उनके ललाट चमक रहे थे । वे कुश के तन्तुओं से बने चामर एवं वल्कल और आषाढसंज्ञक पलाश का दण्ड धारण किये हुए थे । वे अपने कमण्डलु से मारने के लिए तत्पर हो उठे । तब 'हे भगवन्, क्षमा करो, यह शाप देने योग्य नहीं' इस प्रकार देवताओं के प्रार्थना १. मनुजमाननीयां । २. मुखर । ३. आक्षेप । ४. भरितशिरोभिः । ५. कृष्णाजिनपटच्छा । ६. कुशतन्तुचारुचामर ।