भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 184 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 65

प्रथम उच्छ्वासः २३ मसि निगृहीतवाननागसां सरस्वतीम् । एतानि तान्यात्मप्रमादस्खलित- वैलक्ष्याणि, यैर्याप्यतां यात्यविदग्धो जनः' इत्युक्त्वा पुनराह— 'वत्से सरस्वति, विषादं मा गाः । एषा त्वामनुयास्यति सावित्री । विनोदयिष्यति चास्मद्विरहदुःखिताम् । आत्मजमुखकमलावलोकनाव- धिश्च ते शापोऽयं भविष्यति' इति । एतावदभिधाय विसर्जितसुरा- सुरमुनिमनुजमण्डलः ससंभ्रमोपगतनारदस्कन्धविन्यस्तहस्तः समु- चिताह्निककरणायोदतिष्ठत् । सरस्वत्यपि शप्ता किञ्चिदधोमुखी धवल- कृष्णशारां कृष्णाजिनलेखामिव दृष्टिमुरसि पातयन्ती सुरभिनिः- श्वासपरिमललग्नैर्मूर्त्तः शापाक्षरैरिव षट्चरणचक्रैराकृष्यमाणा शापशोकशिथिलहस्ताऽधोमुखीभूतेनोपदिश्यमानमर्त्यलोकावतरणमार्गेव-


हृदये ते । यद्वा-रोषदोषस्य निष्ठा आपन्नत्वं तस्यामन्त्रणम् हे रोषदोषनिष्ठे इति व्याख्येयम् । निगृहीतवान्=प्राप्तवान् । 'आगः पापापराधयोः । वैलक्ष्यं लज्जितम् । याप्यो ग्राह्यः । पुनराहेति । अविश्रान्तेऽप्युक्तिकमे पुनरित्युपादानं बाध्यतापरिहा- राय । वत्से इति प्रसादाविष्करणार्थम् । एषेति । या तवैव स्निग्धा । विनोदयिष्यति सुखयिष्यति । सरस्वतीति । सरस्वत्यपि शप्ता गृहमगादिति सम्बन्धः । शारां शवलाम् धवलकृष्णामित्येव वक्तव्ये शारग्रहणं संवलितवर्णद्वयप्रतीत्य- र्थम् । अधोमुखीभूतेनेति । योऽधिकरणवशाददिष्टमुपदिशति स लज्जादिनावश्यकम्-


जहाँ क्रोध जैसा महान् दोष वर्तमान है ऐसे अपने हृदय को तुम्हें नियन्त्रित करना चाहिए. तो फिर क्यों तुमने निरपराध सरस्वती को शाप से जकड़ डाला । अपनी असावधानी से हुई गलतियों से लज्जित होने का यही अवसर है, जिनसे मूर्ख जन निन्दनीय होता है ।' यह कह कर ब्रह्मा जी ने फिर कहा—'वत्से सरस्वति ! दुःखी मत हो, यह सावित्री तेरे साथ जायगी । हमारे विरह से दुखी होने पर यह तुझे बहलायेगी । पुत्र का मुखकमल देखने तक तेरे इस शाप की अवधि है।' इतना कह कर ब्रह्माजी ने सुर, असुर और मुनि के मण्डल को अपने-अपने स्थान पर विदा किया और स्वयं शीघ्र पहुँचे हुए नारद के कन्धे पर हाथ रख कर समुचित दैनिक क्रिया करने के लिए उठ खड़े हुए । सरस्वती भी शप्त होने के कारण कुछ सिर झुकाकर सावित्री के साथ घर चली । कृष्ण मृगचर्म की रेखा जैसी उज्ज्वल और श्याम अपनी आँखें वह वक्ष पर डाल रही थी । मूर्त्तिमान् शाप के अक्षरों के समान भौंरे उनकी श्वास की सुगन्धि के साथ लग गए, मानो उसे रोक रहे थे । शापजन्य शोक से उसके हाथ शिथिल पड़ गए थे । नीचे की ओर दौड़ती हुई उसके नखों की किरणें मानों उसे मर्त्यलोक में अवतीर्ण होने का मार्ग बतला रही थीं । ब्रह्मलोक में निवास करने