भारतकोश
हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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हिन्द स्वराज्य की तब गोकशी बढ़ी। मेरी राय है कि गोरक्षा प्रचारिणी सभा गोवध प्रचारिणी सभा मानी जानी चाहिए। ऐसी सभा का होना हमारे लिए बदनामी की बात है। जब गाय की रक्षा करना हम भूल गये तब ऐसी सभा की ज़रूरत पड़ी होगी। मेरा भाई गाय को मारने दौड़े, तो मैं उसके साथ कैसा बरताव करूँगा? उसे मारूँगा या उसके पैरों में पड़ूँगा? अगर आप कहें कि मुझे उसके पाँव पड़ना चाहिए, तो मुझे मुसलमान भाई के भी पाँव पड़ना चाहिए। गाय को दुःख देकर हिन्दू गाय का वध हिन्दू-मुसलमान दोनों जोश में करता है, इससे गाय को कौन छुड़ाता है? जो आते हैं तब अक्सर गलत हिन्दू गाय की औलाद को पैना (आर) भोंकता काम कर बैठते हैं। उन्हें हमें है, उस हिन्दू को कौन समझाता है? इससे सहन करना होगा, लेकिन हमारे एक राष्ट्र होने में कोई रुकावट नहीं ऐसी तकरार को भी बड़ी आई है। वकालत बघारकर हम अंग्रेजों अंत में, हिन्दू अहिंसक और मुसलमान की अदालत में न ले जाएँ। हिंसक है, यह बात अगर सही हो तो अहिंसक दो आदमी लड़ें लड़ाई में का धर्म क्या है? अहिंसक को आदमी की दोनों के सिर या एक का सिर हिंसा करनी चाहिए, ऐसा कहीं लिखा नहीं है। फूटे तो उसमें तीसरा क्या अहिंसक के लिए तो राह सीधी है। उसे एक न्याय करेगा? को बचाने के लिए दूसरे की हिंसा करनी ही नहीं चाहिए। उसे तो मात्र चरण-वंदना करनी चाहिए, सिर्फ़ समझाने का काम करना चाहिए। इसी में उसका पुरुषार्थ है। लेकिन क्या तमाम हिन्दू अहिंसक हैं? सवाल की जड़ में जाकर विचार करने पर मालूम होता है कि कोई भी अहिंसक नहीं है, क्योंकि जीव को तो हम मारते ही हैं, लेकिन इस हिंसा से हम छूटना चाहते हैं, इसलिए अहिंसक कहलाते हैं। साधारण विचार करने से मालूम होता है कि बहुत से हिन्दू माँस खाने वाले हैं, इसलिए वे अहिंसक नहीं माने जा सकते। खींचतान कर दूसरा अर्थ करना हो तो मुझे कुछ कहना नहीं है। जब ऐसी हालत है तब मुसलमान हिंसक और हिन्दू अहिंसक हैं, इसलिए दोनों की नहीं बनेगी, वह सोचना बिल्कुल गलत है। ऐसे विचार स्वार्थी धर्म शिक्षकों, शास्त्रियों और मुल्लाओं ने हमें दिये हैं और इसमें जो कमी रह गई थी, उसे अंग्रेजों ने पूरा किया है। उन्हें इतिहास 68