भारतकोश
हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 150 में से

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पृष्ठ 123

हिन्द स्वराज का, झूठी इज्जत का, सगे-सम्बन्धियों का, राज-दरबार का, शरीर को पहुँचने वाली चोटों और मरण का अभय हो, तभी सत्याग्रह का पालन हो सकता है। यह सब करना मुश्किल है, ऐसा मानकर इसे छोड़ नहीं देना चाहिए। जो सिर पर पड़ता है उसे सह लेने की शक्ति कुदरत ने हर मनुष्य को दी है। जिसे देश सेवा न करनी हो, उसे भी ऐसे गुणों का सेवन अभय के बिना तो करना चाहिए। सत्याग्रही की गाड़ी एक इसके सिवा हम यह भी समझ सकते हैं कि जिसे कदम भी आगे नहीं चल हथियार बल पाना होगा, उसे भी इन बातों की ज़रूरत सकती। अभय संपूर्ण रहेगी। रणवीर होना कोई ऐसी बात नहीं कि किसी ने और सब बातों के लिए इच्छा की और तुरन्त रणवीर हो गया। योद्धा को होना चाहिए। जमीन- ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा, भिखारी बनना होगा। जायदाद का, झूठी रण में जिसके भीतर अभय न हो वह लड़ नहीं इज्जत का, सगे- सकता। उस योद्धा को सत्यव्रत का पालन करने की सम्बन्धियों का, राज- उतनी ज़रूरत नहीं है, ऐसा शायद किसी को लगे, दरबार का, शरीर को लेकिन जहाँ अभय है वहाँ सत्य कुदरती तौर पर रहता पहुँचने वाली चोटों और ही है। मनुष्य जब सत्य को छोड़ता है तब किसी तरह मरण का अभय हो, के भय के कारण ही छोड़ता है। तभी सत्याग्रह का पालन इसलिए इन चार गुणों से डर जाने का कोई कारण हो सकता है। नहीं है। फिर तलवारबाज़ को और भी कुछ बेकार कोशिशें करनी पड़ती हैं, जो सत्याग्रही को नहीं करनी पड़तीं। तलवारबाज़ को जो दूसरी कोशिशें करनी पड़ती हैं, उसका कारण भय है। अगर उसमें पूरी निडरता आ जाए तो उसी पल उसके हाथ से तलवार गिर जाएगी। फिर उसे तलवार के सहारे की ज़रूरत नहीं रहती। जिसकी किसी से दुश्मनी नहीं है, उसे तलवार की ज़रूरत ही नहीं है। सिंह के सामने आने वाले एक आदमी के हाथ की लाठी अपने-आप उठ गई। उसने देखा कि अभय का पाठ उसने सिर्फ़ ज़बानी ही किया था। उसने लाठी छोड़ी और वह निर्भय- निडर बना। 122