भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 254 में से

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रुहेले जैसे कट्टर हठधर्मियों की आंखें भी खुलने लगीं। अब्दाली के होते हुए भी जो सफलता मरहटों ने प्राप्त की थी, उससे प्रभावित हो, लोगों को विश्वास हो गया कि अब्दाली मरहटों को रोकने में असमर्थ है। शुजा ने भाऊ को पत्र लिखा कि अब्दाली से मिल जाने पर वस्तुतः मैंने भूल की थी जिसका स्मरण करके मुझे बड़ा दुख हो रहा है। भाऊ ने भी उसे मिला लेने में ही बुद्धिमत्ता समझी और अपने राजदूत द्वारा यह कहला भेजा कि मरहठे मुगल-राज्य को उलटना नहीं चाहते। अगर शुजा अब्दाली का साथ छोड़ दे तो हम उसी को प्रसन्नतापूर्वक शाहआलम का, जिसे कि वे शाहन्शाह मानते हैं, वज़ीर बना देंगे। रुहेलों ने भी आगा-पीछा सोचने और अब्दाली का साथ छोड़ने की बातचीत प्रारम्भ कर दी। यह देखकर कि किस प्रकार सारी परिस्थिति उसके प्रतिकूल बन रही है, अब्दाली ने भी मरहटों के के साथ सन्धि की बातचीत करने का निश्चय किया और राजदूत शर्तों पर विचार करने के लिए भेज दिया। लेकिन उसकी शर्तों के मुताबिक़ पंजाब छोड़ने के लिये भाऊ तैयार न था, साथ ही वह बहसों के धोखे में पड़कर इस सुअवसर को, जिससे वह बहुत कुछ प्राप्त सकता था, हाथ से न जाने देना चाहता था इसलिये ऊपरी चित्त से सुलह की बातचीत कुछ अंशों में जारी होते हुये भी उसने उत्तर की ओर बढ़कर अब्दाली को कुंजपुर में एक बड़े महत्वपूर्ण स्थान से, हटा देने का विचार किया। एक बड़ी सेना, जिसका सेनापति समदखां था, उस स्थान की रक्षा कर रही थी। क़ुतुबशाह भी वहीं था। ज्यों ही उन्हें मालूम हुआ कि मरहटे आक्रमण करना चाहते हैं, वे खूब तैयारी करने लगे। अब्दाली ने भी समदखां और क़ुतुबशाह को यमुना के दूसरे पार से आज्ञा भेजी, कि जैसे भी हो, क़िले की रक्षा करो, और उन्हें यह विश्वास भी दिलाया कि मैंने सहायता के लिये और सेना भी रवाना कर दी है।

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