हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहापापों के स्वयं अपराधी थे । उन्होंने पंजाब, बढ़ान तथा अन्य स्थानों में रण-भूमि में हारे हुये मरहटों की नाकें काट ली थीं और उनके सिरों को काट कर शाही खैमे के सामने ढेर लगा दिये थे और उसी भयंकर चिता को उन्होंने जय-स्तम्भ समझा था । मरहठे भी इन पाशविक कार्यों का अनुकरण कर सकते थे, पर उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया । और न ही उन लोगों ने मसजिदों को ढाकर, कुरान को जला कर और पवित्र स्थानों पर लूट मचा कर अपने को प्रसिद्ध किया । अब्दाली, औरंगजेब, नादिर और मुसलमानों ने सिद्धान्ततः ऐसे दुराचार किये थे ! कुंजपुर में हारने के कारण अब्दाली की प्रतिष्ठा और भी कम होने लगी । मरहठे उसकी सेना को, जो दस हज़ार के लगभग थी, बुरी तरह से पराजित करके उसकी आंखों के सामने ही विजयदशमी या विजय का दिन बड़ी धूमधाम से मना रहे थे । चूंकि वह एक योग्य सेनापति था, उसने फौरन सोच लिया कि यदि कोई बड़ा खतरा उठा कर मैं कोई साहसिक कार्य करके न दिखा दूंगा तो मेरा काम बिगड़ जायगा । उसी समय उसने किसी प्रकार भी यमुना पार करके बागपट के स्थान पर पहुँच कर कुंजपुर स्थित मरहठी फ़ौज को उनके आधारभूत दिल्ली से काटने का दृढ़ निश्चय कर लिया । अपने इस कार्य में वह सफल हुआ और एक लाख मनुष्यों की सेना, मरहटों और उनकी देहली लाइन के बीच खड़ी कर दी । इसी समय उसे एक और मौक़ा हाथ आ गया, जो पीछे चल कर उसके लिये अपनी सैनिक शक्तियों से अधिक लाभदायक सिद्ध हुआ । वह यह था कि यद्यपि मरहटों का सम्बन्ध अपनी आधार फ़ौज से कट गया था तो भी अब्दाली का सम्बन्ध शुजा और रुहेलों के देश से नहीं छूटा था । पर इसके कारण उसे इतना लाभ नहीं पहुँचा जितना कि गोविन्दपन्त के भाऊ की, रसद बन्द करने वाली, आज्ञा न पालन कर सकने के कारण पहुँचा । अब्दाली ने मरहटों को सामना करने के लिये भलीभांति सुस- ज्जित पाया । बागपट पर ज्यों ही उसने यमुना पार की, उसी समय