हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)
Hind Swaraj by Mahatma Gandhi
मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा
हिन्द स्वराज का, झूठी इज्जत का, सगे-सम्बन्धियों का, राज-दरबार का, शरीर को पहुँचने वाली चोटों और मरण का अभय हो, तभी सत्याग्रह का पालन हो सकता है। यह सब करना मुश्किल है, ऐसा मानकर इसे छोड़ नहीं देना चाहिए। जो सिर पर पड़ता है उसे सह लेने की शक्ति कुदरत ने हर मनुष्य को दी है। जिसे देश सेवा न करनी हो, उसे भी ऐसे गुणों का सेवन अभय के बिना तो करना चाहिए। सत्याग्रही की गाड़ी एक इसके सिवा हम यह भी समझ सकते हैं कि जिसे कदम भी आगे नहीं चल हथियार बल पाना होगा, उसे भी इन बातों की ज़रूरत सकती। अभय संपूर्ण रहेगी। रणवीर होना कोई ऐसी बात नहीं कि किसी ने और सब बातों के लिए इच्छा की और तुरन्त रणवीर हो गया। योद्धा को होना चाहिए। जमीन- ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा, भिखारी बनना होगा। जायदाद का, झूठी रण में जिसके भीतर अभय न हो वह लड़ नहीं इज्जत का, सगे- सकता। उस योद्धा को सत्यव्रत का पालन करने की सम्बन्धियों का, राज- उतनी ज़रूरत नहीं है, ऐसा शायद किसी को लगे, दरबार का, शरीर को लेकिन जहाँ अभय है वहाँ सत्य कुदरती तौर पर रहता पहुँचने वाली चोटों और ही है। मनुष्य जब सत्य को छोड़ता है तब किसी तरह मरण का अभय हो, के भय के कारण ही छोड़ता है। तभी सत्याग्रह का पालन इसलिए इन चार गुणों से डर जाने का कोई कारण हो सकता है। नहीं है। फिर तलवारबाज़ को और भी कुछ बेकार कोशिशें करनी पड़ती हैं, जो सत्याग्रही को नहीं करनी पड़तीं। तलवारबाज़ को जो दूसरी कोशिशें करनी पड़ती हैं, उसका कारण भय है। अगर उसमें पूरी निडरता आ जाए तो उसी पल उसके हाथ से तलवार गिर जाएगी। फिर उसे तलवार के सहारे की ज़रूरत नहीं रहती। जिसकी किसी से दुश्मनी नहीं है, उसे तलवार की ज़रूरत ही नहीं है। सिंह के सामने आने वाले एक आदमी के हाथ की लाठी अपने-आप उठ गई। उसने देखा कि अभय का पाठ उसने सिर्फ़ ज़बानी ही किया था। उसने लाठी छोड़ी और वह निर्भय- निडर बना। 122
अब जात-पांत के, ऊंच-नीच के, सम्प्रदायों के भेदभाव भूलकर सब एक हो जाइए। मेल रखिए और निडर बनिए। घर में बैठकर काम करने का समय नहीं है। बीती हुई घड़ियां ज्योतिषी भी नहीं देखता।
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शिक्षा पाठक : आपने इतना सारा कहा, परन्तु उसमें कहीं भी शिक्षा की ज़रूरत तो बताई ही नहीं। हम शिक्षा की कमी की हमेशा शिकायत करते रहते हैं। लाज़िमी तालीम देने का आन्दोलन हम सारे देश में देखते हैं। महाराजा गायकवाड़ ने अपने राज्य में लाज़िमी शिक्षा शुरू की है। उसकी ओर सबका ध्यान गया है। हम उन्हें धन्यवाद देते हैं। यह सारी कोशिश क्या बेकार ही समझनी चाहिए ? संपादक : अगर हम अपनी सभ्यता को सबसे किसान ईमानदारी से अच्छी मानते हैं, तब तो मुझे अफसोस के साथ खुद खेती करके रोटी कहना पड़ेगा कि वह कोशिश ज्यादातर बेकार कमाता है। उसे अपने ही है। महाराजा साहब और हमारे दूसरे धुरन्धर माँ-बाप, अपनी स्त्री के नेता सबको तालीम देने की जो कोशिश कर साथ, बच्चों से कैसे पेश रहे हैं, उसमें उनका हेतु निर्मल है। इसलिए उन्हें आना, जहां वह बसा धन्यवाद ही देना चाहिए, लेकिन उनके हेतु का हुआ है वहाँ उसकी जो नतीजा आने की संभावना है, उसे हम छिपा चाल-ढाल कैसी होनी नहीं सकते। चाहिए, इन सबका उसे काफी ज्ञान है। शिक्षा : तालीम का अर्थ क्या है ? अगर उसका अर्थ सिर्फ़ अक्षर ज्ञान ही हो तो वह तो एक साधन जैसी ही हुई। उसका अच्छा उपयोग भी हो सकता है और बुरा उपयोग भी हो सकता है। एक शस्त्र से चीर-फाड़ करके बीमार को अच्छा किया जा सकता है और वही शस्त्र किसी की जान लेने के लिए भी काम में लाया जा सकता है। अक्षर ज्ञान का भी ऐसा ही है। बहुत से लोग उसका बुरा उपयोग करते हैं, यह तो हम देखते ही हैं। उसका अच्छा उपयोग प्रमाण में कम ही लोग करते हैं। यह बात अगर ठीक है तो इससे यह साबित होता है कि अक्षर-ज्ञान से दुनिया को फायदे के बदले नुकसान ही हुआ है। 125
हिन्द स्वराज शिक्षा का साधारण अर्थ अक्षर ज्ञान ही होता है। लोगों को लिखना, पढ़ना और हिसाब करना सिखाना बुनियादी या प्राथमिक शिक्षा कहलाती है। एक किसान ईमानदारी से खुद खेती करके रोटी कमाता है। उसे मामूली तौर पर दुनियावी ज्ञान है। अपने माँ-बाप के साथ कैसे बरतना, अपनी स्त्री के साथ कैसे बरतना, बच्चों से कैसे पेश आना, जिस देहात में वह बसा हुआ है वहाँ उसकी चाल-ढाल कैसी होनी चाहिए, इन सबका उसे काफी ज्ञान है। तालीम का अर्थ क्या है? अगर उसका अर्थ सिर्फ़ अक्षर ज्ञान ही हो तो वह तो एक साधन जैसी ही हुई। उसका अच्छा उपयोग भी हो सकता है और बुरा उपयोग भी हो सकता है। एक शस्त्र से चीर-फाड़ करके बीमार को अच्छा किया जा सकता है और वही शस्त्र किसी की जान लेने के लिए भी काम में लाया जा सकता है। अक्षर ज्ञान का भी ऐसा ही है। बहुत से लोग उसका बुरा उपयोग करते हैं, यह तो हम देखते ही हैं। उसका अच्छा उपयोग प्रमाण में कम ही लोग करते हैं। वह नीति के नियम समझता है और उनका पालन करता है, लेकिन वह अपने दस्तखत करना नहीं जानता। इस आदमी को आप अक्षर ज्ञान देकर क्या करना चाहते हैं? उसके सुख में आप कौन सी बढ़ोतरी करेंगे? क्या उसकी झोंपड़ी या उसकी हालत के बारे में आप उसके मन में असंतोष पैदा करना चाहते हैं? ऐसा करना हो तो भी उसे अक्षर ज्ञान देने की ज़रूरत नहीं है। पश्चिम के असर के नीचे आकर हमने यह बात चलायी है कि लोगों को शिक्षा देनी चाहिए, लेकिन उसके बारे में हम आगे-पीछे की बात सोचते ही नहीं। अब ऊंची शिक्षा को लें। मैं भूगोल विद्या सीखा, खगोल विद्या सीखा, बीजगणित भी मुझे आ गया, रेखागणित का ज्ञान भी मैंने हासिल किया, भूगर्भ विद्या को भी मैं पी गया, लेकिन उससे क्या? उससे मैंने अपना कौन सा भला किया? अपने आसपास के लोगों का क्या भला किया? किस मकसद से मैंने वह ज्ञान हासिल किया? उससे मुझे क्या फायदा हुआ? एक अंग्रेज विद्वान हक्सले ने शिक्षा के बारे में यों कहा है : “उस आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसके शरीर को ऐसी आदत डाली गई है कि वह 126
हिन्द स्वराज्य उसके बस में रहता है, जिसका शरीर चैन से और आसानी से सौंपा हुआ काम करता है। उस आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसकी बुद्धि शुद्ध, शांत और न्यायदर्शी है। उसने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसका मन कुदरती कानूनों से भरा है और जिसकी इन्द्रियां उसके बस में हैं, जिसके मन की भावनाएँ बिल्कुल शुद्ध हैं, जिसे नीच कामों से नफ़रत है और जो दूसरों को अपने जैसा मानता है। ऐसा आदमी ही सच्चा शिक्षित माना जाएगा, क्योंकि वह कुदरत के कानून के मुताबिक चलता है। कुदरत उसका अच्छा उपयोग करेगी और वह कुदरत का अच्छा उपयोग करेगा। " अगर यही सच्ची शिक्षा हो तो मैं कसम खाकर कहूँगा कि ऊपर जो शास्त्र मैंने गिनाये हैं उनका उपयोग मेरे शरीर या मेरी इन्द्रियों को बस में करने के लिए मुझे नहीं करना पड़ा। इसलिए प्राथमिक शिक्षा को लीजिये या ऊंची शिक्षा को लीजिये, उसका उपयोग मुख्य बात में नहीं होता। उससे हम मनुष्य नहीं बनते, उससे हम अपना कर्तव्य नहीं जान सकते। उस आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसके शरीर को ऐसी आदत डाली गई है कि वह उसके बस में रहता है, जिसका शरीर चैन से और आसानी से सौंपा हुआ काम करता है। पाठक : अगर ऐसा ही है, तो मैं आपसे एक सवाल करूँगा। आप ये जो सारी बातें कह रहे हैं, वह किसकी बदौलत कह रहे हैं? अगर आपने अक्षर ज्ञान और ऊंची शिक्षा नहीं पाई होती, तो ये सब बातें आप मुझे कैसे समझा पाते ? संपादक : आपने अच्छी सुनाई, लेकिन आपके सवाल का मेरा जवाब भी सीधा ही है। अगर मैंने ऊंची या नीची शिक्षा नहीं पाई होती, तो मैं नहीं मानता कि मैं निकम्मा आदमी हो जाता। अब ये बातें कहकर मैं उपयोगी बनने की इच्छा रखता हूँ। ऐसा करते हुए जो कुछ मैंने पढ़ा उसे मैं काम में लाता हूँ और उसका उपयोग, अगर वह उपयोगी हो तो, मैं अपने करोड़ों भाइयों के लिए नहीं कर सकता, सिर्फ़ आप जैसे पढ़े-लिखों के लिए ही कर सकता हूँ। इससे भी मेरी ही बात का समर्थन होता है। मैं और आप दोनों गलत शिक्षा के पंजे में फँस गए थे। उसमें से मैं अपने को मुक्त हुआ मानता हूँ। अब वह 127
हिन्द स्वराज्य अनुभव मैं आपको देता हूँ और उसे देते समय ली हुई शिक्षा का उपयोग करके उसमें रही सड़न मैं आपको दिखाता हूँ। इसके सिवा, आपने जो बात मुझे सुनाई उसमें आप गलती खा गये, क्योंकि मैंने अक्षर ज्ञान को बुरा नहीं कहा है। मैंने तो इतना ही कहा है कि उस ज्ञान की हमें मूर्ति की तरह पूजा नहीं उस ज्ञान की हमें मूर्ति की तरह करनी चाहिए। वह हमारी कामधेनु नहीं है। पूजा नहीं करनी चाहिए। वह वह अपनी जगह पर शोभा दे सकता है और हमारी कामधेनु नहीं है। वह वह जगह यह है : जब मैंने और आपने अपनी जगह पर शोभा दे अपनी इन्द्रियों को बस में कर लिया हो, सकता है और वह जगह यह है : जब हमने नीति की नींव मजबूत बना ली जब मैंने और आपने अपनी हो, तब अगर हमें अक्षर ज्ञान पाने की इन्द्रियों को बस में कर लिया इच्छा हो, तो उसे पाकर हम उसका अच्छा हो, जब हमने नीति की नींव उपयोग कर सकते हैं। वह शिक्षा आभूषण के मजबूत बना ली हो, तब अगर रूप में अच्छी लग सकती है, लेकिन अक्षर हमें अक्षर ज्ञान पाने की इच्छा ज्ञान का अगर आभूषण के तौर पर ही हो, तो उसे पाकर हम उसका उपयोग हो, तो ऐसी शिक्षा को लाज़िमी करने अच्छा उपयोग कर सकते हैं। की हमें ज़रूरत नहीं। हमारे पुराने स्कूल ही वह शिक्षा आभूषण के रूप में काफ़ी हैं। वहां नीति को पहला स्थान दिया अच्छी लग सकती है, लेकिन जाता है। वह सच्ची प्राथमिक शिक्षा है। उस अक्षर ज्ञान का अगर आभूषण पर हम जो इमारत खड़ी करेंगे वह टिक के तौर पर ही उपयोग हो, तो सकेगी। ऐसी शिक्षा को लाज़िमी करने पाठक : तब क्या मेरा यह समझना ठीक है की हमें ज़रूरत नहीं। हमारे पुराने कि आप स्वराज्य के लिए अंग्रेजी शिक्षा का स्कूल ही काफ़ी हैं। कोई उपयोग नहीं मानते ? संपादक : मेरा जवाब ‘हाँ’ और ‘नहीं’ दोनों है। करोड़ों लोगों को अंग्रेजी की शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली, वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी। उसने इसी इरादे से अपनी योजना बनाई थी, ऐसा मैं नहीं सुझाना चाहता, लेकिन उसके काम का नतीजा यही निकला है। यह कितने दुःख की बात है कि हम स्वराज्य की बात भी पराई भाषा में करते हैं? 128
हिन्द स्वराज्य जिस शिक्षा को अंग्रेजों ने ठुकरा दिया है वह हमारा सिंगार बनती है, यह जानने लायक है। उन्हीं के विद्वान कहते रहते हैं कि उसमें यह अच्छा नहीं है, वह अच्छा नहीं है। वे जिसे भूल से गए हैं, उसी से हम अपने अज्ञान के कारण चिपके रहते हैं। उनमें अपनी-अपनी भाषा की उन्नति करने की कोशिश चल रही है। वेल्स इंग्लैण्ड का एक छोटा-सा परगना है, उसकी भाषा धूल जैसी नगण्य है। ऐसी भाषा का अब जीर्णोद्धार हो रहा है। वेल्स के बच्चे वेल्श भाषा में ही बोलें, ऐसी कोशिश वहाँ चल रही हैं। इसमें इंग्लैण्ड के खजांची लॉयड जॉर्ज बड़ा हिस्सा लेते हैं और हमारी दशा कैसी है? हम एक-दूसरे को पत्र लिखते हैं तब गलत अंग्रेजी में लिखते हैं। एक साधारण एम.ए. पास आदमी भी ऐसी गलत अंग्रेजी से बचा नहीं होता। हमारे अच्छे से अच्छे विचार प्रगट करने का ज़रिया है अंग्रेजी, हमारी कांग्रेस का कारोबार भी अंग्रेजी में चलता है। अगर ऐसा लंबे अरसे तक चला तो मेरा मानना है कि आने वाली पीढ़ी हमारा तिरस्कार करेगी और उसका शाप हमारी आत्मा को लगेगा। करोड़ों लोगों को अंग्रेजी की शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली, वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी। उसने इसी इरादे से अपनी योजना बनाई थी, ऐसा मैं नहीं सुझाना चाहता, लेकिन उसके काम का नतीजा यही निकला है। यह कितने दुःख की बात है कि हम स्वराज्य की बात भी पराई भाषा में करते हैं? आपको समझना चाहिए कि अंग्रेजी शिक्षा लेकर हमने अपने राष्ट्र को गुलाम बनाया है। अंग्रेजी शिक्षा से दंभ, राग, जुल्म वगैरह बढ़े हैं। अंग्रेजी शिक्षा पाए हुए लोगों ने प्रजा को ठगने में, उसे परेशान करने में कुछ भी कसर नहीं छोड़ रखी है। अब अगर हम अंग्रेजी शिक्षा पाए हुए लोग उसके लिए कुछ करते हैं, तो उसका हम पर जो कर्ज चढ़ा हुआ है उसका कुछ हिस्सा ही हम अदा करते हैं। यह क्या कम जुल्म की बात है कि अपने देश में अगर मुझे इन्साफ़ पाना हो तो मुझे अंग्रेजी भाषा का उपयोग करना चाहिए। बैरिस्टर होने पर मैं स्वभाषा में बोल ही नहीं सकता ! दूसरे आदमी को मेरे लिए तरजुमा कर देना चाहिए ! यह कुछ कम दंभ है ? यह गुलामी की हद नहीं तो और क्या है ? इसमें मैं अंग्रेजों का दोष निकालूँ या अपना ? हिन्दुस्तान को गुलाम बनाने 129
हिन्द स्वराज वाले तो हम अंग्रेजी जानने वाले लोग ही हैं। राष्ट्र की हाय अंग्रेजों पर नहीं पड़ेगी, बल्कि हम पर पड़ेगी। लेकिन मैंने आपसे कहा कि मेरा जवाब 'हाँ' और 'ना' दोनों है। 'हाँ' कैसे सो मैंने आपको समझाया। अब 'ना' कैसे यह बताता हूँ। हम सभ्यता के रोग में ऐसे फँस गये हैं कि अंग्रेजी शिक्षा अंग्रेजी शिक्षा लेकर हमने अपने बिल्कुल लिये बिना अपना काम चला सकें राष्ट्र को गुलाम बनाया है। ऐसा समय अब नहीं रहा। जिसने वह शिक्षा अंग्रेजी शिक्षा से दंभ, राग, पाई है, वह उसका अच्छा उपयोग करे। जुल्म वगैरह बढ़े हैं। अंग्रेजी अंग्रेजों के साथ के व्यवहार में, ऐसे शिक्षा पाए हुए लोगों ने प्रजा हिन्दुस्तानियों के साथ के व्यवहार में को ठगने में, उसे परेशान करने जिनकी भाषा हम समझ न सकते हों और में कुछ भी कसर नहीं छोड़ अंग्रेज खुद अपनी सभ्यता से कैसे परेशान रखी है। अब अगर हम अंग्रेजी हो गये हैं यह समझने के लिए अंग्रेजी का शिक्षा पाए हुए लोग उसके लिए उपयोग किया जाए। जो लोग अंग्रेजी पढ़े कुछ करते हैं, तो उसका हम पर हुए हैं उनकी संतानों को पहले तो नीति जो कर्ज चढ़ा हुआ है उसका सिखानी चाहिए, उनकी मातृभाषा सिखानी कुछ हिस्सा ही हम अदा करते हैं। चाहिए और हिन्दुस्तान की एक दूसरी भाषा यह क्या कम जुल्म की बात है सिखानी चाहिए। कि अपने देश में अगर मुझे बालक जब पक्की उम्र के हो जाएँ तब इन्साफ़ पाना हो तो मुझे अंग्रेजी भले ही वे अंग्रेजी शिक्षा पाएँ और वह भी भाषा का उपयोग करना चाहिए। उसे मिटाने के इरादे से, न कि उसके जरिये बैरिस्टर होने पर मैं स्वभाषा में पैसे कमाने के इरादे से। ऐसा करते हुए भी बोल ही नहीं सकता! हमें यह सोचना होगा कि अंग्रेजी में क्या सीखना चाहिए और क्या नहीं सीखना चाहिए। कौन से शास्त्र पढ़ने चाहिए, यह भी हमें सोचना होगा। थोड़ा विचार करने से ही हमारी समझ में आ जाएगा कि अगर अंग्रेजी डिग्री लेना हम बन्द कर दें, तो अंग्रेज हाकिम चौंकेंगे। पाठक : तब कैसी शिक्षा दी जाए ? संपादक : उसका जवाब ऊपर कुछ हद तक आ गया है। फिर भी इस सवाल पर हम और विचार करें। मुझे तो लगता है कि हमें अपनी सभी भाषाओं को 130
हिन्द स्वराज्य उज्ज्वल, शानदार बनाना चाहिए। हमें अपनी भाषा में ही शिक्षा लेनी चाहिए, इसके क्या मानी हैं, इसे ज्यादा समझाने का यह स्थान नहीं है। जो अंग्रेजी पुस्तकें काम की हैं, उनका हमें अपनी भाषा में अनुवाद करना होगा। बहुत से शास्त्र सीखने का दंभ और वहम हमें छोड़ना होगा। सबसे पहले तो धर्म की शिक्षा या नीति की शिक्षा दी जानी चाहिए। हर एक पढ़े-लिखे हिन्दुस्तानी हिन्दुस्तान कभी नास्तिक नहीं को अपनी भाषा का, हिन्दू को संस्कृत बनेगा। हिन्दुस्तान की भूमि में का, मुसलमान को अरबी का, पारसी को नास्तिक फल-फूल नहीं सकते। फ़ारसी का और सबको हिन्दी का ज्ञान बेशक, यह काम मुश्किल है। होना चाहिए। कुछ हिन्दुओं को अरबी धर्म की शिक्षा का ख़्याल करते और कुछ मुसलमानों और पारसियों को ही सिर चकराने लगता है। धर्म के संस्कृत सीखनी चाहिए। उत्तरी और आचार्य दंभी और स्वार्थी मालूम पश्चिमी हिन्दुस्तान के लोगों को तमिल होते हैं। उनके पास पहुँचकर हमें सीखनी चाहिए। सारे हिन्दुस्तान के लिए नम्र भाव से उन्हें समझाना होगा। जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होनी उसकी कुंजी मुल्लों, दस्तूरों और चाहिए। उसे उर्दू या नागरी लिपि में ब्राह्मणों के हाथ में है, लेकिन लिखने की छूट रहनी चाहिए। हिन्दू- उनमें अगर सद्बुद्धि पैदा न हो, मुसलमानों के संबंध ठीक रहें, इसलिए तो अंग्रेजी शिक्षा के कारण हममें बहुत से हिन्दुस्तानियों का इन दोनों जो जोश पैदा हुआ है उसका लिपियों को जान लेना जरूरी है। ऐसा होने उपयोग करके हम लोगों को नीति से हम आपस के व्यवहार से अंग्रेजी को की शिक्षा दे सकते हैं। यह कोई निकाल सकेंगे। बहुत मुश्किल बात नहीं है। और यह सब किसके लिए जरूरी है? हिन्दुस्तानी सागर के किनारे पर ही हम जो गुलाम बन गये हैं उनके लिए। मैल जमा है। उस मैल से जो गंदे हमारी गुलामी की वजह से देश की प्रजा हो गये हैं उन्हें साफ होना है। गुलाम बनी है। अगर हम गुलामी से छूट जाएँ, तो प्रजा तो छूट ही जाएगी। पाठक : आपने जो धर्म की शिक्षा की बात कही वह बड़ी कठिन है। संपादक : फिर भी उसके बिना हमारा काम नहीं चल सकता। हिन्दुस्तान कभी नास्तिक नहीं बनेगा। हिन्दुस्तान की भूमि में नास्तिक फल-फूल नहीं 131
हिन्द स्वराज्य सकते। बेशक, यह काम मुश्किल है। धर्म की शिक्षा का ख़्याल करते ही सिर चकराने लगता है। धर्म के आचार्य दंभी और स्वार्थी मालूम होते हैं। उनके पास पहुँचकर हमें नम्र भाव से उन्हें समझाना होगा। उसकी कुंजी मुल्लों, दस्तूरों और ब्राह्मणों के हाथ में है, लेकिन उनमें अगर सद्बुद्धि पैदा न हो, तो अंग्रेजी शिक्षा के कारण हममें जो जोश पैदा हुआ है उसका उपयोग करके हम लोगों को नीति की शिक्षा दे सकते हैं। यह कोई बहुत मुश्किल बात नहीं है। हिन्दुस्तानी सागर के किनारे पर ही मैल जमा है। उस मैल से जो गंदे हो गये हैं उन्हें साफ होना है। हम लोग ऐसे ही हैं और खुद ही बहुत कुछ साफ हो सकते हैं। मेरी यह टीका करोड़ों लोगों के बारे में नहीं है। हिन्दुस्तान को असली रास्ते पर लाने के लिए हमें ही असली रास्ते पर आना होगा। बाकी करोड़ों लोग तो असली रास्ते पर ही हैं। उसमें सुधार, बिगाड़, उन्नति, अवनति समय के अनुसार होते ही रहेंगे। पश्चिम की सभ्यता को निकाल बाहर करने की ही हमें कोशिश करनी चाहिए। दूसरा सब अपने-आप ठीक हो जाएगा। 132
आत्म विश्वास रावण जैसा नहीं होना चाहिए जो समझता था कि मेरी बराबरी का कोई है नहीं। आत्म विश्वास होना चाहिए विभीषण जैसा, प्रह्लाद जैसा। उनके जी में यह भाव था कि हम निर्बल हैं मगर ईश्वर हमारे साथ है और हमारी शक्ति अनन्त है। 133
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मशीनें पाठक : आप पश्चिम की सभ्यता को निकाल बाहर करने की बात कहते हैं, तब तो आप यह भी कहेंगे कि हमें कोई भी मशीन नहीं चाहिए। संपादक : मुझे जो चोट लगी थी उसे यह सवाल करके आपने ताजा कर दिया है। मि. रमेशचन्द्र दत्त की पुस्तक 'हिन्दुस्तान का आर्थिक इतिहास' जब मैंने पढ़ी, तब भी मेरी ऐसी हालत हो गई थी। उसका फिर से विचार करता हूँ, तो मेरा दिल भर आता है। मशीन की झपट लगने से ही हिन्दुस्तान पामाल हो गया है। मैन्चेस्टर ने मुम्बई की मिलों में हमें जो नुकसान पहुँचाया है, उसकी तो कोई हद ही जो मजदूर काम करते नहीं है। हिन्दुस्तान से कारीगरी जो क़रीब-क़रीब खत्म हैं, वे गुलाम बन गए हो गई, वह मैन्चेस्टर का ही काम है। हैं, जो औरतें उनमें लेकिन मैं भूलता हूँ। मैन्चेस्टर को दोष कैसे दिया काम करती हैं, उनकी जा सकता है? हमने उसके कपड़े पहने तभी तो उसने हालत देखकर कोई कपड़े बनाए। बंगाल की बहादुरी का वर्णन जब मैंने भी काँप उठेगा। जब पढ़ा तब मुझे हर्ष हुआ। बंगाल में कपड़े की मिलें नहीं मिलों की वर्षा नहीं हैं, इसलिए लोगों ने अपना असली धंधा फिर से हाथ हुई थी तब वे औरतें में ले लिया। बंगाल मुम्बई की मिलों को बढ़ावा देता भूखों नहीं मरती थीं। है वह ठीक ही है, लेकिन अगर बंगाल ने तमाम मशीनों से परहेज किया होता, उनका बहिष्कार किया होता तो और भी अच्छा होता। मशीनें यूरोप को उजाड़ने लगी हैं और वहाँ की हवा अब हिन्दुस्तान में चल रही है। यंत्र आज की सभ्यता की मुख्य निशानी हैं और वह महापाप है, ऐसा मैं तो साफ देख सकता हूँ। मुम्बई की मिलों में जो मजदूर काम करते हैं, वे गुलाम बन गये हैं, जो औरतें उनमें काम करती हैं, उनकी हालत देखकर कोई भी काँप उठेगा। जब मिलों की वर्षा नहीं हुई थी तब वे औरतें भूखों नहीं मरती थीं। मशीन की यह हवा अगर ज्यादा चली, तो हिन्दुस्तान की बुरी दशा होगी। मेरी बात आपको कुछ मुश्किल मालूम होती होगी, लेकिन मुझे कहना चाहिए कि हम हिन्दुस्तान में मिलें कायम करें, उसके बजाय हमारा भला इसी में है कि हम 135
हिन्द स्वराज्य मैन्वेस्टर को और भी रुपये भेजकर उसका सड़ा हुआ कपड़ा काम में लें, क्यों कि उसका कपड़ा काम में लेने से सिर्फ़ हमारे पैसे ही जाएँगे। हिन्दुस्तान में अगर हम मैन्चेस्टर कायम करेंगे तो पैसा हिन्दुस्तान में ही रहेगा, लेकिन वह पैसा हमारा खून चूसेगा, क्योंकि वह हमारी नीति को बिल्कुल खत्म कर देगा। जो लोग मिलों में काम करते हैं उनकी नीति कैसी है, यह उन्हीं से पूछा जाए। उनमें से जिन्होंने रुपये जमा किये हैं, उनकी नीति दूसरे पैसे वालों से अच्छी नहीं हो सकती। अमेरिका के रॉकफेलर से हिन्दुस्तान के रॉकफेलर कुछ कम हैं, ऐसा मानना निरा अज्ञान है। गरीब हिन्दुस्तान तो गुलामी से छूट सकेगा, लेकिन अनीति से पैसे वाला बना हुआ हिन्दुस्तान गुलामी से कभी नहीं छूटेगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि अंग्रेजी राज्य को यहाँ टिकाये रखने वाले ये धनवान लोग ही हैं। ऐसी स्थिति में ही उनका स्वार्थ सधेगा। पैसा आदमी को दीन बना देता है। ऐसी दूसरी चीज दुनिया में विषय योग है। ये दोनों विषय विषमयं हैं। जब पैसा या विषय काटता है तब वह शरीर, ज्ञान, मन सब कुछ ले लेता है। मुझे तो लगता है कि हमें यह स्वीकार करना होगा कि अंग्रेजी राज्य को यहाँ टिकाये रखने वाले ये धनवान लोग ही हैं। ऐसी स्थिति में ही उनका स्वार्थ सधेगा। पैसा आदमी को दीन बना देता है। ऐसी दूसरी चीज दुनिया में विषय योग है। ये दोनों विषय विषमयं हैं। उनका डंक साँप के डंक से ज्यादा ज़हरीला है। जब साँप काटता है तो हमारा शरीर लेकर हमें छोड़ देता है। जब पैसा या विषय काटता है तब वह शरीर, ज्ञान, मन सब कुछ ले लेता है, तो भी हमारा छुटकारा नहीं होता। इसलिए हमारे देश में मिलें कायम हों, इसमें खुश होने जैसा कुछ नहीं है। पाठक : तब क्या मिलों को बन्द कर दिया जाए ? संपादक : यह बात मुश्किल है। जो चीज स्थायी या मजबूत हो गई है, उसे निकालना मुश्किल है। इसीलिए काम शुरू न करना पहली बुद्धिमानी है। मिल मालिकों की ओर हम नफ़रत की निगाह से नहीं देख सकते। हमें उन पर दया करनी चाहिए। वे यकायक मिलें छोड़ दें, यह तो मुश्किल नहीं है, लेकिन हम उनसे ऐसी बिनती कर सकते हैं कि वे अपने इस साहस को बढ़ाएँ नहीं। अगर वे देश का भला करना चाहें, तो खुद अपना काम धीरे-धीरे कम कर सकते हैं। वे खुद पुराने, प्रौढ़, पवित्र चरखे देश के हजारों घरों में दाखिल कर सकते हैं और लोगों का बुना हुआ कपड़ा लेकर उसे बेच सकते हैं। 136
हिन्द स्वराज्य अगर वे ऐसा न करें तो भी लोग खुद मशीनों का कपड़ा इस्तेमाल करना बन्द कर सकते हैं। पाठक : यह तो कपड़े के बारे में हुआ, लेकिन यंत्र की बनी तो अनेक चीजें हैं। वे चीजें या तो हमें परदेस से लेनी होंगी या ऐसे यंत्र हमारे देश में दाखिल करने होंगे। संपादक : सचमुच हमारे देव (मूर्तियाँ) भी जर्मनी के यंत्रों में बनकर आते हैं, तो फिर दियासिलाई या ऑलपिन से लेकर काँच के झाड़-फानूस की तो बात ही क्या ? मेरा अपना जवाब तो एक ही है। जब ये सब चीजें यंत्र से नहीं बनती थीं तब हिन्दुस्तान क्या करता था ? वैसा ही वह आज भी कर सकता है। जब तक हम हाथ से ऑलपिन नहीं बनायेंगे तब तक उसके बिना हम अपना काम चला लेंगे। झाड़- फानूस को आग लगा देंगे। मिट्टी के दीये में तेल डालकर और हमारे खेत में पैदा हुई रुई की बत्ती बनाकर दीया जलाएँगे। ऐसा करने से हमारी आँखें खराब होने से बचेंगी, पैसे बचेंगे और हम स्वदेशी रहेंगे, बनेंगे और स्वराज्य की धूनी जगाएँगे। एक ही समय में कुछ लोग यंत्र की सब चीजें छोड़ देंगे, यह संभव नहीं है, लेकिन अगर यह विचार सही होगा, तो हम हमेशा शोध-खोज करते रहेंगे और हमेशा थोड़ी-थोड़ी चीजें छोड़ते जाएँगे। अगर हम ऐसा करेंगे तो दूसरे लोग भी ऐसा करेंगे। पहले तो यह विचार जड़ पकड़े यह जरूरी है, बाद में उसके मुताबिक काम होगा। पहले एक ही आदमी करेगा। यह सारा काम सब लोग एक ही समय में करेंगे या एक ही समय में कुछ लोग यंत्र की सब चीजें छोड़ देंगे, यह संभव नहीं है, लेकिन अगर यह विचार सही होगा, तो हम हमेशा शोध-खोज करते रहेंगे और हमेशा थोड़ी-थोड़ी चीजें छोड़ते जाएँगे। अगर हम ऐसा करेंगे तो दूसरे लोग भी ऐसा करेंगे। पहले तो यह विचार जड़ पकड़े यह जरूरी है, बाद में उसके मुताबिक काम होगा। पहले एक ही आदमी करेगा, फिर दस, फिर सौ-यों नारियल की कहानी की तरह लोग बढ़ते ही जाएँगे। बड़े लोग जो काम करते हैं, उसे छोटे भी करते हैं और करेंगे। समझें तो बात छोटी और सरल है। आपको और मुझे दूसरों के करने की राह नहीं देखना है। हम तो ज्यों ही समझ लें त्यों ही उसे शुरू कर दें। जो नहीं करेगा वह खोएगा। समझते हुए भी जो नहीं करेगा, वह निरा दंभी कहलायेगा। 137
हिन्द स्वराज पाठक : ट्रॉमगाड़ी और बिजली की बत्ती का क्या होगा ? संपादक : यह सवाल आपने बहुत देर से किया। इस सवाल में अब कोई जान नहीं रही। रेल ने अगर हमारा नाश किया है, तो क्या ट्रॉम नहीं करती ? यंत्र तो साँप का ऐसा बिल है, जिसमें एक नहीं बल्कि सैकड़ों साँप होते हैं। एक के पीछे दूसरा लगा ही रहता है। जहाँ यंत्र होंगे वहाँ बड़े शहर होंगे। जहाँ बड़े शहर होंगे वहाँ ट्रॉमगाड़ी और रेलगाड़ी होगी, वहीं बिजली की बत्ती की ज़रूरत रहती है। आप जानते होंगे कि विलायत में भी देहातों में बिजली की बत्ती या ट्रॉम नहीं है। प्रामाणिक वैद्य और डॉक्टर आपको बताएँगे कि जहाँ रेलगाड़ी, ट्रॉमगाड़ी वगैरह साधन बढ़े हैं, वहाँ लोगों की तन्दुरुस्ती गिरी हुई होती है। मुझे याद है कि यूरोप के एक शहर में जब पैसे की तंगी हो गई थी तब ट्रॉमों, वकीलों और डॉक्टरों की आमदनी घट गयी थी, लेकिन लोग तन्दुरुस्त हो गये थे। यंत्र का गुण तो मुझे एक भी याद नहीं आता, जबकि उसके अवगुणों से मैं पूरी किताब लिख सकता हूँ। पाठक : यह सारा लिखा हुआ यंत्र की मदद से छापा जाएगा और उसकी मदद से बाँटा जाएगा, यह यंत्र का गुण है या अवगुण ? संपादक : यह ‘जहर की दवा जहर है’ की मिसाल है। इसमें यंत्र का कोई गुण नहीं है। यंत्र मरते-मरते कह जाता है कि ‘मुझसे बचिये, होशियार रहिए, मुझसे आपको कोई फायदा नहीं होने का।’ अगर ऐसा कहा जाए कि यंत्र ने इतनी ठीक कोशिश की, तो यह भी उन्हीं के लिए लागू होता है जो यंत्र की जाल में फँसे हुए हैं। लेकिन मूल बात न भूलिएगा। मन में यह तय कर लेना चाहिए कि यंत्र खराब चीज है। बाद में हम उसका धीरे-धीरे नाश करेंगे। ऐसा कोई सरल रास्ता कुदरत ने ही बनाया नहीं है कि जिस चीज़ की हमें इच्छा हो वह तुरन्त मिल जाए। यंत्र के ऊपर हमारी मीठी नज़र के बजाय जहरीली नज़र पड़ेगी तो आख़िर वह जाएगा ही। 138
भारत में यदि कोई ग्रंथ झोंपड़ियों से महलों तक में स्थान पा सका है, तो वह तुलसीकृत रामायण है। भारतीय संस्कृति को अगर एक शब्द में वर्णित करना हो, तो वह शब्द है 'राम'।
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छुटकारा पाठक : आपके विचारों से ऐसा लगता है कि आप एक तीसरा ही पक्ष कायम करना चाहते हैं। आप एक्स्ट्रीमिस्ट भी नहीं हैं और मॉडरेट भी नहीं हैं। संपादक : यहाँ आपकी भूल होती है। मेरे मन में तीसरे पक्ष का कोई ख़्याल नहीं है। सबके विचार एक से नहीं रहते। मॉडरेटों में भी सब एक ही विचार के हैं, ऐसा नहीं मानना चाहिए। जिसे लोगों की सेवा ही करनी है, उसके लिए पक्ष जो लोग उनके दबाव से चुप रहे कैसा ? मैं तो मॉडरेटों की सेवा करूँगा और होंगे वे लड़ेंगे, फोड़े को एक्स्ट्रीमिस्टों की भी करूँगा। जहाँ उनके दबाकर रखने से कोई फायदा विचार से मेरी राय अलग पड़ेगी वहाँ मैं नहीं। उसे तो फूटना ही चाहिए। उन्हें नम्रता से बताऊंगा और अपना काम इसलिये अगर हमारे भाग्य में करता चलूँगा। आपस में लड़ना ही लिखा होगा पाठक : अगर आप दोनों से कहना चाहें तो तो हम लड़ मरेंगे। उसमें कमजोर क्या कहेंगे ? को बचाने के बहाने किसी दूसरे संपादक : एक्स्ट्रीमिस्टों से मैं कहूँगा कि को बीच में पड़ने की ज़रूरत आपका हेतु हिन्दुस्तान के लिए स्वराज्य नहीं है। इसी से तो हमारा हासिल करने का है। स्वराज्य आपकी सत्यानाश हुआ है। इस तरह कोशिश से मिलने वाला नहीं है। स्वराज्य कमज़ोर को बचाना उसे और तो सबको अपने लिए पाना चाहिए और भी कमज़ोर बनाने जैसा है। सबको उसे अपना बनाना चाहिए। दूसरे मॉडरेटों को इस बात पर अच्छी लोग जो स्वराज्य दिला दें वह स्वराज्य नहीं तरह विचार करना चाहिए। है, बल्कि परराज्य है। इसलिए सिर्फ़ अंग्रेजों को बाहर निकाला कि आपने स्वराज्य पा लिया, ऐसा अगर आप मानते हों तो वह ठीक नहीं है। सच्चा स्वराज्य जो मैंने पहले बताया वही होना चाहिए। उसे आप गोला-बारूद से कभी नहीं पायेंगे। गोला-बारूद हिन्दुस्तान को सधेगा नहीं। इसलिए सत्याग्रह पर ही भरोसा रखिए। मन में ऐसा शक भी पैदा न 141