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हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

हिन्द स्वराज्य की तब गोकशी बढ़ी। मेरी राय है कि गोरक्षा प्रचारिणी सभा गोवध प्रचारिणी सभा मानी जानी चाहिए। ऐसी सभा का होना हमारे लिए बदनामी की बात है। जब गाय की रक्षा करना हम भूल गये तब ऐसी सभा की ज़रूरत पड़ी होगी। मेरा भाई गाय को मारने दौड़े, तो मैं उसके साथ कैसा बरताव करूँगा? उसे मारूँगा या उसके पैरों में पड़ूँगा? अगर आप कहें कि मुझे उसके पाँव पड़ना चाहिए, तो मुझे मुसलमान भाई के भी पाँव पड़ना चाहिए। गाय को दुःख देकर हिन्दू गाय का वध हिन्दू-मुसलमान दोनों जोश में करता है, इससे गाय को कौन छुड़ाता है? जो आते हैं तब अक्सर गलत हिन्दू गाय की औलाद को पैना (आर) भोंकता काम कर बैठते हैं। उन्हें हमें है, उस हिन्दू को कौन समझाता है? इससे सहन करना होगा, लेकिन हमारे एक राष्ट्र होने में कोई रुकावट नहीं ऐसी तकरार को भी बड़ी आई है। वकालत बघारकर हम अंग्रेजों अंत में, हिन्दू अहिंसक और मुसलमान की अदालत में न ले जाएँ। हिंसक है, यह बात अगर सही हो तो अहिंसक दो आदमी लड़ें लड़ाई में का धर्म क्या है? अहिंसक को आदमी की दोनों के सिर या एक का सिर हिंसा करनी चाहिए, ऐसा कहीं लिखा नहीं है। फूटे तो उसमें तीसरा क्या अहिंसक के लिए तो राह सीधी है। उसे एक न्याय करेगा? को बचाने के लिए दूसरे की हिंसा करनी ही नहीं चाहिए। उसे तो मात्र चरण-वंदना करनी चाहिए, सिर्फ़ समझाने का काम करना चाहिए। इसी में उसका पुरुषार्थ है। लेकिन क्या तमाम हिन्दू अहिंसक हैं? सवाल की जड़ में जाकर विचार करने पर मालूम होता है कि कोई भी अहिंसक नहीं है, क्योंकि जीव को तो हम मारते ही हैं, लेकिन इस हिंसा से हम छूटना चाहते हैं, इसलिए अहिंसक कहलाते हैं। साधारण विचार करने से मालूम होता है कि बहुत से हिन्दू माँस खाने वाले हैं, इसलिए वे अहिंसक नहीं माने जा सकते। खींचतान कर दूसरा अर्थ करना हो तो मुझे कुछ कहना नहीं है। जब ऐसी हालत है तब मुसलमान हिंसक और हिन्दू अहिंसक हैं, इसलिए दोनों की नहीं बनेगी, वह सोचना बिल्कुल गलत है। ऐसे विचार स्वार्थी धर्म शिक्षकों, शास्त्रियों और मुल्लाओं ने हमें दिये हैं और इसमें जो कमी रह गई थी, उसे अंग्रेजों ने पूरा किया है। उन्हें इतिहास 68

हिन्द स्वराज लिखने की आदत है, हर एक जाति के रीति-रिवाज जानने का वे दंभ करते हैं। ईश्वर ने हमारा मन तो छोटा बनाया है, फिर भी वे ईश्वरी दावा करते आये हैं और तरह-तरह के प्रयोग करते हैं। वे अपने बाजे खुद बजाते हैं और हमारे मन में अपनी बात सही होने का विश्वास जमाते हैं। हम भोलेपन में उस सब पर भरोसा कर लेते हैं। जो टेढ़ा नहीं देखना चाहते वे देख सकेंगे कि कुरान शरीफ़ में ऐसे सैकड़ों वचन हैं, जो हिन्दुओं को मान्य हों, भगवद् गीता में ऐसी बातें लिखी हैं कि जिनके ख़िलाफ गाय को दुःख देकर मुसलमान को कोई भी ऐतराज नहीं हो सकता। हिन्दू गाय का वध करता कुरान शरीफ़ का कुछ भाग मैं न समझ पाऊँ या है, इससे गाय को कौन कुछ भाग मुझे पसंद न आए, इस वजह से क्या मैं छुड़ाता है? जो हिन्दू गाय उसे मानने वाले से नफ़रत करूँ? झगड़ा दो से ही की औलाद को पैना हो सकता है। मुझे झगड़ा नहीं करना हो तो (आर) भोंकता है, उस मुसलमान क्या करेगा? और मुसलमान को झगड़ा हिन्दू को कौन समझाता न करना हो तो मैं क्या कर सकता हूँ? हवा में हाथ है? इससे हमारे एक राष्ट्र उठाने वाले का हाथ उखड़ जाता है। सब अपने- होने में कोई रुकावट अपने धर्म का स्वरूप समझकर उससे चिपके रहें नहीं आई है। और शास्त्रियों तथा मुल्लाओं को बीच में न आने दें तो झगड़े का मुँह हमेशा के लिए काला ही रहेगा। पाठक : अंग्रेज दोनों क़ौमों का मेल होने देंगे? संपादक : यह सवाल डरपोक आदमी का है। यह सवाल हमारी हीनता को दिखाता है। अगर दो भाई चाहते हों कि उनका आपस में मेल बना रहे, तो कौन उनके बीच में आ सकता है? अगर तीसरा आदमी दोनों के बीच झगड़ा पैदा कर सके, तो उन भाइयों को हम कच्चे दिल के कहेंगे। उसी तरह अगर हम हिन्दू और मुसलमान कच्चे दिल के होंगे, तो फिर अंग्रेजों का कुसूर निकालना बेकार होगा। कच्चा घड़ा एक कंकड़ से नहीं तो दूसरे कंकड़ से फूटेगा ही। घड़े को बचाने का रास्ता यह नहीं है कि उसे कंकड़ से दूर रखा जाए, बल्कि यह है कि उसे पक्का बनाया जाए, जिससे कंकड़ का भय ही न रहे। उसी तरह हमें पक्के दिल के बनना है। हम दोनों में से कोई एक भी 69

हिन्द स्वराज

पक्के दिल के होंगे, तो तीसरे की कुछ नहीं चलेगी। यह काम हिन्दू आसानी से कर सकते हैं। उनकी संख्या बड़ी है, वे अपने को ज्यादा पढ़े-लिखे मानते हैं, इसलिए वे पक्का दिल रख सकते हैं। दोनों क़ौमों के बीच अविश्वास है, अगर दो भाई चाहते हों कि इसलिए मुसलमान लॉर्ड मॉर्ले से कुछ हक उनका आपस में मेल बना रहे, माँगते हैं। इसमें हिन्दू क्यों विरोध करें? तो कौन उनके बीच में आ अगर हिन्दू विरोध न करें तो अंग्रेज चौंकेंगे, सकता है ? अगर तीसरा आदमी मुसलमान धीरे-धीरे हिन्दुओं का भरोसा दोनों के बीच झगड़ा पैदा कर करने लगेंगे और दोनों का भाईचारा बढ़ेगा। सके, तो उन भाइयों को हम अपने झगड़े अंग्रेजों के पास ले जाने में हमें कच्चे दिल के कहेंगे। उसी तरह शरमाना चाहिए। ऐसा करने से हिन्दू कुछ अगर हम हिन्दू और मुसलमान खोने वाले नहीं हैं, इसका हिसाब आप खुद कच्चे दिल के होंगे, तो फिर लगा सकेंगे। जिस आदमी ने दूसरे पर अंग्रेजों का कुसूर निकालना विश्वास किया, उसने आज तक कुछ खोया बेकार होगा। कच्चा घड़ा एक नहीं है। कंकड़ से नहीं तो दूसरे कंकड़ मैं यह नहीं कहना चाहता कि हिन्दू- से फूटेगा ही। घड़े को बचाने मुसलमान कभी झगड़ेंगे ही नहीं। दो भाई का रास्ता यह नहीं है कि उसे साथ रहें तो उनके बीच तकरार होती है। कंकड़ से दूर रखा जाए। कभी हमारे सिर भी फूटेंगे। ऐसा होना ज़रूरी नहीं है, लेकिन सब लोग एक सी अक्ल के नहीं होते। दोनों जोश में आते हैं तब अक्सर गलत काम कर बैठते हैं। उन्हें हमें सहन करना होगा, लेकिन ऐसी तकरार को भी बड़ी वकालत बघारकर हम अंग्रेजों की अदालत में न ले जाएँ। दो आदमी लड़ें, लड़ाई में दोनों के सिर या एक का सिर फूटे तो उसमें तीसरा क्या न्याय करेगा ? जो लड़ेंगे वे जख्मी भी होंगे। बदन से बदन टकरायेगा तब कुछ निशानी तो रहेगी ही। उसमें न्याय क्या हो सकता है?

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न्याय की अदालतों से भी एक बड़ी अदालत होती है। वह अदालत अंतर की आवाज़ की है और वह अन्य सब अदालतों से ऊपर की अदालत है।

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हिन्दुस्तान की दशा-चार पाठक : आप कहते हैं कि दो आदमी झगड़ें तब उसका न्याय भी नहीं कराना चाहिए। यह तो आपने अजीब बात कही। संपादक : इसे अजीब कहिये या दूसरा कोई विशेषण लगाइये, पर बात सही है। आपकी शंका हमें वकील-डॉक्टरों की पहचान कराती है। मेरी राय है कि वकीलों ने हिन्दुस्तान को गुलाम बनाया है, हिन्दू-मुसलमानों के झगड़े बढ़ाये हैं और अंग्रेजी हुकूमत को यहाँ मजबूत किया है। पाठक : ऐसे इल्जाम लगाना आसान है, लेकिन उन्हें साबित करना मुश्किल होगा। वकीलों के सिवा दूसरा कौन हमें आजादी का मार्ग बताता ? उनके सिवा गरीबों का बचाव कौन करता ? उनके सिवा कौन हमें न्याय दिलाता ? देखिये, स्व. मनमोहन घोष ने कितनों को बचाया ? खुद एक कौड़ी भी उन्होंने नहीं ली। कांग्रेस, जिसके आपने ही बखान किये हैं, वकीलों से निभती है और उनकी मेहनत से ही उसमें काम होते हैं। इस वर्ग की आप निंदा करें, यह इन्साफ़ के साथ गैर इन्साफ़ करने जैसा है। वह तो आपके हाथ में अखबार आया इसलिए चाहे जो बोलने की छूट लेने जैसा लगता है। [बाजू का बॉक्स:] हिन्दू-मुसलमान आपस में लड़े हैं। तटस्थ आदमी उनसे कहेगा कि आप गयी-बीती को भूल जाएँ, इसमें दोनों का क़ुसूर रहा होगा। अब दोनों मिलकर रहिए, लेकिन वे वकील के पास जाते हैं। वकील का फ़र्ज़ हो जाता है कि वह मुवक्किल की ओर ज़ोर लगाए। अगर वह ऐसा नहीं करता तो माना जाएगा कि वह अपने पेशे को बट्टा लगाता है। इसलिए वकील तो आमतौर पर झगड़ा आगे बढ़ाने की ही संपादक : जैसा आप मानते हैं वैसा ही मैं भी एक समय मानता था। वकीलों ने कभी कोई अच्छा काम नहीं किया, ऐसा मैं आपसे नहीं कहना चाहता। मि. मनमोहन घोष की मैं इज़्ज़त करता हूँ। उन्होंने गरीबों की मदद की थी यह बात सही है। कांग्रेस में वकीलों ने कुछ काम किया है, यह भी हम मान सकते हैं। वकील भी आखिर मनुष्य हैं और मनुष्य जाति में कुछ तो अच्छाई है ही। वकीलों की भलमनसी के जो बहुत से किस्से देखने में 73

हिन्द स्वराज्य आते हैं, वे तभी हुए जब वे अपने को वकील समझना भूल गये। मुझे तो आपको सिर्फ़ यही दिखाना है कि उनका धंधा उन्हें अनीति सिखाने वाला है। वे बुरे लालच में फँसते हैं, जिसमें से उबरने वाले बिरले ही होते हैं। हिन्दू-मुसलमान आपस में लड़े हैं। तटस्थ आदमी उनसे कहेगा कि आप गयी-बीती को भूल जाएँ, इसमें दोनों का क़सूर रहा होगा। अब दोनों मिलकर रहिये, लेकिन वे वकील के पास जाते हैं। वकील का फ़र्ज़ हो जाता है कि वह मुवक्किल की ओर जोर लगाए। मुवक्किल के ख़्याल में भी न हों ऐसी दलीलें मुवक्किल की ओर से ढूँढना वकील का काम है। अगर ये अदालतें लोगों के भले के लिए नहीं हैं। जिन्हें अपनी सत्ता कायम रखनी है, वे अदालतों के ज़रिये लोगों को बस में रखते हैं। लोग अगर खुद अपने झगड़े निबटा लें, तो तीसरा आदमी उन पर अपनी सत्ता नहीं जमा सकता। सचमुच जब लोग खुद मार-पीट करके या रिश्तेदारों को पंच बनाकर अपना झगड़ा निबटा लेते थे तब वे बहादुर थे। अदालतें आयीं और वे कायर बन गए। वह ऐसा नहीं करता तो माना जाएगा कि वह अपने पेशे को बट्टा लगाता है। इसलिए वकील तो आमतौर पर झगड़ा आगे बढ़ाने की ही सलाह देगा। लोग दूसरों का दुःख दूर करने के लिए नहीं, बल्कि पैसा पैदा करने के लिए वकील बनते हैं। वह एक कमाई का रास्ता है। इसलिए वकील का स्वार्थ झगड़ा बढ़ाने में है। यह तो मेरी जानी हुई बात है कि जब झगड़े होते हैं तब वकील खुश होते हैं। मुख्तार लोग भी वकील की जात के हैं। जहाँ झगड़े नहीं होते वहाँ भी वे झगड़े खड़े करते हैं। उनके दलाल जोंक की तरह गरीब लोगों से चिपकते हैं और उनका खून चूस लेते हैं। वह पेशा ऐसा है कि उसमें आदमियों को झगड़े के लिए बढ़ावा मिलता ही है। वकील लोग निठगे होते हैं। आलसी लोग ऐश-आराम करने के लिए वकील बनते हैं। यह सही बात है। वकालत का पेशा बड़ा आबरूदार पेशा है, ऐसा खोज निकालने वाले भी वकील ही हैं। कानून वे बनाते हैं, उसकी तारीफ़ भी वे ही करते हैं। लोगों से क्या दाम लिये जाएँ, यह भी वे ही तय करते हैं और लोगों पर रौब जमाने के लिए आडंबर ऐसा करते हैं, मानो वे आसमान से उतरकर आये हुए देवदूत हों! 74

हिन्द स्वराज वे मजदूर से ज्यादा रोजी क्यों माँगते हैं ? उनकी जरूरतें मजदूर से ज्यादा क्यों हैं ? उन्होंने मजदूर से ज्यादा देश का क्या भला किया है ? क्या भला करने वाले को ज्यादा पैसा लेने का हक है ? और अगर पैसे के खातिर उन्होंने भला किया हो, तो उसे भला कैसे कहा जाए ? यह तो उस पेशे का जो गुण है वह मैंने बताया। वकीलों के कारण हिन्दू-मुसलमानों के बीच कुछ दंगे हुए हैं, यह तो जिन्हें अनुभव है वे जानते होंगे। उनसे कुछ खानदान बरबाद हो गए हैं। उनकी बदौलत भाइयों में ज़हर दाखिल हो गया है। कुछ रियासतें वकीलों के जाल में फँसकर क़र्ज़दार हो वे मजदूर से ज्यादा रोजी गयी हैं। बहुत से गरासिये इन वकीलों की क्यों माँगते हैं ? उनकी कारस्तानी से लुट गए हैं। ऐसी बहुत सी मिसालें जरूरतें मजदूर से ज्यादा दी जा सकती हैं। क्यों हैं ? उन्होंने मजदूर से लेकिन वकीलों से बड़े से बड़ा नुकसान तो ज्यादा देश का क्या भला यह हुआ है कि अंग्रेजों का जुआ हमारी गर्दन पर किया है ? क्या भला मजबूत जम गया है। आप सोचिये ! क्या आप करने वाले को ज्यादा मानते हैं कि अंग्रेजी अदालतें यहाँ न होतीं तो वे पैसा लेने का हक है ? हमारे देश में राज कर सकते थे ? ये अदालतें और अगर पैसे के खातिर लोगों के भले के लिए नहीं हैं। जिन्हें अपनी सत्ता उन्होंने भला किया हो, तो कायम रखनी है, वे अदालतों के जरिये लोगों को उसे भला कैसे कहा बस में रखते हैं। लोग अगर खुद अपने झगड़े जाए ? यह तो उस पेशे निबटा लें, तो तीसरा आदमी उन पर अपनी सत्ता का जो गुण है वह मैंने नहीं जमा सकता। बताया। सचमुच जब लोग खुद मार-पीट करके या रिश्तेदारों को पंच बनाकर अपना झगड़ा निबटा लेते थे तब वे बहादुर थे। अदालतें आयीं और वे कायर बन गये। लोग आपस में लड़कर झगड़े मिटायें, यह जंगली माना जाता था। अब तीसरा आदमी झगड़ा मिटाता है, यह क्या कम जंगलीपन है ? क्या कोई ऐसा कह सकेगा कि तीसरा आदमी जो फैसला देता है वह सही फैसला ही होता है ? कौन सच्चा है, यह दोनों पक्ष के लोग जानते हैं। हम भोलेपन में मान लेते हैं कि तीसरा आदमी हमसे पैसे लेकर हमारा इन्साफ़ करता है। इस बात को अलग रखें। हकीकत तो यही दिखानी है कि अंग्रेजों ने 75

हिन्द स्वराज्य अदालतों के ज़रिये हम पर अंकुश जमाया है और अगर हम वकील न बनें तो ये अदालतें चल ही नहीं सकतीं। अगर अंग्रेज ही जज होते, अंग्रेज ही वकील होते और अंग्रेज ही सिपाही होते, तो वे जहाँ झगड़े नहीं होते सिर्फ़ अंग्रेजों पर ही राज करते। हिन्दुस्तानी जज वहाँ भी वे झगड़े खड़े और हिन्दुस्तानी वकील के बगैर उनका काम चल करते हैं। उनके दलाल नहीं सका। वकील कैसे पैदा हुए, उन्होंने कैसी जोंक की तरह गरीब धाँधल मचाई, यह सब अगर आप समझ सकें, लोगों से चिपकते हैं तो मेरे जितनी ही नफ़रत आपको भी इस पेशे के और उनका खून चूस लिए होगी। अंग्रेजी सत्ता की एक मुख्य कुंजी लेते हैं। वह पेशा ऐसा है उनकी अदालतें हैं और अदालतों की कुंजी वकील कि उसमें आदमियों को हैं। अगर वकील वकालत करना छोड़ दें और झगड़े के लिए बढ़ावा वह पेशा वेश्या के पेशे जैसा नीच माना जाए, तो मिलता ही है। वकील अंग्रेजी राज एक दिन में टूट जाए। वकीलों ने लोग निठगे होते हैं। हिन्दुस्तानी प्रजा पर यह तोहमत लगवाई है कि हमें झगड़े प्यारे हैं और हम कोर्ट-कचहरी रूपी पानी की मछलियाँ हैं। जो शब्द मैं वकीलों के लिए इस्तेमाल करता हूँ, वे ही शब्द जजों पर भी लागू होते हैं। ये दोनों मौसेरे भाई हैं और एक-दूसरे को बल देने वाले हैं। 76

किसानों को शहर के कृत्रिम जीवन और लकदक के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। उनकी सादगी और सरलता ही उनका भूषण है। किसान का शहर की ओर भागना उसकी असफलता का ढिंढोरा है। ऐसा करके वह घर का रहेगा न घाट का। 77

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हिन्द स्वराज्य हिन्दुस्तान की दशा-पांच पाठक : वकीलों की बात तो हम समझ सकते हैं। उन्होंने जो अच्छा काम किया है वह जान-बूझकर नहीं किया, ऐसा यकीन होता है। बाकी उनके धंधे को देखा जाये तो वह कनिष्ठ ही है, लेकिन आप तो डॉक्टरों को भी उनके साथ घसीटते हैं। यह कैसे ? संपादक : मैं जो विचार आपके सामने रखता हूँ, वे इस समय तो मेरे अपने ही हैं, लेकिन ऐसे विचार मैंने ही किये हैं सो बात नहीं। पश्चिम के सुधारक खुद मुझसे ज्यादा सख्त शब्दों में इन धंधों के बारे में लिख गये हैं। उन्होंने वकीलों और डॉक्टरों की बहुत निंदा की है। उनमें से एक लेखक ने एक जहरी पेड़ का चित्र खींचा है, वकील-डॉक्टर वगैरह निकम्मे धंधे वालों को उसकी शाखाओं के रूप में बताया है और उस पेड़ के तने पर नीति-धर्म की कुल्हाड़ी उठाई है। अनीति को इन सब धंधों की जड़ बताया है। इससे आप यह समझ लेंगे कि मैं आपके सामने अपने दिमाग से निकाले हुए नये विचार नहीं रखता, लेकिन दूसरों का और अपना अनुभव आपके सामने रखता हूँ। डॉक्टरों के बारे में जैसे आपको अभी मोह है वैसे कभी मुझे भी था। एक समय ऐसा था जब मैंने खुद डॉक्टर होने का इरादा किया था और सोचा था कि डॉक्टर बनकर क़ौम की सेवा करूँगा। मेरा यह मोह अब मिट गया है। हमारे समाज में वैद्य का धंधा कभी अच्छा माना ही नहीं गया, इसका भान अब मुझे हुआ है और उस विचार की क़ीमत मैं समझ सकता हूँ। अंग्रेजों ने डॉक्टरी विद्या से भी हम पर काबू जमाया है। डॉक्टरों में दंभ की भी कमी नहीं है। मुगल बादशाह को भरमाने वाला एक अंग्रेज डॉक्टर 79


[साइडबार / उद्धरण बॉक्स]: पश्चिम के सुधारक खुद मुझसे ज्यादा सख्त शब्दों में इन धंधों के बारे में लिख गये हैं। उन्होंने वकीलों और डॉक्टरों की बहुत निंदा की है। उनमें से एक लेखक ने एक जहरी पेड़ का चित्र खींचा है, वकील-डॉक्टर वगैरह निकम्मे धंधे वालों को उसकी शाखाओं के रूप में बताया है और उस पेड़ के तने पर नीति-धर्म की कुल्हाड़ी उठाई है। अनीति को इन सब धंधों की जड़ बताया है।

अध्याय ११-१५: वकीलों, डॉक्टरों व रेलगाड़ियों का प्रभाव

हिन्द स्वराज्य ही था। उसने बादशाह के घर में कुछ बीमारी मिटाई, इसलिए उसे सिरोपाव (सिरोपा) मिला। अमीरों के पास पहुँचने वाले भी डॉक्टर ही हैं। डॉक्टरों ने हमें जड़ से हिला दिया है। डॉक्टरों से नीम-हकीम ज्यादा अच्छे, ऐसा कहने का मेरा मन होता है। इस पर हम कुछ विचार करें। [हाशिया:] यूरोप के डॉक्टर तो हद करते हैं। वे सिर्फ़ शरीर के ही गलत जतन के लिए लाखों जीवों को हर साल मारते हैं, जिंदा जीवों पर प्रयोग करते हैं। ऐसा करना किसी भी धर्म को मंजूर नहीं। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, जरथोस्ती सब धर्म कहते हैं कि आदमी के शरीर के लिए इतने जीवों को मारने की ज़रूरत नहीं। डॉक्टरों का काम सिर्फ़ शरीर को संभालने का है, या शरीर को संभालने का भी नहीं है। उनका काम शरीर में जो रोग पैदा होते हैं उन्हें दूर करने का है। रोग क्यों होते हैं? हमारी ही ग़फ़लत से। मैं बहुत खाऊँ और मुझे बदहज्मी, अजीर्ण हो जाए, फिर मैं डॉक्टर के पास जाऊँ और वह मुझे गोली दे, गोली खाकर मैं चंगा हो जाऊँ और दुबारा खूब खाऊँ और फिर से गोली लूँ। अगर मैं गोली न लेता तो अजीर्ण की सज़ा भुगतता और फिर से बेहद नहीं खाता। डॉक्टर बीच में आया और उसने हद से ज्यादा खाने में मेरी मदद की। उससे मेरे शरीर को तो आराम हुआ, लेकिन मेरा मन कमज़ोर बना। इस तरह आख़िर मेरी यह हालत होगी कि मैं अपने मन पर जरा भी काबू न रख सकूँगा। मैंने विलास किया, मैं बीमार पड़ा, डॉक्टर ने मुझे दवा दी और मैं चंगा हुआ। क्या मैं फिर से विलास नहीं करूँगा? ज़रूर करूँगा। अगर डॉक्टर बीच में न आता तो कुदरत अपना काम करती, मेरा मन मजबूत बनता और अन्त में निर्विषयी (व्यसन मुक्त) होकर मैं सुखी होता। अस्पतालें पाप की जड़ हैं। उनकी बदौलत लोग शरीर का जतन कम करते हैं और अनीति को बढ़ाते हैं। यूरोप के डॉक्टर तो हद करते हैं। वे सिर्फ़ शरीर के ही गलत जतन के लिए लाखों जीवों को हर साल मारते हैं, जिंदा जीवों पर प्रयोग करते हैं। ऐसा करना किसी भी धर्म को मंजूर नहीं। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, जरथोस्ती – सब धर्म कहते हैं कि आदमी के शरीर के लिए इतने जीवों को मारने की ज़रूरत नहीं। 80

हिन्द स्वराज्य डॉक्टर हमें धर्मभ्रष्ट करते हैं। उनकी बहुत सी दवाओं में चर्बी या दारू होती है। इन दोनों में से एक भी चीज हिन्दू-मुसलमान को चल सके ऐसी नहीं है। हम सभ्य होने का ढोंग करके, दूसरों को वहमी मानकर और बे- लगाम होकर चाहे सो करते रहें, यह दूसरी बात है, लेकिन डॉक्टर हमें धर्म से भ्रष्ट करते हैं, यह साफ और सीधी बात है। इसका परिणाम यह आता है कि हम निः सत्त्व और नामर्द बनते हैं। ऐसी दशा में हम लोक सेवा करने लायक नहीं रहते और शरीर से क्षीण और बुद्धिहीन होते जा रहे हैं। अंग्रेजी या यूरोपियन डॉक्टरी सीखना गुलामी की गाँठ को मजबूत बनाने जैसा है। डॉक्टर हमें धर्म भ्रष्ट करते हैं। उनकी बहुत सी दवाओं में चर्बी या दारू होती है। इन दोनों में से एक भी चीज हिन्दू-मुसलमान को चल सके ऐसी नहीं है। हम सभ्य होने का ढोंग करके, दूसरों को वहमी मानकर और बे-लगाम होकर चाहे सो करते रहें, यह दूसरी बात है, लेकिन डॉक्टर हमें धर्म से भ्रष्ट करते हैं, यह साफ और सीधी बात है। हम डॉक्टर क्यों बनते हैं, यह भी सोचने की बात है। उसका सच्चा कारण तो आबरूदार और पैसा कमाने का धंधा करने की इच्छा है। उसमें परोपकार की बात नहीं है। उस धन्धे में परोपकार नहीं है, यह तो मैं बता चुका। उससे लोगों को नुकसान होता है। डॉक्टर सिर्फ़ आडम्बर दिखाकर ही लोगों से बड़ी फीस वसूल करते हैं और अपनी एक पैसे की दवा के कई रुपये लेते हैं। यों विश्वास में और चंगे हो जाने की आशा में लोग डॉक्टरों से ठगे जाते हैं। जब ऐसा ही है तब भलाई का दिखावा करने वाले डॉक्टरों से खुले ठग, वैद्य, नीम-हकीम ज्यादा अच्छे। 81

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जिसका आत्मबल पर विश्वास है, उसकी हार नहीं होती क्योंकि आत्मबल की पराकाष्ठा का अर्थ है मरने की तैयारी।

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सच्ची सभ्यता कौन सी ? पाठक : आपने रेल को रद्द कर दिया, वकीलों की निन्दा की, डॉक्टरों को दबा दिया। तमाम कलकाम (यंत्रों) को भी आप नुकसानदेह मानेंगे, ऐसा मैं देख सकता हूं। तब सभ्यता कहें तो किसे कहें ? संपादक : इस सवाल का जवाब मुश्किल नहीं है। मैं मानता हूं कि जो सभ्यता हिन्दुस्तान ने दिखाई है, उस तक दुनिया में कोई नहीं पहुंच सकता। जो बीज हमारे पुरखों ने बोए हैं, उनकी बराबरी कर सके ऐसी कोई चीज देखने में जो बीज हमारे पुरखों ने नहीं आई। रोम मिट्टी में मिल गया, ग्रीस का बोये हैं, उनकी बराबरी सिर्फ नाम ही रह गया, मिस्र की बादशाही चली कर सके ऐसी कोई चीज गई, जापान पश्चिम के शिकंजे में फंस गया और देखने में नहीं आई। रोम चीन का कुछ भी कहा नहीं जा सकता। लेकिन मिट्टी में मिल गया, ग्रीस गिरा-टूटा जैसा भी हो, हिन्दुस्तान आज भी का सिर्फ नाम ही रह गया, अपनी बुनियाद में मजबूत है। मिस्र की बादशाही चली जो रोम और ग्रीस गिर चुके हैं, उनकी गई, जापान पश्चिम के किताबों से यूरोप के लोग सीखते हैं। उनकी शिकंजे में फंस गया और गलतियां वे नहीं करेंगे ऐसा गुमान रखते हैं। चीन का कुछ भी कहा ऐसी उनकी कंगाल हालत है, जबकि हिन्दुस्तान नहीं जा सकता। लेकिन अचल है, अडिग है। यह उसका भूषण है। गिरा-टूटा जैसा भी हो, हिन्दुस्तान पर आरोप लगाया जाता है कि वह हिन्दुस्तान आज भी अपनी ऐसा जंगली, ऐसा अज्ञानी है कि उससे जीवन बुनियाद में मजबूत है। में कुछ फेरबदल कराये ही नहीं जा सकते। यह आरोप हमारा गुण है दोष नहीं। अनुभव से जो हमें ठीक लगा है उसे हम क्यों बदलेंगे ? बहुत से अक्ल देने वाले आते-जाते रहते हैं, पर हिन्दुस्तान अडिग रहता है। यह उसकी खूबी है, यह उनका लंगर है। सभ्यता वह आचरण है जिससे आदमी अपना फर्ज अदा करता है। फर्ज अदा करने के मानी है नीति का पालन करना। नीति के पालन का मतलब है अपने मन और इन्द्रियों को बस में रखना। ऐसा करते हुए हम अपनी 85

हिन्द स्वराज असलियत को पहचानते हैं। यही सभ्यता है। इससे जो उल्टा है वह बिगाड़ करने वाला है। बहुत से अंग्रेज लेखक लिख गये हैं कि ऊपर की व्याख्या के मुताबिक हिन्दुस्तान को कुछ भी सीखना बाकी नहीं रहता। यह बात ठीक है। हमने देखा कि मनुष्य वृत्तियां चंचल हैं। उसका मन बेकार की दौड़ धूप किया करता है। उसका शरीर जैसे-जैसे ज्यादा दिया जाए वैसे-वैसे ज्यादा मांगता है। ज्यादा लेकर भी वह सुखी नहीं होता। भोग भोगने से भोग की इच्छा बढ़ती जाती है।

[हाशिया / पार्श्व-पाठ]: हिन्दुस्तान पर आरोप लगाया जाता है कि वह ऐसा जंगली, ऐसा अज्ञान है कि उससे जीवन में कुछ फेरबदल कराए ही नही जा सकते। यह आरोप हमारा गुण है दोष नहीं। अनुभव से जो हमें ठीक लगा है उसे हम क्यों बदलेंगे ? बहुत से अक्ल देने वाले आते-जाते रहते हैं, पर हिन्दुस्तान अडिग रहता है। यह उसकी खूबी है।

[मुख्य पाठ]: इसलिए हमारे पुरखों ने भोग की हद बांध दी। बहुत सोचकर उन्होंने देखा कि सुख-दुःख तो मन के कारण हैं। अमीर अपनी अमीरी की वजह से सुखी नहीं है। गरीब अपनी गरीबी के कारण दुखी नहीं है। अमीर दुखी देखने में आता है और गरीब सुखी देखने में आता है। करोड़ों लोग तो गरीब ही रहेंगे। ऐसा देखकर उन्होंने भोग की वासना छुड़वाई। हजारों साल पहले जो हल काम में लिया जाता था, उससे हमने काम चलाया। हज़ारों साल पहले जैसे झोंपड़े थे, उन्हें हमने कायम रखा। हज़ारों साल पहले जैसी हमारी शिक्षा थी वही चलती आई। हमने नाशकारक होड़ को समाज में जगह नहीं दी। सब अपना-अपना धंधा करते रहे। उसमें उन्होंने दस्तूर के मुताबिक दाम लिए। ऐसा नहीं था कि हमें यंत्र वगैरह की खोज करना ही नहीं आता था। लेकिन हमारे पूर्वजों ने देखा कि लोग अगर यंत्र वगैरह की झंझट में पड़ेंगे तो गुलाम ही बनेंगे और अपनी नीति को छोड़ देंगे। उन्होंने सोच समझकर कहा कि हमें अपने हाथ-पैरों से जो काम हो सके वही करना चाहिए। हाथ- पैरों का इस्तेमाल करने में ही सच्चा सुख है, उसी में तन्दुरुस्ती है। उन्होंने सोचा कि बड़े शहर खड़े करना बेकार की झंझट है। उनमें लोग सुखी नहीं होंगे। उनमें धूर्तों की टोलियां और वेश्याओं की गलियां पैदा होंगी, गरीब अमीरों से लूटे जायेंगे। इसलिए उन्होंने छोटे देहातों से संतोष

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हिन्द स्वराज माना। उन्होंने देखा कि राजाओं और उनकी तलवार के बनिस्बत नीति का बल ज्यादा बलवान है। इसलिए उन्होंने राजाओं को नीतिवान पुरुषों, ऋषियों और फ़कीरों से कम दर्जे का माना। ऐसा जिस राष्ट्र का गठन है वह राष्ट्र दूसरों को सिखाने लायक है, वह दूसरों से सीखने लायक नहीं है। इस राष्ट्र में अदालतें थीं, वकील थे, डॉक्टर-वैद्य थे। लेकिन वे सब ठीक ढंग से नियम के मुताबिक चलते थे। सब जानते थे कि ये धन्धे बड़े नहीं हैं और वकील, डॉक्टर वगैरह लोगों में लूट नहीं चलाते थे, वे तो लोगों पर आश्रित थे। वे लोगों के मालिक बनकर नहीं रहते थे। इन्साफ काफी अच्छा होता था। अदालतों में न जाना, यह लोगों का ध्येय था। उन्हें भरमाने वाले स्वार्थी लोग नहीं थे। इतनी सड़न भी सिर्फ राजा और राजधानी के आस-पास ही थी। यों आम प्रजा तो उससे स्वतंत्र रहकर अपने खेत का मालिकी हक भोगती थी। उसके पास सच्चा स्वराज्य था। और जहां यह चांडाल सभ्यता नहीं पहुंची है, वहां हिन्दुस्तान आज भी वैसा ही है। उसके सामने आप अपने नये ढोंगों की बात करेंगे, तो वह आपकी हंसी उड़ायेगा। उस पर न तो अंग्रेज राज करते हैं, न आप कर सकेंगे। उन्होंने सोचा कि बड़े शहर खड़े करना बेकार की झंझट है। उनमें लोग सुखी नहीं होंगे। उनमें धूर्तों की टोलियां और वेश्याओं की गलियां पैदा होंगी, गरीब अमीरों से लूटे जायेंगे। इसलिए उन्होंने राजाओं को नीतिवान पुरुषों, ऋषियों और फ़कीरों से कम दर्जे का माना। ऐसा जिस राष्ट्र का गठन हो वह राष्ट्र दूसरों को सिखाने लायक है, वह दूसरों से सीखने लायक नहीं है। जिन लोगों के नाम पर हम बात करते हैं, उन्हें हम पहचानते नहीं हैं, न वे हमें पहचानते हैं। आपको और दूसरों को, जिनमें देशप्रेम है, मेरी सलाह है कि आप देश में, जहां रेल की बाढ़ नहीं फैली है उस भाग में छह माह के लिए घूम आयें और बाद में देश की लगन लगायें, बाद में स्वराज्य की बात करें। अब आपने देखा कि सच्ची सभ्यता मैं किस चीज को कहता हूं। ऊपर मैंने जो तस्वीर खींची है वैसा हिन्दुस्तान जहां हो वहां जो आदमी फेरफार करेगा उसे आप दुश्मन समझिए। वह मनुष्य पापी है। पाठक : आपने जैसा बताया वैसा ही हिन्दुस्तान होता तब तो ठीक था। लेकिन जिस देश में हजारों बाल-विधवायें हैं, जिस देश में दो बरस की 87