हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ Digitized by Arya Samaj Foundation, Chennai and eGangotri हर्षचरितम् भागित्वम् ? अतिरोषणश्चक्षुष्मानन्ध एव जनः । नहि कोपकलुषिता विमृशति मतिः कर्तव्यमकर्तव्यं वा । कुपितस्य प्रथममन्धकारीभवति विद्या, ततो भ्रुकुटिः । आदाविन्द्रियाणि रागः समास्कन्दति, चरमं चक्षुः । आरम्भे तपो गलति, पश्चात्स्वेदसलिलम् । पूर्वमयशः स्फु- रति, अनन्तरमधरः । कथं लोकविनाशाय ते विषपादपस्येव जटा- वल्कलानि जातानि । अनुचिता खल्वस्य मुनिवेषस्य हारयष्टिरिव वृत्त- मुक्ता चित्तवृत्तिः । शैलूष इव वृथा वहसि कृत्रिममुपशमशून्येन चेतसा तापसाकल्पम् । अल्पमपि न ते पश्यामि कुशलजातम् । अनेनाति- लघिम्नाऽद्याप्युपर्यव प्लवसे ज्ञानोदन्वतः । न खल्वेनडमूक़ा एडा जडा वा सर्वं एते महर्षयः । रोषदोषनिषण्णे स्वहृदये निग्राह्ये किमर्थ- भारस्य धोमद्भिर्जनैर्वैवधिकः स्मृतः । दोषैकग्राहिहृदयः पुरोभागी निगद्यते ॥' रागोऽभूत्गुणामिनन्दनम्, रक्तता च । जटाः शिखाः, मूलानि वल्कलानि मुनि- वस्त्राणि, त्वचश्च । वृत्तमुक्ता शीलेन त्यक्ता, परिवर्तुलमौक्तिका च । 'जायोपजीवो हि जनः शैलूषः कथितो बुधैः' । आकल्पो वेषः । जातं प्रकारः । अतिलघिमानु- पादेयता तुच्छत्वात् । उपर्येवेत्यन्तःप्रवेशाभावाद् । लघुश्च जलोपरि प्लवते । 'कथिता अनेडमूक़ाः श्रोतुं वक्तुं च खलु न ये शक्ताः । एडास्तु श्रुतिहीना जडास्तु मूर्खा बुधैः प्रोक्ताः' ।। रोष एव दोषस्तस्य निष्णा नियमेनावस्थितियंत्र तस्मिन्स्व- दृष्टि के समान तुम्हारी क्रोध से अभिभूत बुद्धि अपने ही भीतर उत्पन्न रोग दोष को नहीं देख पा रही है। कहाँ महान् तप के भार को वहन करने की क्षमता और कहाँ एकमात्र दूसरों के अवगुण ग्रहण करना ! अत्यन्त क्रोधी स्वभाव का नेत्रधारी भी अन्धा है, क्योंकि क्रोध से कलुषित हो जाने पर बुद्धि कर्तव्य और अकर्तव्य का विचार नहीं कर पाती । पहले क्रोधी व्यक्ति की विद्या धुंधली हो जाती है और पीछे उनकी भौंह । पहले राग इन्द्रियों को घेरता है, पीछे (लाली रूप में) आँखों में व्याप्त हो जाता है । आरम्भ में तपस्या विगलित हो जाती है । पश्चात् स्वेदजल । पहले अयश स्फुरित होने लगता है, फिर अधर (फड़फड़ाने लगते हैं) विषवृक्ष के समान तुम्हारे जटारूपी वल्कल लोक विनाश के लिए कैसे उत्पन्न हो गए ? तुम्हारी शीलरहित चित्तवृत्ति इस मुनिवेष के लिए वर्त्तुल मोतियों वाली हारयष्टि के समान अनुचित है । शमभाव से रहित चित्त के द्वारा नट के समान कृत्रिम तपस्वी के वेष को व्यर्थ ही ढो रहे हो । (इससे) तुम्हारा भी कल्याण नहीं देख रहा हूँ । इसी हल्केपन से आज भी तुम ज्ञान-समुद्र के ऊपर-ऊपर ही तैर रहे हो । वे सब महर्षि कानों के बहरे, आँखों के अन्धे और मूर्ख नहीं हैं । जब कि CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.