भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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आज्ञाएं दे रहा था, और हिन्दू-सेना के बलकी प्रशंसा कर रहा था जिसने उस काम को तीन दिन में पूरा कर लिया था, जिसकी पूर्ति में शत्रुओं को अगर उतने महीने नहीं, तो कम से कम उतने सप्ताह जरूर लगने की आशा थी। ठीक उसी समय हाथी पर सवार दो युद्ध के प्रसिद्ध कैदी लाये गये। उनमें से एक था, पठानों की कुंजपुर फौज का सेनापति समद खां और दूसरा था, नजीब का शिक्षक, पठान षड्यन्त्र- कारियों का नेता तथा मरते हुये वीर दत्ताजी को लात मारने वाला और नीचतापूर्वक 'काफिर' इत्यादि कह कर उसका अपमान करने वाला कुतुबशाह । कुतुबशाह को देखते ही मरहठा-खून खौलने लगा। दत्ताजी का बदला लेने का ख्याल उसकी आँखों के सामने आया। “क्या तुमने ही मरते हुये हमारे दत्ताजी को काफिर कहते हुये लात मारी थी?” कुतुब शाह ने जवाब दिया—“हां, हमारे धर्म में मूर्तिपूजक को मारना और उसके साथ काफिर की तरह घृणा करना पुण्य कार्य माना गया है।” “तब कुत्ते की मौत मरो”—भाऊ ने गर्ज कर कहा। सिपाही उस अपराधी को थोड़ी दूर एक तरफ ले गये और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। दत्ताजी का बदला पूर्ण रूप से ले लिया गया और समद खां की भी वही गति हुई। नजीबखां का परिवार भी, उसके दामाद और अन्य लोगों के साथ, मरहठों के हाथ पड़ गया। लेकिन उन लोगों के साथ कुतुबशाह जैसी सख्ती नहीं बरती गई। सच तो यह है कि युद्ध करते हुए जो लोग बन्दी किये गये थे, वे यदि मार भी डाले जाते तो भी अब्दाली को किसी प्रकार भी उनके मनुष्यत्व पर टीका करने का कोई अधिकार न था क्योंकि वह और उसके सहायक मुस्लिम-बादशाह ऐसे निष्ठुर