भारतकोश
हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 150 में से

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हिन्द स्वराज फ़र्ज है, यह हमारा धर्म है। अगर लोग एक बार सीख लें कि जो कानून हमें अन्यायी मालूम हो उसे मानना नामर्दगी है, तो हमें किसी का भी जुल्म बाँध नहीं सकता। यही स्वराज्य की कुंजी है। ज्यादा लोग जो कहें उसे थोड़े लोगों को मान लेना चाहिए, यह तो अनीश्वरी बात है, एक वहम है। ऐसी हजारों मिसालें मिलेंगी, जिनमें बहुतों ने जो कहा वह गलत निकला हो और थोड़े लोगों ने जो कहा वह सही निकला हो। सारे सुधार बहुत से लोगों के ख़िलाफ जाकर कुछ लोगों ने ही किसान किसी की तलवार दाखिल करवाए हैं। ठगों के गाँव में अगर बहुत बल के बस न तो कभी से लोग यह कहें कि ठग विद्या सीखनी ही हुए हैं और न होंगे। वे चाहिए, तो क्या कोई साधु ठग बन जाएगा ? तलवार चलाना नहीं हरगिज नहीं। अन्यायी कानून को मानना चाहिए, जानते, न किसी की यह वहम जब तक दूर नहीं होता तब तक हमारी तलवार से वे डरते हैं। वे गुलामी जाने वाली नहीं है और इस वहम को मौत को हमेशा अपना सिर्फ़ सत्याग्रही ही दूर कर सकता है। तकिया बनाकर सोने शरीर बल का उपयोग करना, गोला-बारूद वाली महान प्रजा हैं। काम में लाना, हमारे सत्याग्रह के कानून के उन्होंने मौत का डर छोड़ खिलाफ है। इसका अर्थ तो यह हुआ कि हमें जो दिया है, इसलिए सबका पसंद है वह दूसरे आदमी से हम जबरन करवाना डर छोड़ दिया है। चाहते हैं। अगर यह सही हो तो फिर वह सामने वाला आदमी भी अपनी पसंद का काम हमसे करवाने के लिए हम पर गोला-बारूद चलाने का हकदार है। इस तरह तो हम कभी एक राय पर पहुँचेंगे ही नहीं। कोल्हू के बैल की तरह आँखों पर पट्टी बाँधकर भले ही हम मान लें कि हम आगे बढ़ते हैं, लेकिन दरअसल तो बैल की तरह हम गोल-गोल चक्कर ही काटते रहते हैं। जो लोग ऐसा मानते हैं कि जो कानून खुद को नापसन्द है उसे मानने के लिए आदमी बँधा हुआ नहीं है, उन्हें तो सत्याग्रह को ही सही साधन मानना चाहिए, वरना बड़ा विकट नतीजा आयेगा। पाठक : आप जो कहते हैं उस पर से मुझे लगता है कि सत्याग्रह कमज़ोर आदमियों के लिए काफी काम का है, लेकिन जब वे बलवान बन जाएँ तब तो उन्हें तोप ही चलाना चाहिए। 117