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हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

हिन्द स्वराज्य की ज़रूरत गांधीजी ने अपने जीवन में लाखों पत्र अवश्य लिखे लेकिन पुस्तकें ज्यादा नहीं लिखीं। उनकी जो बातें हम पढ़ते हैं वो अधिकत्तर उनके भाषणों तथा बातचीत आदि के हिस्से हैं। उन्होंने बहुत कम लिखा लेकिन उस कम में हिन्द स्वराज्य की गिनती प्रमुख है। यह पुस्तक भी 1909 में उन्होंने उस समय लिखी जब उनका प्रवेश भारतीय राजनीति में पूरी तरह हुआ भी नहीं था। फिर भी यह छोटी सी पुस्तक गांधीजी की आत्मा कही जाती है। आज इस पुस्तक को लिखे 100 वर्ष पूरे हो गये हैं। शताब्दी वर्ष के निमित्त देश और दुनिया में हिन्द स्वराज्य में लिखे गये विचारों का विस्तार से विश्लेषण हुआ है। अनेक विद्वानों ने, चिन्तकों ने, ज़मीन पर काम करने वाले लोगों ने, जन प्रतिनिधियों ने अपने-अपने ढंग से इस पुस्तक की प्रासंगिकता पर खूब प्रकाश डाला है। सभी ने एक स्वर में कहा है कि आज पूरी दुनिया और हमारा देश जिस तरह से संकटों से गुज़र रहा है उनसे संभलने का एक ही रास्ता है, वह है हिन्द स्वराज्य। देश और दुनिया के आगे ध्रुव तारा सा बन गई इस पुस्तक को अपने मूल स्वरूप में प्रकाशित करने का हमारा मकसद केवल इतना ही है कि हमारे लोग आर्थिक, राजनीतिक संकट के इस कठिन दौर में इस पुस्तक से प्रेरणा लेकर अपने-अपने कर्त्तव्यों को पूरा करने की दिशा में क़दम उठाएं। शताब्दी वर्ष के निमित्त हिन्द स्वराज्य के मूल पाठ को आपके हाथ में देते हुए हमें धन्यता का अनुभव हो रहा है। 3

संदेश जिन सिद्धान्तों के समर्थन के लिए हिन्द स्वराज लिखी गई थी, उन सिद्धान्तों की आप जाहिरात करना चाहती हैं, यह मुझे अच्छा लगता है। मूल पुस्तक गुजराती में लिखी गई थी, अंग्रेज़ी आवृत्ति गुजराती का तरजुमा है। यह पुस्तक अगर आज मुझे फिर से लिखनी हो तो कहीं-कहीं मैं उसकी भाषा बदलूंगा। लेकिन इसे लिखने के बाद जो तीस साल मैंने अनेक आंधियों में बिताए हैं, उनमें मुझे इस पुस्तक में बताये हुए विचारों में फेरबदल करने का कुछ भी कारण नहीं मिला। पाठक इतना ख़्याल रखें कि कुछ कार्यकर्त्ताओं के साथ, जिनमें एक कट्टर अराजकतावादी थे, मेरी जो बातें हुई थीं, वे जैसी की तैसी मैंने इस पुस्तक में दे दी हैं। पाठक इतना भी जान लें कि दक्षिण अफ्रीका के हिन्दुस्तानियों में जो सड़न दाखिल होने वाली ही थी, उसे इस पुस्तक ने रोका था। इसके विरुद्ध दूसरे पल्ले में रखने के लिए पाठक मेरे एक स्वर्गीय मित्र की यह राय भी जान लें कि ‘यह एक मूर्ख आदमी की रचना है।’ मोहनदास करमचंद गांधी सेवाग्राम 14.7.38 अंग्रेज़ी मासिक ‘आर्यन पाथ’ के सितम्बर 1938 में ‘हिन्द स्वराज्य अंक’ के लिए भेजा हुआ संदेश। 4

प्रस्तावना इस विषय पर मैंने जो बीस अध्याय लिखे हैं, उन्हें पाठकों के सामने रखने की मैं हिम्मत करता हूं। जब मुझसे रहा ही नहीं गया तभी मैंने यह लिखा है। बहुत पढ़ा, बहुत सोचा। विलायत में ट्रान्सवाल डेप्युटेशन के साथ मैं चार माह रहा, उस बीच हो सका उतने हिन्दुस्तानियों के साथ मैंने सोच-विचार किया, हो सका उतने अंग्रेजों से भी मैं मिला। अपने जो विचार मुझे आखिरी मालूम हुए, उन्हें पाठकों के सामने रखना मैंने अपना फ़र्ज समझा। इण्डियन ओपीनियन के गुजराती ग्राहक आठ सौ के करीब हैं। हर ग्राहक के पीछे कम से कम दस आदमी दिलचस्पी से यह अखबार पढ़ते हैं, ऐसा मैंने महसूस किया है। जो गुजराती नहीं जानते, वे दूसरों से पढ़वाते हैं। इन भाइयों ने हिन्दुस्तान की हालत के बारे में मुझसे बहुत सवाल किये हैं। ऐसे ही सवाल मुझसे विलायत में किये गये थे। इसलिए मुझे लगा कि जो विचार मैंने यों खानगी में बताए उन्हें सबके सामने रखना गलत नहीं होगा। जो विचार यहां रखे गये हैं, वे मेरे हैं और मेरे नहीं भी हैं। वे मेरे हैं, क्योंकि उनके मुताबिक बरतने की मैं उम्मीद रखता हूं, वे मेरी आत्मा में गढ़े-जड़े हुए जैसे हैं। वे मेरे नहीं हैं, क्योंकि सिर्फ मैंने ही उन्हें सोचा हो सो बात नहीं। कुछ किताबें पढ़ने के बाद वे बने हैं। दिल में भीतर ही भीतर मैं जो महसूस करता था, उसका इस किताब ने समर्थन किया। यह साबित करने की ज़रूरत नहीं कि जो विचार मैं पाठकों के सामने रखता हूं, वे हिन्दुस्तान में जिन पर पश्चिमी सभ्यता की धुन सवार नहीं हुई है ऐसे बहुतेरे हिन्दुस्तानियों के हैं। लेकिन यही विचार यूरोप के हज़ारों लोगों के हैं, यह मैं अपने पाठकों के मन में अपने सबूतों से ही जंचाना चाहता हूं। जिसे इसकी खोज करनी हो, जिसे ऐसी फुर्सत हो, वह आदमी वे किताबें देख सकता है। अपनी फुर्सत से उन किताबों में से कुछ न कुछ पाठकों के सामने रखने की मेरी उम्मीद है। इण्डियन ओपीनियन के पाठकों या औरों के मन में मेरे लेख पढ़कर जो विचार आये, उन्हें अगर वे मुझे बतायेंगे तो मैं उनका आभारी रहूंगा। उद्देश्य सिर्फ देश की सेवा करने का और सत्य की खोज करने का और उसके मुताबिक बरतने का है। इसलिए अगर मेरे विचार गलत साबित हों, तो उन्हें पकड़ रखने का मेरा आग्रह नहीं है। अगर वे सच साबित हों तो दूसरे लोग भी उनके मुताबिक बरतें, ऐसी देश के भले के लिए साधारण तौर पर मेरी भावना रहेगी। सुभीते के लिए लेखों को पाठक और संपादक के बीच के संवाद का रूप दिया गया है। मोहनदास करमचंद गांधी किलडोनन कैसल, 22.11.1909 5

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यह किताब द्वेष धर्म की जगह प्रेम धर्म सिखाती है; हिंसा की जगह आत्म-बलिदान को रखती है; पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है। यह किताब बालक के हाथ में भी दी जा सकती है। 7

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हिन्द स्वराज्य 9

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अगर किसी मक़सद के लिए खड़े हो तो एक पेड़ की तरह रहो और गिरो तो बीज की तरह गिरो ताकि दोबारा उग कर उसी मक़सद के लिए संघर्ष कर सको। 11

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कांग्रेस और उसके कर्ता-धर्ता पाठक : आजकल हिंदुस्तान में स्वराज्य की हवा चल रही है। सब हिंदुस्तानी आज़ाद होने के लिए तरस रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका में भी वही जोश दिखाई दे रहा है। हिंदुस्तानियों में अपने हक पाने की बड़ी हिम्मत आई हुई मालूम होती है। इस बारे में क्या आप अपने ख़्याल बताएंगे ? संपादक : आपने सवाल ठीक पूछा है, लेकिन इसका जवाब देना आसान बात नहीं है। अखबार का एक काम तो है लोगों की भावनाएँ जानना और उन्हें ज़ाहिर करना, दूसरा काम है लोगों में अमुक ज़रूरी भावनाएँ पैदा करना और तीसरा काम अगर दूसरे की इज़्ज़त है लोगों में दोष हों तो चाहे जितनी मुसीबतें आने करने की आदत हम खो पर बेधड़क होकर उन्हें दिखाना। आपके सवाल का बैठें, तो हम निकम्मे हो जवाब देने में ये तीनों काम साथ-साथ आ जाते हैं। जाएँगे। जो प्रौढ़ और लोगों की भावनाएँ कुछ हद तक बतानी होंगी, न तजरबेकार हैं, वे ही हों वैसी भावनाएँ उनमें पैदा करने की कोशिश स्वराज्य भुगत सकते हैं, करनी होगी और उनके दोषों की निंदा भी करनी न कि बे-लगाम लोग। होगी। फिर भी आपने सवाल किया है, इसलिए उसका जवाब देना मेरा फर्ज मालूम होता है। पाठक : क्या स्वराज्य की भावना हिन्द में पैदा हुई आप देखते हैं ? संपादक : वह तो जबसे नेशनल कांग्रेस कायम हुई तभी से देखने में आई है। 'नेशनल' शब्द का अर्थ ही वह विचार जाहिर करता है। पाठक : यह तो आपने ठीक नहीं कहा। नौजवान हिन्दुस्तानी आज कांग्रेस की परवाह ही नहीं करते। वे तो उसे अंग्रेजों का राज्य निभाने का साधन मानते हैं। संपादक : नौजवानों का ऐसा ख़्याल ठीक नहीं है। हिन्द के दादा दादाभाई नौरोजी ने ज़मीन तैयार नहीं की होती तो नौजवान आज जो बातें कर रहे हैं वह भी नहीं कर पाते। मि. ह्यूम ने जो लेख लिखे, जो फटकारें हमें सुनाईं, जिस जोश से हमें जगाया, उसे कैसे भुलाया जाए ? सर विलियम वेडरबर्न ने 13

हिन्द स्वराज्य कांग्रेस का मकसद हासिल करने के लिए अपना तन, मन और धन सब दे दिया था। उन्होंने अंग्रेजी राज्य के बारे में जो लेख लिखे हैं, वे आज भी पढ़ने लायक हैं। प्रोफेसर गोखले ने जनता को तैयार करने के लिए भिखारी के जैसी हालत में रहकर अपने बीस साल दिये हैं। आज भी वे गरीबी में रहते हैं। मरहूम जस्टिस बदरुद्दीन ने भी कांग्रेस के जरिये स्वराज्य का बीज बोया था। यों बंगाल, मद्रास, पंजाब वगैरह में कांग्रेस का और हिंद का भला चाहने वाले कई हिन्दुस्तानी और अंग्रेज लोग हो गये हैं, यह याद रखना चाहिए। पाठक : ठहरिये, ठहरिये। आप तो बहुत आगे बढ़ गये। मेरा सवाल कुछ है कर्त्तव्य पालन में और आप जवाब कुछ और दे रहे हैं। मैं स्वराज्य की बात से ही हक पैदा करता हूँ और आप परराज्य की बात करते हैं। मुझे अंग्रेजों होता है। हम बड़ी का नाम तक नहीं चाहिए और आप तो अंग्रेजों के नाम देने बातों को मत लगे। इस तरह तो हमारी गाड़ी राह पर आये, ऐसा नहीं सोचें, अच्छी दिखता। मुझे तो स्वराज्य की ही बातें अच्छी लगती हैं। बातें सोचें। दूसरी मीठी सयानी बातों से मुझे संतोष नहीं होगा। संपादक : आप अधीर हो गये हैं। मैं अधीरपन बरदाश्त नहीं कर सकता। आप जरा सब्र करेंगे तो आपको जो चाहिए वही मिलेगा। 'उतावली से आम नहीं पकते, दाल नहीं चुरती' यह कहावत याद रखिए। आपने मुझे रोका और आपको हिन्द पर उपकार करने वालों की बात भी सुननी अच्छी नहीं लगती, यह बताता है कि अभी आपके लिए स्वराज्य दूर है। आपके जैसे बहुत से हिन्दुस्तानी हों तो हम स्वराज्य से दूर हटकर-पिछड़ जाएँगे। वह बात जरा सोचने लायक है। पाठक : मुझे तो लगता है कि ये गोल-मोल बातें बनाकर आप मेरे सवाल का जवाब उड़ा देना चाहते हैं। आप जिन्हें हिन्दुस्तान पर उपकार करने वाले मानते हैं, उन्हें मैं ऐसा नहीं मानता, फिर मुझे किसके उपकार की बात सुननी है ? आप जिन्हें हिन्द के दादा कहते हैं, उन्होंने क्या उपकार किया ? वे तो कहते हैं कि अंग्रेज राजकर्ता न्याय करेंगे और उनसे हमें हिलमिल कर रहना चाहिए। संपादक : मुझे सविनय आपसे कहना चाहिए कि उस पुरुष के बारे में आपका बेअदबी से यों बोलना हमारे लिए शर्म की बात है। उनके कामों की 14

अध्याय १-५: कांग्रेस, बंग-भंग व स्वराज्य का वास्तविक अर्थ

हिन्द स्वराज्य ओर देखिए। उन्होंने अपना जीवन हिन्द को अर्पण कर दिया है। उनसे यह सबक हमने सीखा। हिन्द का खून अंग्रेजों ने चूस लिया है, यह सिखाने वाले माननीय दादाभाई हैं। आज उन्हें अंग्रेजों पर भरोसा है उससे क्या ? हम जवानी के जोश में एक कदम आगे रखते हैं, इससे क्या दादाभाई कम पूज्य हो जाते हैं ? इससे क्या हम ज्यादा ज्ञानी हो गये ? जिस सीढ़ी से हम ऊपर चढ़े उसको लात न मारने में ही बुद्धिमानी है। अगर वह सीढ़ी निकाल दें तो सारी निसैनी (सीढ़ी) गिर जाए, यह हमें याद रखना चाहिए। हम बचपन से जवानी में आते हैं तब बचपन से नफरत नहीं करते, बल्कि उन दिनों को प्यार से याद करते हैं। बरसों तक अगर मुझे कोई पढ़ाता है और उससे मेरी जानकारी जरा बढ़ जाती है, तो इससे मैं अपने शिक्षक से ज्यादा ज्ञानी जिस सीढ़ी से हम ऊपर नहीं माना जाऊंगा, अपने शिक्षक को तो मुझे मान चढ़े उसको लात न देना ही पड़ेगा। इसी तरह हिन्द के दादा के बारे में मारने में ही बुद्धिमानी समझाना चाहिए। उनके पीछे सारी हिन्दुस्तानी जनता है। अगर वह सीढ़ी है, यह तो हमें कहना ही पड़ेगा। निकाल दें तो सारी पाठक : यह आपने ठीक कहा। दादाभाई नौरोजी की निसैनी (सीढ़ी) गिर इज्जत करना चाहिए, यह तो समझ सकते हैं। उन्होंने जाए, यह हमें याद और उनके जैसे दूसरे पुरुषों ने जो काम किये हैं, रखना चाहिए। हम उनके बगैर हम आज का जोश महसूस नहीं कर पाते, बचपन से जवानी में यह बात ठीक लगती है, लेकिन यही बात प्रोफेसर आते हैं तब बचपन से गोखले साहब के बारे में हम कैसे मान सकते हैं ? वे नफरत नहीं करते, तो अंग्रेजों के बड़े भाईबंद बनकर बैठे हैं, वे तो कहते बल्कि उन दिनों को हैं कि अंग्रेजों से हमें बहुत कुछ सीखना है। अंग्रेजों प्यार से याद करते हैं। की राजनीति से हम वाकिफ़ हो जाएँ, तभी स्वराज्य की बातचीत की जाए। उन साहब के भाषणों से तो मैं ऊब गया हूँ। संपादक : आप ऊब गये हैं, यह दिखाता है कि आपका मिज़ाज उतावला है, लेकिन जो नौजवान अपने माँ-बाप के ठंडे मिज़ाज से ऊब जाते हैं और वे (माँ-बाप) अगर अपने साथ न दौड़ें तो गुस्सा होते हैं, वे अपने माँ-बाप का अनादर करते हैं ऐसा हम समझते हैं। प्रोफेसर गोखले के बारे में भी ऐसा ही समझना चाहिए। क्या हुआ अगर प्रोफेसर गोखले हमारे साथ नहीं दौड़ते हैं ? स्वराज्य भुगतने की इच्छा रखने वाली प्रजा अपने बुजुर्गों का तिरस्कार 15

हिन्द स्वराज्य नहीं कर सकती। अगर दूसरे की इज़्ज़त करने की आदत हम खो बैठें, तो हम निकम्मे हो जाएँगे। जो प्रौढ़ और तजुरबेकार हैं, वे ही स्वराज्य भुगत सकते हैं, न कि बे-लगाम लोग। और देखिये कि जब प्रोफेसर गोखले ने हिन्दुस्तान की शिक्षा के लिए त्याग किया तब ऐसे कितने हिन्दुस्तानी थे? मैं तो खासतौर पर मानता हूँ कि प्रोफेसर गोखले जो कुछ भी करते हैं वह शुद्ध भाव से और हिन्दुस्तान का हित मानकर करते हैं। हिन्द के लिए अगर अपनी जान भी देनी पड़े तो वे दे देंगे, ऐसी हिन्द के लिए उनकी भक्ति है। वे जो कुछ कहते हैं वह किसी की खुशामद करने के लिए नहीं, बल्कि सही मानकर कहते हैं। इसलिए हमारे मन में उनके लिए पूज्य भाव होना चाहिए। [हाशिया / साइड नोट:] सारे के सारे अंग्रेज बुरे हैं, ऐसा तो मैं नहीं मानूँगा। बहुत से अंग्रेज चाहते हैं कि हिन्दुस्तान को स्वराज्य मिले। उस प्रजा में स्वार्थ ज्यादा है यह ठीक है, लेकिन उससे हर एक अंग्रेज बुरा है ऐसा साबित नहीं होता। पाठक : तो क्या वे साहब जो कहते हैं उसके मुताबिक हमें भी करना चाहिए? संपादक : मैं ऐसा कुछ नहीं कहता। अगर हम शुद्ध बुद्धि से अलग राय रखते हैं तो उस राय के मुताबिक चलने की सलाह खुद प्रोफेसर साहब हमें देंगे। हमारा मुख्य काम तो यह है कि हम उनके कामों की निन्दा न करें, हमसे वे महान हैं ऐसा मानें और यकीन रखें कि उनके मुकाबले में हमने हिन्द के लिए कुछ भी नहीं किया है। उनके बारे में कुछ अखबार जो अशिष्टतापूर्वक लिखते हैं उसकी हमें निन्दा करनी चाहिए और प्रोफेसर गोखले जैसों को हमें स्वराज्य के स्तंभ मानना चाहिए। उनके ख़्याल ग़लत और हमारे ही सही हैं, या हमारे ख़्याल के मुताबिक़ न बरतने वाले देश के दुश्मन हैं, ऐसा मान लेना बुरी भावना है। पाठक : आप जो कुछ कहते हैं वह अब मेरी समझ में कुछ आता है। फिर भी मुझे उसके बारे में सोचना होगा। पर मि. ह्यूम, सर विलियम वेडरबर्न वगैरा के बारे में आपने जो कहा उसमें तो हद हो गई। संपादक : जो नियम हिन्दुस्तानियों के बारे में है, वही अंग्रेजों के बारे में समझना चाहिए। सारे के सारे अंग्रेज बुरे हैं, ऐसा तो मैं नहीं मानूँगा। बहुत से अंग्रेज चाहते हैं कि हिन्दुस्तान को स्वराज्य मिले। उस प्रजा में स्वार्थ ज्यादा है यह ठीक है, लेकिन उससे हर एक अंग्रेज बुरा है ऐसा साबित नहीं 16

हिन्द स्वराज्य होता। जो हक, न्याय चाहते हैं, उन्हें सबके साथ न्याय करना होगा। सर विलियम हिन्दुस्तान का बुरा चाहने वाले नहीं हैं, इतना हमारे लिये काफी है। ज्यों-ज्यों हम आगे बढ़ेंगे त्यों-त्यों आप देखेंगे कि अगर हम न्याय की भावना से काम लेंगे, तो हिन्दुस्तान का छुटकारा जल्दी होगा। आप यह भी देखेंगे कि अगर हम तमाम अंग्रेजों से द्वेष करेंगे, तो उससे स्वराज्य दूर ही जाने वाला है, लेकिन अगर उनके साथ भी न्याय करेंगे, तो स्वराज्य के लिए हमें उसकी मदद मिलेगी। पाठक : अभी तो ये सब मुझे फिजूल की बड़ी-बड़ी बातें लगती हैं। अंग्रेजों की मदद मिले और उससे स्वराज्य मिल जाए, मुझे दिखाना तो इतना ही है ये तो आपने दो उलटी बातें कहीं, लेकिन इस कि कांग्रेस ने हिन्द को सवाल का हल अभी मुझे नहीं चाहिए। उसमें स्वराज्य का रस चखाया। समय बिताना बेकार है। स्वराज्य कैसे मिलेगा, इसका जस कोई और लेना यह जब आप बताएँगे तब शायद आपके विचार चाहे तो वह ठीक न होगा मैं समझ सकूँ तो समझ सकूँ। फिलहाल तो और हम भी ऐसा मानें तो अंग्रेजों की मदद की आपकी बात ने मुझे शंका बेक़दर ठहरेंगे। इतना ही नहीं, में डाल दिया है और आपके विचारों के बल्कि जो मक़सद हम ख़िलाफ मुझे भरमा दिया है। इसलिए यह बात हासिल करना चाहते हैं उसमें आप आगे न बढ़ाएँ तो अच्छा हो। मुसीबतें पैदा होंगी। संपादक : मैं अंग्रेजों की बात को बढ़ाना नहीं चाहता। आप शंका में पड़ गये, इसकी कोई फिकर नहीं। मुझे जो महत्त्व की बात कहनी है, उसे पहले से ही बता देना ठीक होगा। आपकी शंका को धीरज से दूर करना मेरा फर्ज है। पाठक : आपकी यह बात मुझे पसन्द आयी। इससे मुझे जो ठीक लगे वह बात कहने की मुझमें हिम्मत आई है। अभी मेरी एक शंका रह गई है। कांग्रेस के आरम्भ से स्वराज्य की नींव पड़ी, यह कैसे कहा जा सकता है ? संपादक : देखिए, कांग्रेस ने अलग-अलग जगहों पर हिन्दुस्तानियों को इकट्ठा करके उनमें ‘हम एक-राष्ट्र हैं’ ऐसा जोश पैदा किया। कांग्रेस पर सरकार की कड़ी नज़र रहती थी। महसूल का हक प्रजा को होना चाहिए, ऐसी माँग कांग्रेस ने हमेशा की है। जैसा स्वराज्य कैनेडा में है वैसा स्वराज्य कांग्रेस ने हमेशा चाहा है। वैसा स्वराज्य मिलेगा या नहीं मिलेगा, वैसा 17

हिन्द स्वराज स्वराज्य हमें चाहिए या नहीं चाहिए, उससे बढ़कर दूसरा कोई स्वराज्य है या नहीं, यह सवाल अलग है। मुझे दिखाना तो इतना ही है कि कांग्रेस ने हिन्द को स्वराज्य का रस चखाया। इसका जस कोई और लेना चाहे तो वह ठीक न होगा और हम भी ऐसा मानें तो बेक़दर ठहरेंगे। इतना ही नहीं, बल्कि जो मक़सद हम हासिल करना चाहते हैं उसमें मुसीबतें पैदा होंगी। कांग्रेस को अलग समझने और स्वराज्य के ख़िलाफ मानने से हम उसका उपयोग नहीं कर सकते। 18

कोई भी संकल्प मामूली नहीं होता। गंभीरता से निभाने से उसका परिणाम अवश्य मिलता है। 19

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बंग-भंग पाठक : आप कहते हैं उस तरह विचार करने पर यह ठीक लगता है कि कांग्रेस ने स्वराज्य की नींव डाली, लेकिन यह तो आप मानेंगे कि वह सही जागृति नहीं थी। सही जागृति कब और कैसे हुई ? संपादक : बीज हमेशा हमें दिखाई नहीं देता। वह अपना काम ज़मीन के नीचे करता है और जब ख़ुद मिट जाता है तब पेड़ ज़मीन के ऊपर देखने में आता है। कांग्रेस के बारे में ऐसा ही समझिए। जिसे आप सही जागृति मानते हैं वह तो बंग-भंग से हुई, जिसके लिए हम लॉर्ड कर्ज़न के आभारी हैं। बंग- भंग के वक्त बंगालियों ने कर्ज़न साहब से बहुत प्रार्थना की, लेकिन वे साहब अपनी सत्ता के मद में लापरवाह बीज हमेशा हमें दिखाई रहे। उन्होंने मान लिया कि हिन्दुस्तानी लोग सिर्फ नहीं देता। वह अपना बकवास ही करेंगे, उनसे कुछ भी नहीं होगा। उन्होंने काम ज़मीन के नीचे अपमान भरी भाषा का प्रयोग किया और ज़बरदस्ती करता है और जब ख़ुद बंगाल के टुकड़े किए। हम यह मान सकते हैं कि उस मिट जाता है तब दिन से अंग्रेज़ी राज्य के भी टुकड़े हुए। बंग-भंग से पेड़ ज़मीन के ऊपर जो धक्का अंग्रेज़ी हुकूमत को लगा, वैसा और किसी देखने में आता है। काम से नहीं लगा। इसका मतलब यह नहीं कि जो दूसरे गैर इन्साफ़ हुए, वे बंग-भंग से कुछ कम थे। नमक महसूल कुछ कम गैर इन्साफ़ नहीं है। ऐसा और तो आगे हम बहुत देखेंगे, लेकिन बंगाल के टुकड़े करने का विरोध करने के लिए प्रजा तैयार थी। उस वक्त प्रजा की भावना बहुत तेज़ थी। उस समय बंगाल के बहुतेरे नेता अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार थे। अपनी सत्ता, अपनी ताक़त को वे जानते थे। इसलिए तुरन्त आग भड़क उठी। अब वह बुझने वाली नहीं है, उसे बुझाने की ज़रूरत भी नहीं है। ये टुकड़े क़ायम नहीं रहेंगे, बंगाल फिर एक हो जाएगा, लेकिन अंग्रेज़ी जहाज़ में जो दरार पड़ी है, वह तो हमेशा रहेगी ही। वह दिन-ब-दिन चौड़ी होती जाएगी। जागा हुआ हिन्द फिर सो जाए, वह नामुमकिन है। बंग-भंग को रद्द करने की माँग स्वराज्य की माँग के बराबर है। बंगाल के नेता यह बात खूब जानते हैं। अंग्रेज़ी हुकूमत भी यह बात समझती है, इसीलिए टुकड़े रद्द नहीं हुए। ज्यों-ज्यों दिन बीतते जाते हैं, त्यों- 21

हिन्द स्वराज्य त्यों प्रजा तैयार होती जाती है। प्रजा एक दिन में नहीं बनती, उसे बनने में कई बरस लग जाते हैं। पाठक : बंग-भंग के नतीजे आपने क्या देखे ? संपादक : आज तक हम मानते आये हैं कि बादशाह से अर्ज करना चाहिए और वैसा करने पर भी दाद न मिले तो दुःख सहन करना चाहिए, अलबत्ता अर्ज तो करते ही रहना चाहिए बंगाल के टुकड़े होने के बाद लोगों ने देखा कि हमारी अर्ज के पीछे कुछ ताक़त चाहिए, लोगों में कष्ट सहन करने की शक्ति चाहिए। यह नया जोश टुकड़े होने का अहम नतीजा माना जाएगा। यह जोश अखबारों के लेखों में दिखाई दिया। लेख कड़े होने लगे। जो बात लोग डरते हुए या चोरी-चुपके करते थे, वह खुल्मखुल्ला होने और लिखी जाने लगी। स्वदेशी का आन्दोलन चला। अंग्रेजों को देखकर छोटे-बड़े सब भागते थे, पर अब नहीं डरते, मार-पीट से भी नहीं डरते, जेल जाने में भी उन्हें कोई हर्ज नहीं मालूम होता और हिन्द के पुत्र रत्न आज देश निकाला भुगतते हुए विदेशों में विराजमान हैं। यह चीज उस अर्ज से अलग है। यों लोगों में खलबली मच रही है। बंगाल की हवा उत्तर में पंजाब तक और दक्षिण में मद्रास में कन्याकुमारी तक पहुँच गई है। पाठक : इसके अलावा और कोई जानने लायक नतीजा आपको सूझता है ? संपादक : बंग-भंग से जैसे अंग्रेजी जहाज़ में दरार पड़ी है, वैसे ही हममें भी दरार फूट पड़ी है। बड़ी घटनाओं के परिणाम भी यों बड़े ही होते हैं। हमारे नेताओं में दो दल हो गये हैं: एक मॉडरेट और दूसरा एक्स्ट्रीमिस्ट। उनको हम ‘धीमे’ और ‘उतावले’ कह सकते हैं। (‘नरम दल’ और ‘गरम दल’ शब्द भी चलते हैं।) कोई मॉडरेट को डरपोक पक्ष और एक्स्ट्रीमिस्ट को हिम्मतवाला पक्ष भी कहते हैं। सब अपने-अपने ख़्यालों के मुताबिक इन दो शब्दों का अर्थ करते हैं। यह सच है कि ये जो दल हुए हैं, उनके बीच ज़हर भी पैदा हुआ है। एक दल दूसरे का भरोसा नहीं करता, दोनों एक-दूसरे को ताना मारते हैं। सूरत कांग्रेस के समय करीब-करीब मार-पीट भी हो गई। ये जो दो दल हुए हैं वह देश के लिए अच्छी निशानी नहीं हैं, ऐसा मुझे तो लगता है, लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि ऐसे दल लम्बे अरसे तक टिकेंगे नहीं। इस तरह कब तक ये दल रहेंगे, यह तो नेताओं पर आधार रखता है। 22