भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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प्रथम उच्छ्वासः २१

णेव दक्षिणेन करेण निवार्य शापकलकलम्, अतिविमलदीर्घर्भाविष्कृत- युगारम्भसूत्रपातमिव दिक्षु पातयन् दशनकिरणैः सरस्वतीप्रस्थानमङ्गल- पटहेनेव पूरयन्नाशाः, स्वरेण सुधीरमुवाच—'ब्रह्मन्, न खलु साधु- सेवितोऽयं पन्थाः येनासि प्रवृत्तः । निहन्त्येष परस्तात् । उद्दाम- प्रसृतेन्द्रियाश्वसमुत्थापितं हि रजः कलुषयति दृष्टिमक्षजिताम् । कियद्दूरं वा चक्षुरीक्षते । विशुद्धया हि धिया पश्यन्ति कृतबुद्धयः सर्वानर्थानसतः सतो वा । निसर्गविरोधिनी चेयं पयःपावकयोरिव धर्मक्रोधयोरेकत्र वृत्तिः । आलोकमपहाय कथं तमसि निमज्जसि । क्षमा हि मूलं सर्वतपसाम् । परदोषदर्शनदक्षा दृष्टिरिव कुपिता बुद्धिर्न ते आत्मरागदोषं पश्यति । क्व महातपोभारवैवधिकता, क्व पुरो-


वृत्तिः क्रिया । यथा—'संवस्ते क्षालिते वस्त्रे' इति । पन्था व्यवहारः, मार्गश्च । निहन्ति पातयति । प्रसृतानि गन्तुं प्रवृत्तानि, प्रसृता च जङ्घा । रजौरागः, धूलिश्च । कलुषयति कार्याकार्यदर्शनासर्थां करोति । दृष्टिं बुद्धिम्, नेत्रं च । अक्षाणी- न्द्रियाणि, रथाङ्गं चाक्षः । तेन च रथो लक्ष्यते । कृतबुद्धयः संस्कृतमतयः । असदविद्यमानम् । निसर्गः स्वभावः । आलोको विवेकः, प्रकाशश्च । तमः अन्धकारम्, अज्ञानमपि । दोषाः, सव्यमण्डलत्वादीनि च । कुपिता क्रुद्धा, धातुवैषम्यदूषिता च । आत्मरागदोषमिति । आत्मभूतगुणदर्शनम्, लौहित्यलक्षणं च विकारम्, 'वोढा


सूत्र लग गए हो । उन्होंने अपने दाहिने हाथ से, जिसकी निर्मल अंगूठी के मरकत से किरणें फूट कर निकल रही थीं और जो त्रिभुवन के कष्ट को दूर करने के लिए कुश की पवित्री धारण कर रहा था, शापजन्य कोलाहल को शान्त किया । अति विमल और फैलती हुई दाँतों की किरणों से मानों भविष्य के होने वाले सतयुग का आरम्भिक सूत्रपात करते हुए; सरस्वती के प्रस्थान के समय मङ्गलपटह के समान अपनी आवाज से दिशाओं को भरते हुए ब्रह्माजी ने गम्भीरतापूर्वक कहा—'हे ब्राह्मण, आपने जिस मार्ग को अपनाया है वह अच्छे लोगों के द्वारा सेवित नहीं है, अन्त में गिरा देता है । जो जितेन्द्रिय नहीं हैं उनकी आंखें उच्छृङ्खल (बेलगाम) इन्द्रियरूपी घोड़ों द्वारा उठी रज (धूल, राग) निस्तेज बना देती हैं । चर्मचक्षु कहाँ तक देख सकते हैं ? बुद्धिमान् लोग अपने विशुद्ध प्रज्ञारूपी चक्षु से समस्त भले-बुरे को देख लेती हैं । जल और अग्नि के समान धर्म और क्रोध का एक जगह रहना स्वभावविरुद्ध है । प्रकाश (विवेक) को छोड़ अन्धकार (अज्ञान) में क्यों गिर रहे हो ? क्षमा तो सब तपस्याओं का मूल है । दूसरों की बुराइयों को ही देखने में निपुण