हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १११ ] दिल्ली छोड़ने पर भाऊ को उचित जान पड़ा कि अपना कोष पूर्ण कर लूँ। उसे आशा थी कि गोविन्दपन्त बुन्देला अब्दाली की रसद पहुँचनी बन्द कर देगा और उसके पिछले भाग पर आक्रमण करेगा, तथा शुजा और रुहेलों के सूबों पर चढ़ाई करके उन्हें परेशान करता रहेगा, पर गोविन्दपन्त अपने सभी कामों को पूर्ण करने में असफल रहा। बुन्देले से किसी प्रकार की आर्थिक सहायता न पाने पर भाऊ कोषपूर्ति का और ही उपाय सोचने लगा, क्योंकि कोष ही उसकी लड़ाई का मूल था। उसका ध्यान शाही सिंहासन के ऊपर की चांदी की छत की ओर आकर्षित कराया गया जिसकी कीमत क़रीब १२ लाख रुपये से अधिक थी। उसने उसे तोड़कर टकसाल में भेज देने की आज्ञा दी। उस समय गुलामी और मिथ्याविश्वास ने फिजूल शोर मचाना प्रारम्भ किया। कहा जाता है कि जाट भी यह सोचकर रुष्ट हो गये कि शक्तिशाली मुगलों के शाही तख्त को, जिन्हें कि भगवान् ने हिन्दुस्तान का महाराज बनने के लिए उत्पन्न किया है, इस प्रकार अपमानित करना देव स्वत्व-अपहरण है। यदि ऐसा मान भी लिया तो जाटों को सोचना चाहिये था कि अगर प्रत्येक सफल कार्य जिसमें सफल-अपहरण भी सम्मिलित है, ईश्वर की इच्छानुसार ही है और इसके कारण ही वह पवित्र और ईश्वरीय बन जाता है, शिवाजी द्वारा स्थापित रायगढ़ भी एक सफल कार्य था, उसे ईश्वरीय समझा जाना चाहिए था। रायगढ़ की स्थापना का उद्देश्य धार्मिक अन्याय या अत्याचार करना न था, बल्कि उसका अस्तित्व तो जातीय स्वतन्त्र जीवन बिताने तथा आत्मरक्षा और स्वतन्त्रता की भावना से परिपूर्ण था। लेकिन जब औरङ्गजेब अग्नि और तलवार तथा धर्मान्धता और अशान्ति की सारी सेनाओं के साथ दक्षिण में हिन्दुओं के जातीय जीवन को कुचलने और इस प्रकार नवीन हिन्दू- राज्य को मिटा देने के लिये आया, तो क्या उसने शिवाजी के सिंहासन